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रासायनिक की जगह हरी खाद का करें प्रयोग : विनोद
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कंदवा। रासायनिक खाद के बढ़ते प्रयोग से खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति घट रही है। इसका सीधा असर फसलों के उत्पादन पर पड़ रहा है। किसान बेहतर उत्पादन के लिए रासायनिक की जगह हरी खाद का उपयोग करें। इससे खर्च भी कम पड़ता है।
यह जानकारी जिला कृषि अधिकारी विनोद कुमार यादव ने दी। उन्होंने कहा कि किसान रासायनिक खाद का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। खास तौर से धान और गेहूं की फसल में जमकर रासायनिक खाद का प्रयोग होता है। रासायनिक खाद के प्रयोग से मिट्टी के लिए आवश्यक 16 पोषक तत्वों की आपूर्ति नहीं हो पाती है। इससे बचने के लिए किसान ढैंचा की खेती कर सकते हैं। यह 16 पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि हरी खाद के प्रयोग से न केवल अच्छी पैदावार मिलती है, बल्कि रासायनिक खाद की अपेक्षा खर्च भी कम किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष जिले को ढैंचा का 666 क्विंटल बीज लगाने के लिए शासन की ओर से निर्देश दिया गया है। ढैंचा की खेती के लिए एक हेक्टेयर में 15 से 18 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। अमूमन ढैंचा का बीज धान लगाने के 45 से 50 दिन पहले लगाया जाता है।
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मई व जून में हल्की बारिश होने के कारण इसके पटवन या विशेष देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है और यह खाली पड़ी जमीन के लिए उपयुक्त होता है। उन्होंने बताया कि ढैंचा कार्बनिक अम्ल पैदा करता है जो लवणीय और क्षारीय भूमि को भी उपजाऊ बना देता है। ढैंचा की विकसित जड़ें मिट्टी में वायु का संचार बढ़ाती हैं। मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्म जीव इसे खाद्य पदार्थ के तौर पर प्रयोग करते हैं। मिट्टी में अपघटन बढ़ने के कारण जैविक गुणों में वृद्धि होने के साथ ही फसलों को आसानी से पोषक तत्व प्राप्त होता है। इससे उत्पादन बढ़ता है।
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यह जानकारी जिला कृषि अधिकारी विनोद कुमार यादव ने दी। उन्होंने कहा कि किसान रासायनिक खाद का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। खास तौर से धान और गेहूं की फसल में जमकर रासायनिक खाद का प्रयोग होता है। रासायनिक खाद के प्रयोग से मिट्टी के लिए आवश्यक 16 पोषक तत्वों की आपूर्ति नहीं हो पाती है। इससे बचने के लिए किसान ढैंचा की खेती कर सकते हैं। यह 16 पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि हरी खाद के प्रयोग से न केवल अच्छी पैदावार मिलती है, बल्कि रासायनिक खाद की अपेक्षा खर्च भी कम किया जा सकता है।
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उन्होंने बताया कि इस वर्ष जिले को ढैंचा का 666 क्विंटल बीज लगाने के लिए शासन की ओर से निर्देश दिया गया है। ढैंचा की खेती के लिए एक हेक्टेयर में 15 से 18 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। अमूमन ढैंचा का बीज धान लगाने के 45 से 50 दिन पहले लगाया जाता है।
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मई व जून में हल्की बारिश होने के कारण इसके पटवन या विशेष देखभाल की आवश्यकता नहीं होती है और यह खाली पड़ी जमीन के लिए उपयुक्त होता है। उन्होंने बताया कि ढैंचा कार्बनिक अम्ल पैदा करता है जो लवणीय और क्षारीय भूमि को भी उपजाऊ बना देता है। ढैंचा की विकसित जड़ें मिट्टी में वायु का संचार बढ़ाती हैं। मिट्टी में उपस्थित सूक्ष्म जीव इसे खाद्य पदार्थ के तौर पर प्रयोग करते हैं। मिट्टी में अपघटन बढ़ने के कारण जैविक गुणों में वृद्धि होने के साथ ही फसलों को आसानी से पोषक तत्व प्राप्त होता है। इससे उत्पादन बढ़ता है।