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एटा की मिट्टी में होगा बादाम, हींग और सेब का उत्पादन
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गांव सराय जवाहरपुर में अपने बाग की देखभाल करते दुर्बीन सिंह। संवाद
- फोटो : ETAH
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एटा। आमतौर पर मैदानी इलाकों में बादाम, हींग, सेब की पैदावार नहीं हो पाती, लेकिन उन्नतशील किसान दुर्बीन सिंह इसे मिथक साबित करने में जुटे हैं। लंबा अध्ययन और प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने गांव सराय जवाहरपुर में खास तरह का बाग तैयार किया है। जिसमें इन पौधों को बढ़ा रहे हैं।
यूं तो किसान दुर्बीन सिंह कृषि में अपने नए-नए प्रयोगों से कई बार चर्चाओं में रह चुके हैं, लेकिन इस बार सामान्य खेती से हटकर बनाए गए बाग का प्रयोग बिल्कुल ही अलग तरह का है। फिलहाल एक बीघा जमीन पर उन्होंने यह बाग बनाया है, जिसे आगे और बढ़ाने की योजना है। इसमें सेब, बादाम, हींग, सिंदूर, चीकू, किन्नो, शरीफा, सहतूत, सतावरी, के पौधे रोपे हैं। इनमें से चीकू, शरीफा, किन्नो और सहतूत का उत्पादन ले चुके हैं।
लखनऊ और सांमली में लिया प्रशिक्षण
दुर्बीन सिंह ने बताया कि आमतौर पर कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे ठंडे और पहाड़ी इलाकों में सेब का उत्पादन होता है। मैदानी इलाकों की जलवायु इसके लिए मुफीद नहीं मानी जाती, लेकिन करीब छह साल पहले मेरठ में एक कार्यक्रम में गए तो वहां सेब का बाग देखा। मन में विचार आया कि जब मेरठ में सेव का उत्पादन हो सकता है तो लगभग समान जलवायु वाले एटा में क्यों नहीं? इसके बाद लखनऊ और सांमली में इसी विषय पर हुए प्रशिक्षण कार्यक्रम में रहे। पूरी विधि पता की और बाग बना लिया। दुर्बीन बताते हैं कि कुछ समय लगेगा, लेकिन उम्मीद है कि यह सिलसिला आगे बढ़ेगा।
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यूं तो किसान दुर्बीन सिंह कृषि में अपने नए-नए प्रयोगों से कई बार चर्चाओं में रह चुके हैं, लेकिन इस बार सामान्य खेती से हटकर बनाए गए बाग का प्रयोग बिल्कुल ही अलग तरह का है। फिलहाल एक बीघा जमीन पर उन्होंने यह बाग बनाया है, जिसे आगे और बढ़ाने की योजना है। इसमें सेब, बादाम, हींग, सिंदूर, चीकू, किन्नो, शरीफा, सहतूत, सतावरी, के पौधे रोपे हैं। इनमें से चीकू, शरीफा, किन्नो और सहतूत का उत्पादन ले चुके हैं।
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लखनऊ और सांमली में लिया प्रशिक्षण
दुर्बीन सिंह ने बताया कि आमतौर पर कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे ठंडे और पहाड़ी इलाकों में सेब का उत्पादन होता है। मैदानी इलाकों की जलवायु इसके लिए मुफीद नहीं मानी जाती, लेकिन करीब छह साल पहले मेरठ में एक कार्यक्रम में गए तो वहां सेब का बाग देखा। मन में विचार आया कि जब मेरठ में सेव का उत्पादन हो सकता है तो लगभग समान जलवायु वाले एटा में क्यों नहीं? इसके बाद लखनऊ और सांमली में इसी विषय पर हुए प्रशिक्षण कार्यक्रम में रहे। पूरी विधि पता की और बाग बना लिया। दुर्बीन बताते हैं कि कुछ समय लगेगा, लेकिन उम्मीद है कि यह सिलसिला आगे बढ़ेगा।
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