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धर्मनगरी चित्रकूट की माटी के कण-कण में रमे राम
Wed, 06 Mar 2019 11:34 PM IST
akhilesh अखिलेश यादव
धर्मनगरी चित्रकूट की माटी के कण-कण में रमे राम
धर्मनगरी चित्रकूट की माटी के कण-कण में रमे राम
Published by: akhilesh अखिलेश यादव
Updated Wed, 06 Mar 2019 11:34 PM IST
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भगवान श्रीराम
- फोटो : Amarujala
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अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। धर्मनगरी में चल रहे 46वें राष्ट्रीय रामायण मेलेे में बुधवार को रामकथा के विद्वानों ने कथा के विभिन्न प्रसंगों पर चर्चाएं कीं। जिसमें चित्रकूट की महिमा की जानकारी दी।
डा. तीरथ दीन पटेल फ तेहगंज ने चित्रकूट की महिमा के बारे में बताया कि यहां कि धूल की भारी विशेषता है जिसका प्रमाण देते हुए कहा कि सम्राट अकबर ने खानखाना रहीम से पूछा था कि ‘धूल उठावत गज चलत, कहु रहीम केहि काज।’ रहीम ने प्रतिउत्तर में कहा कि ’जेहि रज मुनि पत्नी तरी सो ढूंढत गजराज। ‘चित्रकूट की गैल में मुक्ति पड़े बिलखाय, मुक्तिहुं पूंछै श्रीराम से मेरिहु मुक्ति बताओ।’ ऐसी माटी जो कण-कण में राम रमें हैं। हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार डा. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ ने कहा कि चित्रकूट सृष्टि का आदिम केन्द्र है। चित्रकूट विश्व का एक ऐसा विलक्षण तीर्थ है जो सभ्यता, संस्कृति की दृष्टि से सबसे प्राचीनतम सिद्ध हेाता है। विंध्य पर्वत श्रेणियों में यह बसा हुआ है जो हिमालय से भी पुराना है और इसकी सभ्यता सिंधु घाटी से प्राचीन सिद्ध होती है। चित्रकूट की प्राचीनता का उल्लेख महर्षि वाल्मीकि ने गंध मादन के रुप में की है। महर्षि अत्रि ने सिंधु मंथन के समय जिस मंदराचल पर्वत से मंथन करने का उल्लेख प्राप्त होता है वह पर्वत अभी भी अनुसुईया आश्रम के समीप स्थित है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले कोल भील और उनकी भाषा की पहचान की जाए जो वह भारतीय आर्य भाषाओं में सबसे प्राचीनतम सिद्ध हो सकता है। चित्रकूट महातीर्थ है, पीठों में उत्तम है, अर्थ और परमार्थ प्रदाता सबसे सर्वोत्तम है। ‘हे गिरिराज तुम्हारा गौरव हिमगिरि से ऊपर है’, कामदनाथ तुम्हारी महिमा सर्व विदित भू पर है। उन्होंने कहा ऐसा लगता कि यहीं सृष्टि का चिर सौंदर्य फ लित है। विश्व के सबसे पुराने शैल चित्र चित्रकूट के पर्वतों व दिलहरिया मठ के आसपास पाए जाते हैं। कालिंजर और मड़फ ा के किले इस बात के प्रमाण है कि प्रलय काल के बाद भगवान शिव ने विष का पान करके इन्हीं पर्वतों में निवास करके विष का समन किया।
बुंदेलखंड के कवियों ने तुलसी चरित्र ग्रंथ की रचना की
अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। बुधवार रामायण मेला द्वितीय सत्र में संत तुलीदास के प्रति बुंदेलखंड के प्राचीन कवियों द्वारा लिखे गए ग्रंथों की विद्धानों ने जानकारी दी। इसके साथ रामायाण के अन्य प्रसंगों के बारे में बताया।
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उदयशंकर दुबे भदोही ने कहा कि बुंदेलखंड के सलीला रियासत (हमीरपुर) के कमल कुंवरि ने अन्य ग्रंथों की रचना के साथ तुलसी चरित्र ग्रंथ की रचना की थी। जिसका संपादक रामनरेश त्रिपाठी ने किया था जा प्रकाशित हुआ था। दो महत्वपूर्ण ग्रंथ बुंदेलखंड के दो कवियों एक ओरछा राज्य के दरबारी कवि श्री हरिदास तुलसी चिंतामणि ग्रंथ की रचना की थी। जो अभी तक अप्रकाशित है।
