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भोजपुरी की दुनिया में मोती बीए की है अमिट छाप
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बरहज के बरेंजी निवासी भोजपुरी गीतकार स्व.मोती बीए
- फोटो : DEORIA
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भोजपुरी की दुनिया में ‘मोती बीए’ की है अमिट छाप
साहित्य अकादमी आदि पुरस्कारों से सम्मानित हुए थे मोती बीए
आज मनेगी मोती बीए की स्वर्ण जयंती
सच्चिदानंद पांडेय
बरहज। असों आइल महुआबारी में बहार सजनी..., मेरे राजा हो ले चलअ नदिया के पार..., दिल ले के भागा, दगा देके भागा... जैसे कर्णप्रीय गीतों से लाखों दिलों पर राज करने वाले मोती बीए की 100वीं जयंती गुरुवार को धूमधाम से मनाई जाएगी। देवरिया को भोजपुरी के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने वाले मोती बीए के गीतों में स्थानीय संस्कृति और सभ्यता की छाप भी साफ नजर आती है।
तहसील क्षेत्र के बरेजी गांव निवासी राधाकृष्ण उपाध्याय और कौशिल्या देवी की तीन संतानों में दूसरे नंबर के बेटे मोती बीए का जन्म एक अगस्त 1919 में हुआ था। गांव से प्रारंभिक शिक्षा के बाद किंग जार्ज इंटर कॉलेज गोरखपुर और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की। कई समाचार पत्रों में संपादन कर चुके मोती बीए के नाम और फनकारी से लोग तब रुबरू हुए, जब उन्होंने फिल्मी दुनिया में भोजपुरी गीतकार के रुप में सफर शुरू कराया। 1944 से 52 तक फिल्मी दुनिया में करीब 80 फिल्मों में उन्होंने गीत लिखे। 1951 में राजपूत फिल्म में संगीतकार हुश्नलाल-भगतराम और मोहम्मद रफी ने मोती बीए का गाना जोगीरा कौन समय में धरती डोले, कौन समय आसमान... गाया था। पंचोली आर्टस पिक्चर्स लाहौर फिल्मिस्तान लिमिटेड मुंबई और प्रकाश पिक्चर्स में गीतकार के रूप में नदिया के पार, साजन, सिंदूर, रिमझिम, सुभद्रा आदि फिल्मों को भी अपने गीतों से सजाया है। नदिया के पार में कठवा के नईया बनइहअ मल्ल्हवा..., साजन फिल्म के प्रसिद्ध गीत तुम हमारे हो न हो... आदि गीतों को आज भी लोग गुनगुनाते हैं। फिल्मी जगत में अमिट छाप छोड़ने के साथ स्वाधीनता की लड़ाई में भी इनका अहम रोल था। अंग्रेज सरकार ने उन्हें 1943 में सेंट्रल जेल में नजरबंद किया था।
कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं मोती बीए
बरेजी गांव निवासी स्व. मोती बीए एक शिक्षक होने के साथ-साथ रूपहले पर्दे पर भोजपुरी को जीवंत करने वाले पहले शख्स थे। 1980 के दशक में राज्यपाल की ओर से सर्वश्रेष्ठ शिक्षक की उपाधि, जबकि 2001 में राष्ट्रपति द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार, समिधा पुस्तक पर प्रदेश सरकार सहित आधा दर्जन सम्मानों से सम्मानित किए जा चुके हैं।
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साहित्य अकादमी आदि पुरस्कारों से सम्मानित हुए थे मोती बीए
आज मनेगी मोती बीए की स्वर्ण जयंती
सच्चिदानंद पांडेय
बरहज। असों आइल महुआबारी में बहार सजनी..., मेरे राजा हो ले चलअ नदिया के पार..., दिल ले के भागा, दगा देके भागा... जैसे कर्णप्रीय गीतों से लाखों दिलों पर राज करने वाले मोती बीए की 100वीं जयंती गुरुवार को धूमधाम से मनाई जाएगी। देवरिया को भोजपुरी के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने वाले मोती बीए के गीतों में स्थानीय संस्कृति और सभ्यता की छाप भी साफ नजर आती है।
तहसील क्षेत्र के बरेजी गांव निवासी राधाकृष्ण उपाध्याय और कौशिल्या देवी की तीन संतानों में दूसरे नंबर के बेटे मोती बीए का जन्म एक अगस्त 1919 में हुआ था। गांव से प्रारंभिक शिक्षा के बाद किंग जार्ज इंटर कॉलेज गोरखपुर और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की। कई समाचार पत्रों में संपादन कर चुके मोती बीए के नाम और फनकारी से लोग तब रुबरू हुए, जब उन्होंने फिल्मी दुनिया में भोजपुरी गीतकार के रुप में सफर शुरू कराया। 1944 से 52 तक फिल्मी दुनिया में करीब 80 फिल्मों में उन्होंने गीत लिखे। 1951 में राजपूत फिल्म में संगीतकार हुश्नलाल-भगतराम और मोहम्मद रफी ने मोती बीए का गाना जोगीरा कौन समय में धरती डोले, कौन समय आसमान... गाया था। पंचोली आर्टस पिक्चर्स लाहौर फिल्मिस्तान लिमिटेड मुंबई और प्रकाश पिक्चर्स में गीतकार के रूप में नदिया के पार, साजन, सिंदूर, रिमझिम, सुभद्रा आदि फिल्मों को भी अपने गीतों से सजाया है। नदिया के पार में कठवा के नईया बनइहअ मल्ल्हवा..., साजन फिल्म के प्रसिद्ध गीत तुम हमारे हो न हो... आदि गीतों को आज भी लोग गुनगुनाते हैं। फिल्मी जगत में अमिट छाप छोड़ने के साथ स्वाधीनता की लड़ाई में भी इनका अहम रोल था। अंग्रेज सरकार ने उन्हें 1943 में सेंट्रल जेल में नजरबंद किया था।
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कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं मोती बीए
बरेजी गांव निवासी स्व. मोती बीए एक शिक्षक होने के साथ-साथ रूपहले पर्दे पर भोजपुरी को जीवंत करने वाले पहले शख्स थे। 1980 के दशक में राज्यपाल की ओर से सर्वश्रेष्ठ शिक्षक की उपाधि, जबकि 2001 में राष्ट्रपति द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार, समिधा पुस्तक पर प्रदेश सरकार सहित आधा दर्जन सम्मानों से सम्मानित किए जा चुके हैं।
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