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मनरेगा: योजना का बदल गया नाम पिछले कार्यों का नहीं हो रहा भुगतान
Tue, 03 Mar 2026 12:04 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Tue, 03 Mar 2026 12:04 AM IST
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तरकुलवा। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत सामग्री मद की धनराशि का भुगतान वर्ष 2024 से लंबित है। लगभग तीन करोड़ रुपये का भुगतान अटक गया है। भुगतान नहीं होने से ग्राम प्रधानों और सामग्री आपूर्तिकर्ताओं (वेंडरों) की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
जानकारी के अनुसार विकास खंड में कुल 45 ग्राम पंचायतें हैं। इन ग्राम पंचायतों में साल 2024-25 और 2025-26 के मनरेगा योजना के तहत मैटेरियल मद में भुगतान रुका है। अब योजना का नाम बदल गया है, जिसके चलते पहले वाले बकाए का भुगतान नहीं हो पा रहा है।
इस कारण सामग्री आपूर्तिकर्ता दुकानदार ग्राम प्रधानों के चक्कर लगा रहे हैं। मनरेगा के अंतर्गत इंटरलॉकिंग, आरसीसी निर्माण, खड़ंजा, नाली, अन्नपूर्णा भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, विद्यालयों की चहारदीवारी जैसे महत्वपूर्ण कार्य कराए जाते रहे हैं। फर्मों से सामान उधार लेकर ग्राम प्रधान इन कार्यों को करा चुके हैं, लेकिन इन कार्यों के लिए धनराशि आवंटित नहीं हो पाई है। जिसके कारण इन परियोजनाओं में काम करने वाले मजदूरों का भुगतान नहीं हो पाया है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे आपूर्तिकर्ता स्थानीय व्यापारी अपनी पूंजी फंस जाने के कारण परेशान हैं। वहीं प्रधानों पर भी अधूरे कार्यों को पूरा कराने का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन भुगतान न होने के कारण उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है।
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जानकारी के अनुसार विकास खंड में कुल 45 ग्राम पंचायतें हैं। इन ग्राम पंचायतों में साल 2024-25 और 2025-26 के मनरेगा योजना के तहत मैटेरियल मद में भुगतान रुका है। अब योजना का नाम बदल गया है, जिसके चलते पहले वाले बकाए का भुगतान नहीं हो पा रहा है।
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इस कारण सामग्री आपूर्तिकर्ता दुकानदार ग्राम प्रधानों के चक्कर लगा रहे हैं। मनरेगा के अंतर्गत इंटरलॉकिंग, आरसीसी निर्माण, खड़ंजा, नाली, अन्नपूर्णा भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, विद्यालयों की चहारदीवारी जैसे महत्वपूर्ण कार्य कराए जाते रहे हैं। फर्मों से सामान उधार लेकर ग्राम प्रधान इन कार्यों को करा चुके हैं, लेकिन इन कार्यों के लिए धनराशि आवंटित नहीं हो पाई है। जिसके कारण इन परियोजनाओं में काम करने वाले मजदूरों का भुगतान नहीं हो पाया है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे आपूर्तिकर्ता स्थानीय व्यापारी अपनी पूंजी फंस जाने के कारण परेशान हैं। वहीं प्रधानों पर भी अधूरे कार्यों को पूरा कराने का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन भुगतान न होने के कारण उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है।
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