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Deoria News: सीएमओ कार्यालय के बाबू और नोडल के गठजोड़ से चल रहे अवैध निजी अस्पताल
Thu, 23 Nov 2023 11:43 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Thu, 23 Nov 2023 11:43 PM IST
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देवरिया। सीएमओ कार्यालय के बाबू और नोडल अफसरों की गठजोड़ से जिले में अवैध निजी अस्पतालों की भरमार है। सील होने के कुछ ही दिन बाद अस्पताल खुल जा रहे हैं, या नाम बदलकर आस-पास के मकान में अस्पतालों का संचालन किया जा रहा है। कार्रवाई के नाम पर जिम्मेदार सिर्फ खानापूर्ति कर रहे हैं।
जिले में सिर्फ 78 निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन सीएमओ कार्यालय में है, लेकिन शहर के हर गली-मोहल्ले और कस्बों में अवैध तरीके से निजी अस्पतालों का संचालन किया जा रहा है। उच्चाधिकारियों तक शिकायत पहुंचने पर सीएमओ कार्यालय में तैनात बाबू और नोडल अफसर पहुंचते हैं और अस्पताल को सील कर चले आते हैं। दो से चार दिन बाद संचालक अस्पताल का सील खोल मरीज का इलाज शुरू कर देते हैं।
शहर के रामनाथ देवरिया में कुछ माह पूर्व जेके लक्ष्मी अस्पताल को सील किया गया, जिसका संचालन शुरू हो गया है। वहीं रामनाथ देवरिया गेट के पास न्यू मेट्रो अस्पताल में कुछ माह पूर्व सरकारी अस्पताल में सप्लाई होने वाली दवाएं छापे के दौरान पकड़ी गई थीं। स्वास्थ्य टीम ने इस अस्पताल को सील कर दिया था, लेकिन इस अस्पताल का संचालन किया जा रहा है। वहीं रुद्रपुर के प्रेमा अस्पताल का सील खोलकर संचालन शुरू कर दिया गया है। इसके अलावा सलेमपुर नगर के रंजनी अस्पताल में एक महिला की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी। मामला बढ़ने के बाद उस अस्पताल को सील किया गया। 100 मीटर दूरी पर वही संचालक दूसरे नाम से अस्पताल खोल रखा है, जिसका रजिस्ट्रे्शन भी सीएमओ कार्यालय में नहीं है। न्यू कालोनी में अपोलो अस्पताल भी कुछ माह पूर्व सील हुआ था जिसका संचालन शुरू कर दिया गया है। पथरदेवा में आशिफा के नाम से संचालित अस्पताल को दो माह पूर्व सील कर दिया गया था। बगल के मकान में मेडी केयर के नाम से संचालित किया जा रहा है। देवरिया-सलेमपुर रोड के सोंदा और गोरखपुर रोड पर भी निजी अस्पतालों का बोर्ड लगाकर इलाज के नाम पर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है।
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जिले में ऐसे अवैध तरीके से संचालित होने वाले अस्पतालों की संख्या बढ़ती जा रही है। कुछ दिन पूर्व डीएम ने भी अवैध जांच केंद्र और अवैध अस्पतालों पर अभियान चलाकर कार्रवाई के लिए आदेश दिए थे, जो ठंडे बस्ते में चली गई।
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ऐसे होता है खेल
