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अलगौजा की लय मन भायी

Mon, 23 Mar 2015 11:31 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला चित्रकूट।
ब्यूरो/अमर उजाला चित्रकूट। Updated Mon, 23 Mar 2015 11:31 PM IST
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algoja sound touches the heart

समाजसेवा संस्थान रानीपुर भट्ट में चल रहे लोकलय समारोह के अंतिम दिन बलमा, ढिमरिहाई आदि लोक शैली गायन और चंगेलिया नृत्य आकर्षण का केंद्र रहा। लोगों ने इस उम्मीद से एक दूसरे से विदा ली कि लोक कला शैली की पहचान कायम रहेगी।

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समारोह में पाठा के लोक कलाकारों ने बलमा गायन किया। पवन चलै परवइया, अचरा उड़ि उड़ि जाए/ ससुरा के संग न जइबै भौजी, अरे मुड़वां ओढ़त दिन जाए... को लोगों ने खूब सराहा। आम तौर पर बलमा गायन पाठा में महिलाएं खेतों में काम करते समय गाती हैं। इसी तरह ढिमिकी गिरौठा झांसी के शिक्षक द्वारिका प्रसाद यादव ने विलुप्त हो रहे अलगौजा वाद्य यंत्र को बजाया तो श्रोता झूमने लगे। इसमें बांसुरी जैसे दो वाद्य यंत्रों को एक साथ बजाया जाता है। मड़ावारा (ललितपुर) की टीम ने ढिमरिहाई से लोगों का मन मोह लिया।
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आम तौर पर मछली जाल में फंसने पर गरीब ग्रामीण खुशी में यह गीत गाते हैं... मोड़ी मोड़ा के खुल गए भाग, बींध गई जल मछली। इसके बाद डा. शशि, रामावती, किरन आदि ने चंगेलिया नृत्य प्रस्तुत किया। बुंदेलखंड में यह परंपरा है कि बच्चे की पैदाइश पर बुआ चंगेलिया लेकर भाई के यहां जाती है और भाई इसे उतारकर बहन को उपहार (नेग) देता है। गीत... सुआ ससुरलिया मा बोला जाए, जाओ कहो मोरे बारे ससुर से चलती पवन लई जाए... से इसे अभिव्यक्त किया।
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वहीं आकाशवाणी दिल्ली की उद्घोषिका और लोक कलाकार डा. वीणा और उनके सहयोगियों ने विवाह से लेकर विदाई तक के लोकगीतों को सारगर्भित तरीके से प्रस्तुत किया। ऊपर बदर गहराए हो तरे गोरी पानी को धारे/ हम पैं मूंगन की माला, हमार कोई गगरी उतारे... और बाबुल दई कन्यादान, निबाहन हम चलै/ छूटौ बाबुल को दैश निबाहन हम चलै... सुनकर लोग भावविभोर हो गए।


ग्रामोदय विवि की छात्रा अंजना ओझा ने बंगरा गाया- जनकनगर में जइयो मना, उतै धनुष धरै हैं...। छात्रा सुमित्रा और छात्र अटल की प्रस्तुतियां भी सराही गईं। मौके पर देवारी के कलाकार श्रीपाल को संस्थान के संस्थापक गोपाल भाई और राजेश टंडन आदि ने सम्मानित किया। संस्थान के निदेशक भागवत प्रसाद ने सभी का आभार व्यक्त किया।

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