{"_id":"68e41e61a884eda5cd0faf5a","slug":"there-are-no-measures-to-deal-with-fire-in-hospitals-patients-in-danger-chitrakoot-news-c-215-1-ckt1003-121657-2025-10-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"Chitrakoot News: अस्पतालों में आग से निपटने के उपाय नहीं, खतरे में मरीज","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Chitrakoot News: अस्पतालों में आग से निपटने के उपाय नहीं, खतरे में मरीज
Tue, 07 Oct 2025 01:24 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
संवाद न्यूज एजेंसी, चित्रकूट
Updated Tue, 07 Oct 2025 01:24 AM IST
विज्ञापन
फोटो 28 सीकेटीपी-11- परिचय- जिला अस्पताल में लगा आग बुझाने के लिए गैस सिलींडर । संवाद
चित्रकूट। जिला चिकित्सालय के साथ सभी सरकारी व निजी अस्पतालों में आग से निपटने की समुचित व्यवस्था नहीं है। न ही मानक पूर्ण अग्नि सुरक्षा यंत्र हैं और न ही संचालित करने वाले फायर फाइटर। कई निजी अस्पतालों में आपातकालीन दरवाजा भी नहीं है। इसी कारण अग्नि शमन विभाग ने किसी भी सरकारी व गैर सरकारी अस्पताल को एनओसी नहीं दिया है। हालांकि कार्यशीलता प्रमाणपत्र देकर संचालकों की राह आसान कर दी। इस वजह से इन अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों व तीमारदारों के जीवन को खतरा बना रहता है।
जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल के ट्रामा सेंटर में रविवार की रात आग लगने से सात मरीज जिंदा जल गए। इस घटना के बाद जिले के सरकारी व निजी अस्पतालों में अग्निसुरक्षा के दावों की पड़ताल की गई, जिसमें कई खामियां सामने आईं। फायर विभाग के अनुसार, जिला अस्पताल, सात सीएचसी और 29 पीएचसी में किसी को भी अग्निसुरक्षा की अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) नहीं दी गई है। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, जिले में 52 निजी अस्पताल हैं, इनमें से किसी के पास भी एनओसी नहीं है। केवल कार्यशीलता प्रमाणपत्र पर ही संचालन हो रहा है।
-- -
सेटअप लगाया, संचालन की राह आसान नहीं
जिला अस्पताल में दो करोड़ रुपये से फायर पाइपलाइन लगाने का काम तीन साल पहले शुरू किया गया था, जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है। करीब एक करोड़ रुपये भुगतान हो चुका है। इसके बावजूद कार्यदायी संस्था यूपीपीसीएल ने बोरिंग, पंपरूम, सेंसर सहित अन्य काम पूरा नहीं किया। यूपीपीसीएल के जेई करमचंद्र यादव ने बताया कि भुगतान नहीं होने से काम रुका हुआ है। बजट की मांग की गई है।
विज्ञापन
जर्जर वायरिंग से हो सकता बड़ा हादसा
जिला अस्पताल बनाते समय पूरे भवन में बिजली की वायरिंग की गई थी। उस समय उपकरणों की संख्या कम थी। धीरे-धीरे उपकरणों की संख्या बढ़ी, लेकिन तार वही हैं। इससे तारों पर अधिक लोड पड़ रहा है। फाल्ट होने पर तारों में जोड़ने के लिए टेप लगाया जाता है, जिससे अक्सर तारों से चिंगारी निकलती है। इससे हादसे का अंदेशा बना रहता है।
-- -
निजी अस्पतालों में आपातकालीन द्वार भी नहीं
जिले के निजी अस्पतालों में एक ही गेट है। आग की घटना होने पर मरीजों व तीमारदारों के लिए दूसरा मार्ग (आपातकालीन) नहीं है। इस वजह से आग लगने पर बड़ा हादसा हो सकता है। मानक विहीन होने के बावजूद 52 अस्पतालों को पंजीकृत किया गया है।