- जानकारों के अनुसार अस्पताल बिना किसी मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में सील नहीं किया जा सकता है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की टीम मौके पर पहुंचकर अस्पताल को सील कर देती है। संचालक कुछ दिन बाद सील को खोल लेता है। इस खेल को अंजाम विभागीय मिलीभगत से की जाती है। जिस मकान में अस्पताल होता है, उस मकान मालिक से शपथ पत्र सीएमओ कार्यालय के बाबू लेते हैं। दिए गए शपथ पत्र में कहा जाता है कि मकान की दूसरी मंजिल या तीसरी मंजिल पर जाने का रास्ता नहीं है, या अब से मकान में इस अस्पताल का संचालन नहीं करने देंगे। इसी तर्क के बाद अस्पताल का सील खोलने का निर्देश सीएमओ कार्यालय से मिल जाता है, लेकिन धरातल पर ऐसा होता नहीं है। अस्पतालों का नाम बदलकर या उसी नाम से अस्पताल का संचालन शुरू कर दिया जाता है।
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एक ही डॉक्टर के नाम पर संचालित हो रहे दो अस्पताल
-राघव नगर में अरूण अल्ट्रासाउंड को कुछ माह पूर्व स्वास्थ्य विभाग की टीम ने सील कर दिया। जिस डॉक्टर के नाम पर रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन हुआ है। उस डॉक्टर के नाम से गोरखपुर ओवरब्रिज के पास अस्पताल का संचालन हो रहा है। यह एक मामला नहीं है। शहर में ही कई ऐसे अस्पताल हैं, जो एक डॉक्टर के नाम से ही इनका रजिस्ट्रेशन है। सब कुछ जानने के बाद जिम्मेदार अंजान बने हुए हैं।
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बोर्ड पर बड़े डॉक्टरों के नाम लिखवाकर फंसाते हैं
शहर के निजी अस्पतालों पर नामी गिरामी डॉक्टरों का नाम बोर्ड पर लिखवाया गया है, जो आते ही नहीं है। इनके नाम पर झोलाछाप से इलाज कराया जाता है। मरीज की जान जाने या किसी तरह का नुकसान होने पर यह राज खुलता है। एक साल के अंदर प्रसव के दौरान सात से अधिक महिलाओं की जान जा चुकी है, लेकिन किसी भी मामले में सीएमओ कार्यालय की ओर से गंभीर कार्रवाई नहीं की गई है। जिसका नतीजा है कि अवैध अस्पतालों का धंधा कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है।
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अवैध हास्पिटल की जांच के लिए टीम गठित की गई है। अभियान चलाकर व शिकायत मिलने पर अवैध रूप से संचालित अस्पतालों को सील किया जाता है। अगर कहीं सील खोलकर अस्पताल संचालित होने की शिकायत मिली तो सख्त कार्रवाई कराई जाएगी।
डॉ. राजेश झा, सीएमओ
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जिले में सिर्फ 78 निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन सीएमओ कार्यालय में है, लेकिन शहर के हर गली-मोहल्ले और कस्बों में अवैध तरीके से निजी अस्पतालों का संचालन किया जा रहा है। उच्चाधिकारियों तक शिकायत पहुंचने पर सीएमओ कार्यालय में तैनात बाबू और नोडल अफसर पहुंचते हैं और अस्पताल को सील कर चले आते हैं। दो से चार दिन बाद संचालक अस्पताल का सील खोल मरीज का इलाज शुरू कर देते हैं।
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शहर के रामनाथ देवरिया में कुछ माह पूर्व जेके लक्ष्मी अस्पताल को सील किया गया, जिसका संचालन शुरू हो गया है। वहीं रामनाथ देवरिया गेट के पास न्यू मेट्रो अस्पताल में कुछ माह पूर्व सरकारी अस्पताल में सप्लाई होने वाली दवाएं छापे के दौरान पकड़ी गई थीं। स्वास्थ्य टीम ने इस अस्पताल को सील कर दिया था, लेकिन इस अस्पताल का संचालन किया जा रहा है। वहीं रुद्रपुर के प्रेमा अस्पताल का सील खोलकर संचालन शुरू कर दिया गया है। इसके अलावा सलेमपुर नगर के रंजनी अस्पताल में एक महिला की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी। मामला बढ़ने के बाद उस अस्पताल को सील किया गया। 