हरिजन कवि के बाद झांसी के रामप्रसाद गुलाम नामक कवि ने तुलसी चरित्र की रचना की। इस ग्रंथ की पांडुलिपि संवत 1905 की गोस्वामी तुलसीदास अखाड़ा वाराणसी के महंत विश्वंभर नाथ मिश्र के संग्रह में सुरक्षित है। इस ग्रंथ में कवि ने तुलसी की भवितव्यता के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। इसी कवि ने रामायण महात्म की रचना भी की है जो पांडुलिपि में संग्रहीत है।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर डा. लाल पचौरी ने सीता हरण प्रसंग पर विचार रखा। जिसमें कहा कि रावण ने सीता का अपहरण अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए किया था। उसे विश्वास हो गया था कि भगवान राम परमेश्वर के अवतार हैं। वंदना तिवारी ने कहा ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सद्गुरू का आश्रय लेना आवश्यक होगा। कहा कि ‘प्रथम भगति संतन कर संगा, दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।’ महाराष्ट्र के मुंबई के पं. वीरेन्द्र प्रसाद शास्त्री ने बताया कि जब जीवन में अहंकार का झूठा पर्दा आ जाता है तो मानव अपने संस्कार और संस्कृति से हटकर भटक जाता है। उन्होंने कहा कि परमपिता परमात्मा के प्रति जब तक जीव का समर्पण नहीं होता तब तक वह अपने जीवन पथ से भटकता रहेगा।
होली पर्व पर आधारित नृत्य की रही धूम
चित्रकूट। रामायण मेला में तीसरे दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम में लोकनृत्य, लोकगीत, होली पर आधारित नृत्यों की रही धूम। लखनऊ के संस्कृति विभाग द्वारा प्रेषित संगीता मिश्रा व उनकी टीम द्वारा लोकनृत्य एवं फू लों की होली आदि कार्यक्त्रस्मों को मनोहारी ढंग से प्रस्तुत किया गया जिसे दर्शकों ने सराहा। अयोध्या की वंदना मिश्रा धरोहर शीर्षक से अवध क्षेत्र में घर घर गाये जाने वाले लोकगीतों की आकर्षक प्रस्तुति दी। जिससे दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत करने को मजबूर हो गए।
अविष्का लोककला मंच नई दिल्ली ने होली के बाद राजस्थान की महिलाओं द्वारा गनगौर अर्थात् शिव और गौरी की पूजा को घूमर नृत्य के द्वारा प्रस्तुत किया। साथ ही उनके द्वारा होली पर आकर्षक नृत्य का मंचन किया गया एवं शबरी नवधा भक्ति नृत्य-नाटिका की भाव विभोर कर देने वाली प्रस्तुति दी तथा राजस्थान के प्रसिद्ध भंवई नृत्य जो एक संतुलन की कला है कला का प्रदर्शन किया जिसमें सिर में एक गिलास रखकर उसके ऊपर सात कलश रखते हुए व नंगी तलवारों के धारों, कांच के टुकड़ों, कांच के गिलासों पर खड़े होकर नृत्य की प्रस्तुति दी जिसे दर्शकों ने जमकर सराहा। इसी क्त्रस्म में गंधर्व कल्चरल आर्गनाइजेशन लखनऊ व रामाधीन आर्य मऊरानीपुर द्वारा भजन गायन प्रस्तुत किया गया। मुजफ्फरनगर के राम दरबार बन्धु ने श्रीराम कथा को आधार बनाकर भजन गीत प्रस्तुत किए जो दर्शकों का मन मोह रहे थे। सांस्कृतिक सभा का संचालन डा. करुणा शंकर द्विवेदी ने किया।
रामायण मेला कराने में इनका रहा सहयोग
चित्रकूट। रामायण मेला कराने में विशेष योगदान रामायण मेला के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश कुमार करवरिया व चित्रकूटधाम नगरपालिका की पूर्व अध्यक्ष नीलम करवरिया, भालेन्दु सिंह , प्रद्युम्न कुमार दुबे (लालू भैया), शिवमंगल शास्त्री, मोहम्मद युसूफ बेग, कलीमुद्दीन बेग, घनश्याम अवस्थी, हरिप्रसाद दुबे अयोध्या, ज्ञानचन्द्र गुप्ता, राजेन्द्र कुमार त्रिपाठी, मंसूर अली, मनोज मोहन गर्ग, प्रिंस करवरिया, इम्तियाज सहयोग कर रहे हैं।
