{"_id":"022bc857b71b16269b6cba985120460c","slug":"election-of-chairman-of-the-board-at-the-fair-anger-rigging-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"मंडल अध्यक्ष के निर्वाचन में धांधली की पर फूटा गुस्सा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मंडल अध्यक्ष के निर्वाचन में धांधली की पर फूटा गुस्सा
ब्यूरो अमर उजाला, एटा
Updated Sun, 27 Dec 2015 11:20 PM IST
विज्ञापन
मंडल अध्यक्ष के निर्वाचन में धांधली की आशंका रविवार को भाजपा जिलाध्यक्ष चुनाव के नामांकन में हंगामे का कारण बन गई। रविवार को भाजपा कार्यालय पर भाजपाइयाें की जंग ने अनुशासन को ही तार तार नहीं किया। वरन चुनाव अधिकारी की पारदर्शिता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। पार्टी कार्यालय पर रविवार को नामांकन शरूहोने से पहले से ही सामंजस्य नहीं दिख रहा था। इसके अलावा हंगामे का दूसरा सबसे बड़ा कारण सांसद राजवीर सिंह के साथ जिलाध्यक्ष पद के प्रत्याशी का पहुंचना माना जा रहा है।
रविवार को जिलाध्यक्ष पद के दावेदार ही नहीं उनके समर्थक भी दो गुटों में बंटे दिखाई दिए। नामांकन से पहले ही लोग मंडल अध्यक्ष के चुनाव में पक्षपात का आरोप लगाते दिखाई दिए। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव अधिकारी ने अभी तक मंडल अध्यक्ष के नाम ही घोषित नहीं किए हैं। बल्कि बृज क्षेत्र से मंडल अध्यक्षों की घोषणा की गई। जो पार्टी के निर्वाचन नियमोें के खिलाफ है।
प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो मंडल अध्यक्ष चुनाव प्रक्रिया पर पहले से आक्रोशित कार्यकर्ता उस समय और भड़क गए जब पार्टी कार्यालय पर पहुंचे सांसद राजवीर सिंह के साथ जिलाध्यक्ष पद के एक प्रबल दावेदार भी पहुंचे। इसके अलावा जिलाध्यक्ष नामांकन में मंडल अध्यक्ष के प्रस्तावक बनने की बाध्यता भी दावेदारों और समर्थकों के भड़कने पर हंगामा, मारपीट, हाथापाई, फायरिंग, मत्रपत्र हवा में उड़ाने के बाद आगजनी की वजह बताई जा रही है।
विज्ञापन
जातिगत असंतुलन का आरोप
जिलाध्यक्ष के नामांकन के लिए कुल मंडलों में से एक तिहाई मंडल अध्यक्ष प्रस्तावक की बाध्यता है। ऐसे में जिले के बारह मंडल अध्यक्षों में प्रत्येक दावेदार को तीन तीन प्रस्तावक चाहिए थे। अन्य दावेदार यह कहते हुए भड़क गए कि मंडल अध्यक्ष का गुपचुप मनोनयन साजिश थी। तो कुछ कार्यकर्ता मंडल अध्यक्ष के चयन में सामाजिक और जातिगत संतुलन नहीं बनाने का भी आरोप लगाया है। बताते चलें कि जिले के बारह मंडल अध्यक्ष में सात लोधी, पांच ठाकुर और एक वैश्य समाज का है। जबकि ब्राहमण, शाक्य, यादव, दलित और अन्य वर्ग को इस बार चुनाव में प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया।
चुनाव प्रक्रिया निरस्त करने की मांग
