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एशियन गेम्स : बाधा दौड़ में 11वें स्थान पर रही चिंता
Updated Wed, 29 Aug 2018 11:23 PM IST
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चिंता यादव।
- फोटो : अमर उजाला
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देवरिया। जकार्ता में चल रहे एशियन गेम्स में बाधा दौड़ स्पर्धा में देवरिया की चिंता यादव 11वें स्थान पर रही। एशिया के कई देशों की खिलाड़ियों को पछाड़ते हुए उसने महज 10.26 मिनट में दौड़ पूरी की। गांव की कच्ची सड़कों पर दौड़ लगाने वाली चिंता की यह पहली अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा थी। पहले प्रयास चिंता को मिली उपलब्धि से पूरा गांव खुश है। उन्हें उम्मीद है कि मुश्किलों को पार कर एशियन गेम्स में पहुंची चिंता जल्द ही ओलंपिक मेडल जीतकर जिले का मान बढ़ाएगी।
बैदा कंवर निवासी चिंता यादव गरीबी में पली-बढ़ी है। महज दो बीघा खेत से पूरे परिवार का भरण-पोषण करने वाले दिव्यांग पिता रामविदेश यादव (अब स्वर्गीय) ने कदम-कदम पर मुश्किलों के बाद भी बिटिया के हौसले को कम नहीं होने दिया। लोगों के ताने सुने, विरोध झेला, फिर भी बेटी को खेल में आगे बढ़ने से नहीं रोका। यही कारण है कि चिंता यादव छोटे से बैदा कंवर गांव से निकल कर एशियन गेम्स तक पहुंची। इस प्रतियोगिता में उसे भले ही मेडल न मिल सका हो, लेकिन सपनों को नई मंजिल जरूर मिली है। फोन पर हुई बातचीत में चिंता ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि यह उसकी पहली अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा थी। 45 देशों के खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। वह बेहद तनाव में थी। बावजूद इसके उसने अपनी ओर से बेहतर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बकौल चिंता, एशियन गेम्स से महज 10 दिन पहले भूटान में अचानक तबीयत खराब हो गई थी, जिससे अभ्यास प्रभावित हुआ। चिंता का कहना है कि देश के लिए मेडल न जीत पाने का मलाल तो है, लेकिन स्पर्धा का हिस्सा बनना भी उसके लिए बड़ी बात है। अब उसका लक्ष्य वर्ष 2020 के ओलंपिक में मेडल जीतना है।
भारत को मिला सिल्वर
- बाधा दौड़ की जिस स्पर्धा में चिंता को 11वां स्थान मिला उसका सिल्वर मेडल भारत के ही नाम रहा। 27 अगस्त की रात हुई स्पर्धा में बहरीन की यावी ब्रिनफिड को गोल्ड (9.36 मिनट), भारत की सुधा सिंह (9.40 मिनट) को सिल्वर और वियतनाम की गुयान (9.43 मिनट) को ब्रांज मेडल हासिल हुआ।
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बैदा कंवर निवासी चिंता यादव गरीबी में पली-बढ़ी है। महज दो बीघा खेत से पूरे परिवार का भरण-पोषण करने वाले दिव्यांग पिता रामविदेश यादव (अब स्वर्गीय) ने कदम-कदम पर मुश्किलों के बाद भी बिटिया के हौसले को कम नहीं होने दिया। लोगों के ताने सुने, विरोध झेला, फिर भी बेटी को खेल में आगे बढ़ने से नहीं रोका। यही कारण है कि चिंता यादव छोटे से बैदा कंवर गांव से निकल कर एशियन गेम्स तक पहुंची। इस प्रतियोगिता में उसे भले ही मेडल न मिल सका हो, लेकिन सपनों को नई मंजिल जरूर मिली है। फोन पर हुई बातचीत में चिंता ने ‘अमर उजाला’ को बताया कि यह उसकी पहली अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धा थी। 45 देशों के खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। वह बेहद तनाव में थी। बावजूद इसके उसने अपनी ओर से बेहतर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बकौल चिंता, एशियन गेम्स से महज 10 दिन पहले भूटान में अचानक तबीयत खराब हो गई थी, जिससे अभ्यास प्रभावित हुआ। चिंता का कहना है कि देश के लिए मेडल न जीत पाने का मलाल तो है, लेकिन स्पर्धा का हिस्सा बनना भी उसके लिए बड़ी बात है। अब उसका लक्ष्य वर्ष 2020 के ओलंपिक में मेडल जीतना है।
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भारत को मिला सिल्वर
- बाधा दौड़ की जिस स्पर्धा में चिंता को 11वां स्थान मिला उसका सिल्वर मेडल भारत के ही नाम रहा। 27 अगस्त की रात हुई स्पर्धा में बहरीन की यावी ब्रिनफिड को गोल्ड (9.36 मिनट), भारत की सुधा सिंह (9.40 मिनट) को सिल्वर और वियतनाम की गुयान (9.43 मिनट) को ब्रांज मेडल हासिल हुआ।
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