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चित्रकूट। धर्मनगरी में चल रहे 46वें राष्ट्रीय रामायण मेलेे में बुधवार को रामकथा के विद्वानों ने कथा के विभिन्न प्रसंगों पर चर्चाएं कीं। जिसमें चित्रकूट की महिमा की जानकारी दी।
डा. तीरथ दीन पटेल फ तेहगंज ने चित्रकूट की महिमा के बारे में बताया कि यहां कि धूल की भारी विशेषता है जिसका प्रमाण देते हुए कहा कि सम्राट अकबर ने खानखाना रहीम से पूछा था कि ‘धूल उठावत गज चलत, कहु रहीम केहि काज।’ रहीम ने प्रतिउत्तर में कहा कि ’जेहि रज मुनि पत्नी तरी सो ढूंढत गजराज। ‘चित्रकूट की गैल में मुक्ति पड़े बिलखाय, मुक्तिहुं पूंछै श्रीराम से मेरिहु मुक्ति बताओ।’ ऐसी माटी जो कण-कण में राम रमें हैं। हिन्दी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार डा. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ ने कहा कि चित्रकूट सृष्टि का आदिम केन्द्र है। चित्रकूट विश्व का एक ऐसा विलक्षण तीर्थ है जो सभ्यता, संस्कृति की दृष्टि से सबसे प्राचीनतम सिद्ध हेाता है। विंध्य पर्वत श्रेणियों में यह बसा हुआ है जो हिमालय से भी पुराना है और इसकी सभ्यता सिंधु घाटी से प्राचीन सिद्ध होती है। चित्रकूट की प्राचीनता का उल्लेख महर्षि वाल्मीकि ने गंध मादन के रुप में की है। महर्षि अत्रि ने सिंधु मंथन के समय जिस मंदराचल पर्वत से मंथन करने का उल्लेख प्राप्त होता है वह पर्वत अभी भी अनुसुईया आश्रम के समीप स्थित है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले कोल भील और उनकी भाषा की पहचान की जाए जो वह भारतीय आर्य भाषाओं में सबसे प्राचीनतम सिद्ध हो सकता है। चित्रकूट महातीर्थ है, पीठों में उत्तम है, अर्थ और परमार्थ प्रदाता सबसे सर्वोत्तम है। ‘हे गिरिराज तुम्हारा गौरव हिमगिरि से ऊपर है’, कामदनाथ तुम्हारी महिमा सर्व विदित भू पर है। उन्होंने कहा ऐसा लगता कि यहीं सृष्टि का चिर सौंदर्य फ लित है। विश्व के सबसे पुराने शैल चित्र चित्रकूट के पर्वतों व दिलहरिया मठ के आसपास पाए जाते हैं। कालिंजर और मड़फ ा के किले इस बात के प्रमाण है कि प्रलय काल के बाद भगवान शिव ने विष का पान करके इन्हीं पर्वतों में निवास करके विष का समन किया।
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बुंदेलखंड के कवियों ने तुलसी चरित्र ग्रंथ की रचना की
अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। बुधवार रामायण मेला द्वितीय सत्र में संत तुलीदास के प्रति बुंदेलखंड के प्राचीन कवियों द्वारा लिखे गए ग्रंथों की विद्धानों ने जानकारी दी। इसके साथ रामायाण के अन्य प्रसंगों के बारे में बताया।
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उदयशंकर दुबे भदोही ने कहा कि बुंदेलखंड के सलीला रियासत (हमीरपुर) के कमल कुंवरि ने अन्य ग्रंथों की रचना के साथ तुलसी चरित्र ग्रंथ की रचना की थी। जिसका संपादक रामनरेश त्रिपाठी ने किया था जा प्रकाशित हुआ था। दो महत्वपूर्ण ग्रंथ बुंदेलखंड के दो कवियों एक ओरछा राज्य के दरबारी कवि श्री हरिदास तुलसी चिंतामणि ग्रंथ की रचना की थी। जो अभी तक अप्रकाशित है।
