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मंडी निर्माण घोटाला : आठ करोड़ के खेल में अफसर अब भी पुलिस की पकड़ से दूर
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अन्य मंडियों की जांच से खुल सकते हैं कई राज
संवाद न्यूज एजेंसी
चित्रकूट। विशिष्ट मंडी में हुए करीब आठ करोड़ रुपये के निर्माण घोटाले में कार्रवाई जारी है। जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कई अफसर निलंबित हो चुके हैं। हालांकि इस खेल के शातिर अफसर अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। अब इस घोटाले की जांच के दायरे में अन्य मंडियां भी शक के घेरे में आ गई हैं।
मंडी निर्माण के शुरुआती दौर से ही गड़बड़ियों का खेल शुरू हो गया था। तत्कालीन उपनिदेशक (निर्माण) एमएम कांत, सहायक अभियंता अनिल त्रिपाठी और अवर अभियंता रामेंद्र सिंह ने कार्यदायी संस्था मेसर्स ग्लेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, गाजियाबाद के पदाधिकारियों के साथ कथित मिलीभगत कर बिना वास्तविक सत्यापन और वित्तीय परीक्षण के ओवर मेजरमेंट, अधिक मूल्यांकन और नियमों के विपरीत भुगतान कराए। जांच में सामने आया कि सहायक अभियंता स्तर से तैयार रिपोर्ट को अवर अभियंता की संस्तुति के बाद उपनिदेशक (निर्माण) की स्वीकृति के लिए भेजा जाता था। इसी प्रक्रिया के जरिए करोड़ों रुपये के भुगतान किए गए। जांच के बाद तीनों अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी अब तक नहीं हो सकी है। इसके बाद में उपनिदेशक (निर्माण) सुरेश चंद्र और अशोक कुमार के कार्यकाल में भी यही प्रक्रिया जारी रही। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि अधिकांश वित्तीय अनियमितताएं पहले ही हो चुकी थीं।
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अन्य मंडियों की जांच की उठी मांग
विशिष्ट मंडी घोटाले के बाद अब सूपा (महोबा), बांदा, धनौरी समेत अन्य छोटी मंडियों में कराए गए निर्माण कार्यों की भी जांच की मांग उठने लगी है। सूत्रों का कहना है कि इन परियोजनाओं में भी तत्कालीन उपनिदेशक (निर्माण) एमएम कांत, सहायक अभियंता अनिल त्रिपाठी और अवर अभियंता रामेंद्र सिंह की भूमिका रही है। यदि इन निर्माण कार्यों की भी निष्पक्ष जांच कराई जाती है तो बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है।
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सूपा मंडी का भवन और सड़कें जर्जर
सूपा मंडी की स्थिति भी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रही है। मंडी सचिव आरके चतुर्वेदी ने बताया कि मंडी में करीब 40 प्रतिशत निर्माण कार्य ही पूरा हुआ है। जो निर्माण हुआ है, वह भी मानकों के अनुरूप नहीं है। भवन रहने लायक नहीं हैं, चबूतरे क्षतिग्रस्त हैं और सड़कें भी जर्जर हो चुकी हैं। विशिष्ट मंडी घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे अन्य मंडियों में हुए निर्माण कार्य भी जांच के दायरे में लाने की मांग तेज हो रही है। लोगों का मानना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हुई तो कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
चित्रकूट। विशिष्ट मंडी में हुए करीब आठ करोड़ रुपये के निर्माण घोटाले में कार्रवाई जारी है। जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कई अफसर निलंबित हो चुके हैं। हालांकि इस खेल के शातिर अफसर अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। अब इस घोटाले की जांच के दायरे में अन्य मंडियां भी शक के घेरे में आ गई हैं।
मंडी निर्माण के शुरुआती दौर से ही गड़बड़ियों का खेल शुरू हो गया था। तत्कालीन उपनिदेशक (निर्माण) एमएम कांत, सहायक अभियंता अनिल त्रिपाठी और अवर अभियंता रामेंद्र सिंह ने कार्यदायी संस्था मेसर्स ग्लेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, गाजियाबाद के पदाधिकारियों के साथ कथित मिलीभगत कर बिना वास्तविक सत्यापन और वित्तीय परीक्षण के ओवर मेजरमेंट, अधिक मूल्यांकन और नियमों के विपरीत भुगतान कराए। जांच में सामने आया कि सहायक अभियंता स्तर से तैयार रिपोर्ट को अवर अभियंता की संस्तुति के बाद उपनिदेशक (निर्माण) की स्वीकृति के लिए भेजा जाता था। इसी प्रक्रिया के जरिए करोड़ों रुपये के भुगतान किए गए। जांच के बाद तीनों अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी अब तक नहीं हो सकी है। इसके बाद में उपनिदेशक (निर्माण) सुरेश चंद्र और अशोक कुमार के कार्यकाल में भी यही प्रक्रिया जारी रही। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि अधिकांश वित्तीय अनियमितताएं पहले ही हो चुकी थीं।
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अन्य मंडियों की जांच की उठी मांग
विशिष्ट मंडी घोटाले के बाद अब सूपा (महोबा), बांदा, धनौरी समेत अन्य छोटी मंडियों में कराए गए निर्माण कार्यों की भी जांच की मांग उठने लगी है। सूत्रों का कहना है कि इन परियोजनाओं में भी तत्कालीन उपनिदेशक (निर्माण) एमएम कांत, सहायक अभियंता अनिल त्रिपाठी और अवर अभियंता रामेंद्र सिंह की भूमिका रही है। यदि इन निर्माण कार्यों की भी निष्पक्ष जांच कराई जाती है तो बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है।
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सूपा मंडी का भवन और सड़कें जर्जर
सूपा मंडी की स्थिति भी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर रही है। मंडी सचिव आरके चतुर्वेदी ने बताया कि मंडी में करीब 40 प्रतिशत निर्माण कार्य ही पूरा हुआ है। जो निर्माण हुआ है, वह भी मानकों के अनुरूप नहीं है। भवन रहने लायक नहीं हैं, चबूतरे क्षतिग्रस्त हैं और सड़कें भी जर्जर हो चुकी हैं। विशिष्ट मंडी घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे अन्य मंडियों में हुए निर्माण कार्य भी जांच के दायरे में लाने की मांग तेज हो रही है। लोगों का मानना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हुई तो कई और बड़े खुलासे हो सकते हैं।