100 मीटर दूरी पर वही संचालक दूसरे नाम से अस्पताल खोल रखा है, जिसका रजिस्ट्रे्शन भी सीएमओ कार्यालय में नहीं है। न्यू कालोनी में अपोलो अस्पताल भी कुछ माह पूर्व सील हुआ था जिसका संचालन शुरू कर दिया गया है। पथरदेवा में आशिफा के नाम से संचालित अस्पताल को दो माह पूर्व सील कर दिया गया था। बगल के मकान में मेडी केयर के नाम से संचालित किया जा रहा है। देवरिया-सलेमपुर रोड के सोंदा और गोरखपुर रोड पर भी निजी अस्पतालों का बोर्ड लगाकर इलाज के नाम पर मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है।
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जिले में ऐसे अवैध तरीके से संचालित होने वाले अस्पतालों की संख्या बढ़ती जा रही है। कुछ दिन पूर्व डीएम ने भी अवैध जांच केंद्र और अवैध अस्पतालों पर अभियान चलाकर कार्रवाई के लिए आदेश दिए थे, जो ठंडे बस्ते में चली गई।
ऐसे होता है खेल
- जानकारों के अनुसार अस्पताल बिना किसी मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में सील नहीं किया जा सकता है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की टीम मौके पर पहुंचकर अस्पताल को सील कर देती है। संचालक कुछ दिन बाद सील को खोल लेता है। इस खेल को अंजाम विभागीय मिलीभगत से की जाती है। जिस मकान में अस्पताल होता है, उस मकान मालिक से शपथ पत्र सीएमओ कार्यालय के बाबू लेते हैं। दिए गए शपथ पत्र में कहा जाता है कि मकान की दूसरी मंजिल या तीसरी मंजिल पर जाने का रास्ता नहीं है, या अब से मकान में इस अस्पताल का संचालन नहीं करने देंगे। इसी तर्क के बाद अस्पताल का सील खोलने का निर्देश सीएमओ कार्यालय से मिल जाता है, लेकिन धरातल पर ऐसा होता नहीं है। अस्पतालों का नाम बदलकर या उसी नाम से अस्पताल का संचालन शुरू कर दिया जाता है।
एक ही डॉक्टर के नाम पर संचालित हो रहे दो अस्पताल
-राघव नगर में अरूण अल्ट्रासाउंड को कुछ माह पूर्व स्वास्थ्य विभाग की टीम ने सील कर दिया। जिस डॉक्टर के नाम पर रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन हुआ है। उस डॉक्टर के नाम से गोरखपुर ओवरब्रिज के पास अस्पताल का संचालन हो रहा है। यह एक मामला नहीं है। शहर में ही कई ऐसे अस्पताल हैं, जो एक डॉक्टर के नाम से ही इनका रजिस्ट्रेशन है। सब कुछ जानने के बाद जिम्मेदार अंजान बने हुए हैं।
बोर्ड पर बड़े डॉक्टरों के नाम लिखवाकर फंसाते हैं
शहर के निजी अस्पतालों पर नामी गिरामी डॉक्टरों का नाम बोर्ड पर लिखवाया गया है, जो आते ही नहीं है। इनके नाम पर झोलाछाप से इलाज कराया जाता है। मरीज की जान जाने या किसी तरह का नुकसान होने पर यह राज खुलता है। एक साल के अंदर प्रसव के दौरान सात से अधिक महिलाओं की जान जा चुकी है, लेकिन किसी भी मामले में सीएमओ कार्यालय की ओर से गंभीर कार्रवाई नहीं की गई है। जिसका नतीजा है कि अवैध अस्पतालों का धंधा कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है।
अवैध हास्पिटल की जांच के लिए टीम गठित की गई है। अभियान चलाकर व शिकायत मिलने पर अवैध रूप से संचालित अस्पतालों को सील किया जाता है। अगर कहीं सील खोलकर अस्पताल संचालित होने की शिकायत मिली तो सख्त कार्रवाई कराई जाएगी।
डॉ. राजेश झा, सीएमओ