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धर्म-राजनीति में समन्वय हो तो प्रगतिशील बनेगा देश

Fri, 08 Mar 2019 11:31 PM IST
akhilesh अखिलेश यादव धर्म-राजनीति में समन्वय हो तो प्रगतिशील बनेगा देश
धर्म-राजनीति में समन्वय हो तो प्रगतिशील बनेगा देश Published by: akhilesh अखिलेश यादव Updated Fri, 08 Mar 2019 11:31 PM IST
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Coordination in religion-politics will make progressive country
puja - फोटो : Amarujala

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अमर उजाला ब्यूरो
चित्रकूट। भगवान श्रीराम की कर्मस्थली में डा. राममनोहर लोहिया की परिकल्पना पर आधारित राष्ट्रीय रामायण मेले का समापन प्रयागराज से आए जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने मां सरस्वती व भगवान कामतानाथ की पूजा कर किया। उन्होंने वर्तमान में देश में चल रहे धर्म और राजनीति के माहौल पर कहा कि धर्म और राजनीति एक दूसरे के पोषक हैं। जब तक दोनों समन्वयित रहते हैं देश प्रगतिशील व विकासशील रहता है। जैसे ही धर्म पंगु होता है राजनीति अंधी हो जाती है।
 शुक्रवार की शाम को समापन पर जगद्गुरु ने कहा कि राम के जीवन आदर्श हमारे जीवन में भी होने चाहिए।

अगर सरलता से किसी ग्रंथ के द्वारा जन-जन तक राम के चरित्र का प्रवेश हो सकता है तो वह है श्री राम चरितमानस। रामचरित मानस कठिन से कठिन दार्शनिक विषयों का समाधान करने वाला ग्रंथ है। लोगों को रामायण मेला को विद्वानों का प्रसाद समझकर यहां राम चरित्र को जानने, समझने व जीवन में उतारने के लिए आना चाहिए। इसके पूर्व रामकथा के प्रख्यात विद्वानों ने रामायण व रामकथा के विभिन्न प्रसंगों पर चर्चा करते हुए कहा कि विश्व शांति के लिए राम के आदर्शों को अपनाना होगा। प्रयागराज के डा. सीताराम सिंह ‘विश्वबंधु’ ने वर्तमान में आतंकवाद की चर्चा करते हुए इसे विश्व शांति एवं समृद्धि में बहुत घातक बताया।
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रामपुर के फ ारुक अहमद रिजवी ने हिंदू और इस्लाम संस्कृति की तुलनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए सनातन संस्कृति की विशेषताओं का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान राम के आदर्श सिर्फ हिंदू और मुसलमान के लिए नहीं अपितु संपूर्ण मानव समाज के लिए आवश्यक हैं। यदि हर हिन्दुस्तानी भगवान राम के आदर्श को अपना ले तो हिन्दुस्तान फि र से विश्वगुरु का दर्जा प्राप्त कर लेगा। संत तीरथदीन पटेल ने राम नाम की महिमा का बखान करते हुए कहा कि बिना अनुराग के राम नाम की प्राप्ति सुलभ नहीं है। महाराष्ट्र मुंबई के पं. वीरेन्द्र प्रसाद शास्त्री ने जीवन में शांति कैसे प्राप्त की जाए के संबंध में बताया कि हम सभी का जीवन उत्तरोतर मृत्यु की ओर जा रहा है लेकिन संपूर्ण जीवन अशांति से भरा रहा और जीवन में शांति की अनुभूति नहीं कर पाए।    
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अनुसंधानकर्ता डा. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ ने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास ने जिस अवध भाषा को माध्यम बनाकर दोहा, चौपाइयों के सहारे हिंदी भाषी जनता में लोकप्रियता का काम किया। उससे प्रभावित होकर तुलसी के समकालीन किंतु उनके उत्तरार्थ जीवन काल में ही महाकवि लालदास ने ‘अवध विलास’ महाकाव्य की रचना की।  बिहार रांची के डा. जंगबहादुर पांडेय ,आचार्य शुक्ल ,राजस्थान जयपुर की डा. सरोज गुप्ता,डा. हरिप्रसाद दुबे अयोध्या ,डा. सभापति मिश्र आदि मौजूद रहे।
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