कार्यालय पर मौजूद सैकड़ों लोगाें ने प्रदेश नेतृत्व से जिला संगठन की पूरी चुनाव प्रक्रिया को निरस्त करने की मांग की है। हंगामे के बाद यहां मौजूद पूर्व विधायक प्रत्येंद्र पाल सिंह, कुबेर सिंह अंगरिया, मिथलेश अंगरिया, हंसराज वर्मा, सुरेंद्र गुप्ता, विपिन वर्मा डेविड ने उपस्थित लोगों को शांत करते हुए जब उनकी राय जानी तो अधिकांश ने मंडल से लेकर अभी तक संपन्न हुई पूरी चुनाव प्रक्रिया निरस्त करने की मांग ही है।
निर्वाचन अधिकारी बन सकते हैं प्रत्याशी
राजनीतिक जानकारों के अनुसार कई दावेदार तो मंडल चुनाव के दौरान चुनाव अधिकारी भी थे। नाम न छापने की शर्त पर एक नेता ने बताया कि मंडल चुनाव अधिकारी को उस चुनाव को लड़ने का हक नहीं है जिसमें उसके द्वारा नामित व्यक्ति वोटर हों।
दो बार पूर्व में भी हुए चुनाव
जिलाध्यक्ष के लिए चुनाव पूर्व में भी दो बार हुए हैं। पहला चुनाव 1995 में एटा-कासगंज संयुक्त जिला इकाई का हुआ था। लाख कोशिशाें के बाद भी आम सहमति नहीं बनने पर सुरेंद्र गुप्ता और पूर्व विधायक गेंदालाल गुप्ता के बीच चुनाव हुआ। 527 मताें में से सुरेंद्र गुप्ता 519 वोट पाकर विजयी रहे। 1997 में पुन: सुरेंद्र गुप्ता का मुकाबला मणिकांत गुप्ता से हुआ। मणिकांत के छह मतों के विरुद्ध सुरेंद्र गुप्ता ने 510 वोट से जीत हासिल की थी।
पहले भी पहुंच चुकी केंद्रीय संगठन की लड़ाई
1996 में भाजपा जिला इकाई ने प्रदेश नेतृत्व को चुनौती पार्टी की सुर्खियां रहीं। तत्कालीन प्रदेश नेतृत्व कल्याण सिंह, प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र और प्रदेश प्रभारी सुंदर सिंह भंडारी) ने एमएलसी प्रत्याशी को मिली पराजय का ठीकरा फोड़ते हुए तत्कालीन जिला कमेटी को बिना नोटिस दिए भंग कर दिया था। जिलाध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता ने इसे केंद्रीय अनुशासन समिति की तत्कालीन अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से अपील की। सुनवाई के बाद बर्खास्त जिला कमेटी को बहाल किया गया। इसके साथ ही एटा जिला इकाई पार्टी की सुर्खियाें में रही।
विज्ञापन
रविवार को जिलाध्यक्ष पद के दावेदार ही नहीं उनके समर्थक भी दो गुटों में बंटे दिखाई दिए। नामांकन से पहले ही लोग मंडल अध्यक्ष के चुनाव में पक्षपात का आरोप लगाते दिखाई दिए। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव अधिकारी ने अभी तक मंडल अध्यक्ष के नाम ही घोषित नहीं किए हैं। बल्कि बृज क्षेत्र से मंडल अध्यक्षों की घोषणा की गई। जो पार्टी के निर्वाचन नियमोें के खिलाफ है।
विज्ञापन
प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो मंडल अध्यक्ष चुनाव प्रक्रिया पर पहले से आक्रोशित कार्यकर्ता उस समय और भड़क गए जब पार्टी कार्यालय पर पहुंचे सांसद राजवीर सिंह के साथ जिलाध्यक्ष पद के एक प्रबल दावेदार भी पहुंचे। इसके अलावा जिलाध्यक्ष नामांकन में मंडल अध्यक्ष के प्रस्तावक बनने की बाध्यता भी दावेदारों और समर्थकों के भड़कने पर हंगामा, मारपीट, हाथापाई, फायरिंग, मत्रपत्र हवा में उड़ाने के बाद आगजनी की वजह बताई जा रही है।