-- क्या है नियम--
सभी सरकारी व निजी अस्पतालों का फायर एनओसी न होने से भवन निर्माण के लिए नक्शा भी पास नहीं हो सकता। यहां केवल कार्यशीलता प्रमाण पत्र पर रजिस्ट्रेशन किया गया है। स्वास्थ्य विभाग ने इसे जरूरी नहीं माना।
-- -
जिला अस्पताल के महिला, पुरुष, इमरजेंसी वार्ड सहित अन्य जगहों पर फायर के छोटे-बड़े 22 सिलिंडर लगे हैं। आग लगने पर इनसे काबू पाया जा सकता है। फायर पाइपलाइन का काम अधूरा है। इसे पूरा करने के लिए कई बार पत्र लिखा गया है।
-डॉ. शैलेंद्र कुमार, सीएमएस, जिला अस्पताल
विज्ञापन
जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल के ट्रामा सेंटर में रविवार की रात आग लगने से सात मरीज जिंदा जल गए। इस घटना के बाद जिले के सरकारी व निजी अस्पतालों में अग्निसुरक्षा के दावों की पड़ताल की गई, जिसमें कई खामियां सामने आईं। फायर विभाग के अनुसार, जिला अस्पताल, सात सीएचसी और 29 पीएचसी में किसी को भी अग्निसुरक्षा की अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) नहीं दी गई है। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, जिले में 52 निजी अस्पताल हैं, इनमें से किसी के पास भी एनओसी नहीं है। केवल कार्यशीलता प्रमाणपत्र पर ही संचालन हो रहा है।
विज्ञापन
सेटअप लगाया, संचालन की राह आसान नहीं
जिला अस्पताल में दो करोड़ रुपये से फायर पाइपलाइन लगाने का काम तीन साल पहले शुरू किया गया था, जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है। करीब एक करोड़ रुपये भुगतान हो चुका है। इसके बावजूद कार्यदायी संस्था यूपीपीसीएल ने बोरिंग, पंपरूम, सेंसर सहित अन्य काम पूरा नहीं किया। यूपीपीसीएल के जेई करमचंद्र यादव ने बताया कि भुगतान नहीं होने से काम रुका हुआ है। बजट की मांग की गई है।
विज्ञापन
जर्जर वायरिंग से हो सकता बड़ा हादसा
जिला अस्पताल बनाते समय पूरे भवन में बिजली की वायरिंग की गई थी। उस समय उपकरणों की संख्या कम थी। धीरे-धीरे उपकरणों की संख्या बढ़ी, लेकिन तार वही हैं। इससे तारों पर अधिक लोड पड़ रहा है। फाल्ट होने पर तारों में जोड़ने के लिए टेप लगाया जाता है, जिससे अक्सर तारों से चिंगारी निकलती है। इससे हादसे का अंदेशा बना रहता है।
निजी अस्पतालों में आपातकालीन द्वार भी नहीं
जिले के निजी अस्पतालों में एक ही गेट है। आग की घटना होने पर मरीजों व तीमारदारों के लिए दूसरा मार्ग (आपातकालीन) नहीं है। इस वजह से आग लगने पर बड़ा हादसा हो सकता है। मानक विहीन होने के बावजूद 52 अस्पतालों को पंजीकृत किया गया है।
सभी सरकारी व निजी अस्पतालों का फायर एनओसी न होने से भवन निर्माण के लिए नक्शा भी पास नहीं हो सकता। यहां केवल कार्यशीलता प्रमाण पत्र पर रजिस्ट्रेशन किया गया है। स्वास्थ्य विभाग ने इसे जरूरी नहीं माना।
जिला अस्पताल के महिला, पुरुष, इमरजेंसी वार्ड सहित अन्य जगहों पर फायर के छोटे-बड़े 22 सिलिंडर लगे हैं। आग लगने पर इनसे काबू पाया जा सकता है। फायर पाइपलाइन का काम अधूरा है। इसे पूरा करने के लिए कई बार पत्र लिखा गया है।
-डॉ. शैलेंद्र कुमार, सीएमएस, जिला अस्पताल

फोटो 28 सीकेटीपी-11- परिचय- जिला अस्पताल में लगा आग बुझाने के लिए गैस सिलींडर । संवाद