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डेढ़ साल से खुले आसमान के नीचे जंजीरों में जकड़ा बेजुबान, कोई नहीं दे रहा ध्यान
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पीडीडीयू नगर। इस संसार में कोई ऐसा प्राणी नहीं, जिसे शारीरिक पीड़ा न होती हो। चाहे वह सबसे छोटी चींटी हो या फिर विशालकाय हाथी। अंतर बस इतना है कि इंसान अपनी पीड़ा बयां कर देता है, पर बेजुबान चाहकर भी अपनी पीड़ा किसी से बता नहीं सकता। वन्यजीव संरक्षण विभाग, रामनगर में पिछले डेढ़ सालों से जंजीर में जकड़े गजराज की पीड़ा भी कुछ ऐसी ही है। वह कह नहीं सकता और इंसान उसे समझना नहीं चाहते। पांच डिग्री न्यूनतम तापमान की हाड़कंपाती ठंड, भारी बारिश, गर्मी और चिलचिलाती धूप, यह सब कुछ यह बेजुबान हाथी खड़े-खड़े पिछले 18 महीनों से सह रहा है। पर इसकी पीड़ा दूर करने वाला कोई नहीं। न ही इसका महावत इसका साथ दे रहा है, न मालिक और न ही मुकदमे की सुनवाई करने वाली कोर्ट।
चंदौली के बबुरी मेले में 20 अक्टूबर 2020 को इस हाथी ने रमाशंकर सिंह नाम के व्यक्ति की पटककर हत्या कर दी थी। जिसके बाद महावत और हाथी दोनों पर बबुरी थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। इंसान होने के नाते महावत तो जुगाड़ लगाकर छूट गया पर इस बेजुबान को अभी तक कोर्ट ने बेल नहीं दी। तब से अब तक यह हाथी रामनगर के वन्यजीव संरक्षण, विभाग में एक जगह पर खड़ा है। इसके जौनपुर निवासी मालिक प्रेमशंकर तिवारी ने हाईकोर्ट में अपील भी की है पर दो बार के लॉकडाउन की वजह से मामले की सुनवाई नहीं हो पा रही है। स्थिति यह है कि चारो पैरों में लोहे की जंजीर बंधने से पैर में बड़े गड्ढे हो गए हैं।
महीनों से हाथी का मल भी वहीं जमा है। जिस पर वह खड़ा रहता है। स्थानीय लोगों ने बताया कि जब से यह हाथी आया है किसी ने इसे कभी बैठे हुए नहीं देेखा। यह एक ही स्थान पर डेढ़ साल से खड़ा है। डीएफओ दिनेश सिंह का कहना है कि हाथी को डॉक्टर चेक करते रहते हैं। कोई दिक्कत होने पर दवा दी जाती है। खानपान का पूूरा ध्यान रखा जाता है। रोज इसे नहलाया जाता है। जहां तक बाद इसके आजादी की है तो यह कोर्ट के हाथ में है। लॉकडाउन की वजह से इस बार भी सुनवाई टल गई। ऐसे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि यह कब अपने मालिक के पास जा सकेगा।
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जून 2020 में वन विभाग की ओर से हाथी को दुधवा नेशनल पार्क भेजा जाने लगा। पर उसी दिन उसका मस्त पोजिशन आ गया और उसने गुस्से में विभाग की चारदिवारी तोड़ दी। चार महीने बाद भी इसका मस्त पोजिशन खत्म नहीं हुआ तो दुधवा पार्क ने इसे ले जाने से इंकार कर दिया। उनको आशंका थी कि यह पार्क में उत्पात मचा सकता है। फिर वन विभाग ने मथुरा स्थित एक रेस्क्यू सेंटर में संपर्क किया। वह हाथी को ले जाने को तैयार था पर वन विभाग की प्रार्थना को सीजीएम कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। हाथी के मालिक ने हाइकोर्ट में भी अपील की है पर अभी तक सुनवाई नहीं हुई।