हरिजन कवि के बाद झांसी के रामप्रसाद गुलाम नामक कवि ने तुलसी चरित्र की रचना की। इस ग्रंथ की पांडुलिपि संवत 1905 की गोस्वामी तुलसीदास अखाड़ा वाराणसी के महंत विश्वंभर नाथ मिश्र के संग्रह में सुरक्षित है। इस ग्रंथ में कवि ने तुलसी की भवितव्यता के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी दी है। इसी कवि ने रामायण महात्म की रचना भी की है जो पांडुलिपि में संग्रहीत है।
मध्य प्रदेश के ग्वालियर डा. लाल पचौरी ने सीता हरण प्रसंग पर विचार रखा। जिसमें कहा कि रावण ने सीता का अपहरण अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए किया था। उसे विश्वास हो गया था कि भगवान राम परमेश्वर के अवतार हैं। वंदना तिवारी ने कहा ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सद्गुरू का आश्रय लेना आवश्यक होगा। कहा कि ‘प्रथम भगति संतन कर संगा, दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।’ महाराष्ट्र के मुंबई के पं. वीरेन्द्र प्रसाद शास्त्री ने बताया कि जब जीवन में अहंकार का झूठा पर्दा आ जाता है तो मानव अपने संस्कार और संस्कृति से हटकर भटक जाता है। उन्होंने कहा कि परमपिता परमात्मा के प्रति जब तक जीव का समर्पण नहीं होता तब तक वह अपने जीवन पथ से भटकता रहेगा।
होली पर्व पर आधारित नृत्य की रही धूम
चित्रकूट। रामायण मेला में तीसरे दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम में लोकनृत्य, लोकगीत, होली पर आधारित नृत्यों की रही धूम। लखनऊ के संस्कृति विभाग द्वारा प्रेषित संगीता मिश्रा व उनकी टीम द्वारा लोकनृत्य एवं फू लों की होली आदि कार्यक्त्रस्मों को मनोहारी ढंग से प्रस्तुत किया गया जिसे दर्शकों ने सराहा। अयोध्या की वंदना मिश्रा धरोहर शीर्षक से अवध क्षेत्र में घर घर गाये जाने वाले लोकगीतों की आकर्षक प्रस्तुति दी। जिससे दर्शक तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत करने को मजबूर हो गए।
अविष्का लोककला मंच नई दिल्ली ने होली के बाद राजस्थान की महिलाओं द्वारा गनगौर अर्थात् शिव और गौरी की पूजा को घूमर नृत्य के द्वारा प्रस्तुत किया। साथ ही उनके द्वारा होली पर आकर्षक नृत्य का मंचन किया गया एवं शबरी नवधा भक्ति नृत्य-नाटिका की भाव विभोर कर देने वाली प्रस्तुति दी तथा राजस्थान के प्रसिद्ध भंवई नृत्य जो एक संतुलन की कला है कला का प्रदर्शन किया जिसमें सिर में एक गिलास रखकर उसके ऊपर सात कलश रखते हुए व नंगी तलवारों के धारों, कांच के टुकड़ों, कांच के गिलासों पर खड़े होकर नृत्य की प्रस्तुति दी जिसे दर्शकों ने जमकर सराहा। इसी क्त्रस्म में गंधर्व कल्चरल आर्गनाइजेशन लखनऊ व रामाधीन आर्य मऊरानीपुर द्वारा भजन गायन प्रस्तुत किया गया। मुजफ्फरनगर के राम दरबार बन्धु ने श्रीराम कथा को आधार बनाकर भजन गीत प्रस्तुत किए जो दर्शकों का मन मोह रहे थे। सांस्कृतिक सभा का संचालन डा. करुणा शंकर द्विवेदी ने किया।
रामायण मेला कराने में इनका रहा सहयोग
चित्रकूट। रामायण मेला कराने में विशेष योगदान रामायण मेला के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश कुमार करवरिया व चित्रकूटधाम नगरपालिका की पूर्व अध्यक्ष नीलम करवरिया, भालेन्दु सिंह , प्रद्युम्न कुमार दुबे (लालू भैया), शिवमंगल शास्त्री, मोहम्मद युसूफ बेग, कलीमुद्दीन बेग, घनश्याम अवस्थी, हरिप्रसाद दुबे अयोध्या, ज्ञानचन्द्र गुप्ता, राजेन्द्र कुमार त्रिपाठी, मंसूर अली, मनोज मोहन गर्ग, प्रिंस करवरिया, इम्तियाज सहयोग कर रहे हैं।