विज्ञापन
जातिगत असंतुलन का आरोप
जिलाध्यक्ष के नामांकन के लिए कुल मंडलों में से एक तिहाई मंडल अध्यक्ष प्रस्तावक की बाध्यता है। ऐसे में जिले के बारह मंडल अध्यक्षों में प्रत्येक दावेदार को तीन तीन प्रस्तावक चाहिए थे। अन्य दावेदार यह कहते हुए भड़क गए कि मंडल अध्यक्ष का गुपचुप मनोनयन साजिश थी। तो कुछ कार्यकर्ता मंडल अध्यक्ष के चयन में सामाजिक और जातिगत संतुलन नहीं बनाने का भी आरोप लगाया है। बताते चलें कि जिले के बारह मंडल अध्यक्ष में सात लोधी, पांच ठाकुर और एक वैश्य समाज का है। जबकि ब्राहमण, शाक्य, यादव, दलित और अन्य वर्ग को इस बार चुनाव में प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया।
चुनाव प्रक्रिया निरस्त करने की मांग
कार्यालय पर मौजूद सैकड़ों लोगाें ने प्रदेश नेतृत्व से जिला संगठन की पूरी चुनाव प्रक्रिया को निरस्त करने की मांग की है। हंगामे के बाद यहां मौजूद पूर्व विधायक प्रत्येंद्र पाल सिंह, कुबेर सिंह अंगरिया, मिथलेश अंगरिया, हंसराज वर्मा, सुरेंद्र गुप्ता, विपिन वर्मा डेविड ने उपस्थित लोगों को शांत करते हुए जब उनकी राय जानी तो अधिकांश ने मंडल से लेकर अभी तक संपन्न हुई पूरी चुनाव प्रक्रिया निरस्त करने की मांग ही है।
निर्वाचन अधिकारी बन सकते हैं प्रत्याशी
राजनीतिक जानकारों के अनुसार कई दावेदार तो मंडल चुनाव के दौरान चुनाव अधिकारी भी थे। नाम न छापने की शर्त पर एक नेता ने बताया कि मंडल चुनाव अधिकारी को उस चुनाव को लड़ने का हक नहीं है जिसमें उसके द्वारा नामित व्यक्ति वोटर हों।
दो बार पूर्व में भी हुए चुनाव
जिलाध्यक्ष के लिए चुनाव पूर्व में भी दो बार हुए हैं। पहला चुनाव 1995 में एटा-कासगंज संयुक्त जिला इकाई का हुआ था। लाख कोशिशाें के बाद भी आम सहमति नहीं बनने पर सुरेंद्र गुप्ता और पूर्व विधायक गेंदालाल गुप्ता के बीच चुनाव हुआ। 527 मताें में से सुरेंद्र गुप्ता 519 वोट पाकर विजयी रहे। 1997 में पुन: सुरेंद्र गुप्ता का मुकाबला मणिकांत गुप्ता से हुआ। मणिकांत के छह मतों के विरुद्ध सुरेंद्र गुप्ता ने 510 वोट से जीत हासिल की थी।
पहले भी पहुंच चुकी केंद्रीय संगठन की लड़ाई
1996 में भाजपा जिला इकाई ने प्रदेश नेतृत्व को चुनौती पार्टी की सुर्खियां रहीं। तत्कालीन प्रदेश नेतृत्व कल्याण सिंह, प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र और प्रदेश प्रभारी सुंदर सिंह भंडारी) ने एमएलसी प्रत्याशी को मिली पराजय का ठीकरा फोड़ते हुए तत्कालीन जिला कमेटी को बिना नोटिस दिए भंग कर दिया था। जिलाध्यक्ष सुरेंद्र गुप्ता ने इसे केंद्रीय अनुशासन समिति की तत्कालीन अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से अपील की। सुनवाई के बाद बर्खास्त जिला कमेटी को बहाल किया गया। इसके साथ ही एटा जिला इकाई पार्टी की सुर्खियाें में रही।