वन विभाग के डीएफओ दिनेश सिंह ने बताया कि हाथी के खानपान और देखरेख में रोजाना करीब एक हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। हाथी के देखरेख और इसे नहलाने के लिए दो कर्मचारी रखे गए हैं। जिनकी प्रतिदिन की मजदूरी 201 रुपये है। हाथी को रोजाना पांच किलो आटा, पांच किलो चावल, दो किलो गुड़, आधा किलो दाल और एक किलो चना खिलाया जाता है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार महीने में हाथी पर 30 हजार रुपये खर्च किए जाते हैं। 18 महीने से हाथी यहां है तो 5.40 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। खाने और देखरेख की हकीकत यह है कि हाथी के पास मल का ढेर लगा हुआ है। उसके शरीर पर धूल की मोटी परत जमी है। वह काफी दुबला भी हो चुका है। ऐसे में देखरेख और खानपान कैसे होता होगा यह तो विभाग ही जाने।
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चंदौली के बबुरी मेले में 20 अक्टूबर 2020 को इस हाथी ने रमाशंकर सिंह नाम के व्यक्ति की पटककर हत्या कर दी थी। जिसके बाद महावत और हाथी दोनों पर बबुरी थाने में मुकदमा दर्ज किया गया। इंसान होने के नाते महावत तो जुगाड़ लगाकर छूट गया पर इस बेजुबान को अभी तक कोर्ट ने बेल नहीं दी। तब से अब तक यह हाथी रामनगर के वन्यजीव संरक्षण, विभाग में एक जगह पर खड़ा है। इसके जौनपुर निवासी मालिक प्रेमशंकर तिवारी ने हाईकोर्ट में अपील भी की है पर दो बार के लॉकडाउन की वजह से मामले की सुनवाई नहीं हो पा रही है। स्थिति यह है कि चारो पैरों में लोहे की जंजीर बंधने से पैर में बड़े गड्ढे हो गए हैं।
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महीनों से हाथी का मल भी वहीं जमा है। जिस पर वह खड़ा रहता है। स्थानीय लोगों ने बताया कि जब से यह हाथी आया है किसी ने इसे कभी बैठे हुए नहीं देेखा। यह एक ही स्थान पर डेढ़ साल से खड़ा है। डीएफओ दिनेश सिंह का कहना है कि हाथी को डॉक्टर चेक करते रहते हैं। कोई दिक्कत होने पर दवा दी जाती है। खानपान का पूूरा ध्यान रखा जाता है। रोज इसे नहलाया जाता है। जहां तक बाद इसके आजादी की है तो यह कोर्ट के हाथ में है। लॉकडाउन की वजह से इस बार भी सुनवाई टल गई। ऐसे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि यह कब अपने मालिक के पास जा सकेगा।
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जून 2020 में वन विभाग की ओर से हाथी को दुधवा नेशनल पार्क भेजा जाने लगा। पर उसी दिन उसका मस्त पोजिशन आ गया और उसने गुस्से में विभाग की चारदिवारी तोड़ दी। चार महीने बाद भी इसका मस्त पोजिशन खत्म नहीं हुआ तो दुधवा पार्क ने इसे ले जाने से इंकार कर दिया। उनको आशंका थी कि यह पार्क में उत्पात मचा सकता है। फिर वन विभाग ने मथुरा स्थित एक रेस्क्यू सेंटर में संपर्क किया। वह हाथी को ले जाने को तैयार था पर वन विभाग की प्रार्थना को सीजीएम कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया। हाथी के मालिक ने हाइकोर्ट में भी अपील की है पर अभी तक सुनवाई नहीं हुई।
वन विभाग के डीएफओ दिनेश सिंह ने बताया कि हाथी के खानपान और देखरेख में रोजाना करीब एक हजार रुपये खर्च हो जाते हैं। हाथी के देखरेख और इसे नहलाने के लिए दो कर्मचारी रखे गए हैं। जिनकी प्रतिदिन की मजदूरी 201 रुपये है। हाथी को रोजाना पांच किलो आटा, पांच किलो चावल, दो किलो गुड़, आधा किलो दाल और एक किलो चना खिलाया जाता है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार महीने में हाथी पर 30 हजार रुपये खर्च किए जाते हैं। 18 महीने से हाथी यहां है तो 5.40 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। खाने और देखरेख की हकीकत यह है कि हाथी के पास मल का ढेर लगा हुआ है। उसके शरीर पर धूल की मोटी परत जमी है। वह काफी दुबला भी हो चुका है। ऐसे में देखरेख और खानपान कैसे होता होगा यह तो विभाग ही जाने।