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माता, पिता, अतिथि और आचार्यों की रक्षा है धर्म की रक्षा
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कंदवा। माता, पिता, अतिथि व आचार्य चारों धर्म के प्रतीक हैं। चारों की रक्षा करना और उनका आदर करना हमारा व्यवहारिक धर्म है। आज मां की दुर्दशा हो रही है। समाज अपने मार्ग से भटक गया है। इसलिए तमाम बुराइयां फैल रही हैं। इसके लिए हमारा समाज दोषी है। ये बातें कसवढ़ डेहरियाडीह में मां भगवती प्राकट्य स्थल पर सोमवार को श्री श्री 108 निर्वाण दर्शनमुनि उदासीन नागा बाबा कमौली वाले ने कही।
इस अवसर पर उन्होंने कहा कि परिवार में जैसा संस्कार होगा बच्चा वैसा ही बनेगा। परिवारवालों की आदतों का बच्चे अनुसरण करते हैं। बच्चों के समक्ष ऐसे व्यवहार या भाषा का प्रयोग न करें जो बच्चों के अनुकरण करने योग्य न हो। माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची आदि लोग बच्चों में बड़ों के प्रति आदर, अपने छोटे भाई बहनों के प्रति त्याग एवं प्रेम की भावना, अतिथियों एवं भिक्षुकों के प्रति सद्भाव आदि संस्कार पैदा करते हैं। बच्चों को समझाने के क्रम में नहीं बल्कि प्रेम का आचरण करना चाहिए। यदि अभिभावक प्रारंभ से ही ध्यान देंगे तो बच्चों को परिवार से आदर्श संस्कार दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रमों में साधु - संतों, समाज सुधारकों एवं राष्ट्रीय चेतना से संपन्न महापुरुषों का जीवन वृत्त अवश्य शामिल होना चाहिए। आज के समाज में मानवीय मूल्यों के क्षरण का प्रमुख कारण पारिवारिक एवं शैक्षिक संस्थाओं में मानवीय मूल्यों का क्षरण ही है। इस अवसर पर चंद्रमौलि मुनि उदासीन, पुंडरीक शास्त्री, निक्की सिंह, अजय सिंह, अप्पू सिंह आदि मौजूद रहे।
प्रेम से अर्पित पत्ते और पुष्प भगवान करते हैं सहज स्वीकार
कंदवा। रामहि केवल प्रेम पियारा, जानि लेहु जो जान निहारा। भगवान को प्रेम सर्वाधिक प्रिय है। प्रेम से अर्पित किए हुए पत्ते व पुष्प भगवान को सहज ही स्वीकार हैं। ये बातें कसवढ़ डेहरियाडीह में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन सोमवार को काशी से पधारे डॉ. पुंडरीक महाराज ने कहीं। महराज ने कहा कि भक्तों के दिल का प्रेम बंधन ही भगवान के प्रेमपाश को बांधने में सक्षम है। लोगों को शांति के लिए कथा को अपने जीवन चरित्र में उतारने की जरूरत है। अगर मन में निश्चल प्रेम नहीं है तो हमें भगवान प्राप्त नहीं हो सकते। अगर भगवान को प्राप्त करना है तो प्रेम को आधार बनाना होगा। श्रीमद्भागवत कथा का प्रभाव मानव जीवन की दिशा ही बदल देता है।
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इस अवसर पर उन्होंने कहा कि परिवार में जैसा संस्कार होगा बच्चा वैसा ही बनेगा। परिवारवालों की आदतों का बच्चे अनुसरण करते हैं। बच्चों के समक्ष ऐसे व्यवहार या भाषा का प्रयोग न करें जो बच्चों के अनुकरण करने योग्य न हो। माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची आदि लोग बच्चों में बड़ों के प्रति आदर, अपने छोटे भाई बहनों के प्रति त्याग एवं प्रेम की भावना, अतिथियों एवं भिक्षुकों के प्रति सद्भाव आदि संस्कार पैदा करते हैं। बच्चों को समझाने के क्रम में नहीं बल्कि प्रेम का आचरण करना चाहिए। यदि अभिभावक प्रारंभ से ही ध्यान देंगे तो बच्चों को परिवार से आदर्श संस्कार दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रमों में साधु - संतों, समाज सुधारकों एवं राष्ट्रीय चेतना से संपन्न महापुरुषों का जीवन वृत्त अवश्य शामिल होना चाहिए। आज के समाज में मानवीय मूल्यों के क्षरण का प्रमुख कारण पारिवारिक एवं शैक्षिक संस्थाओं में मानवीय मूल्यों का क्षरण ही है। इस अवसर पर चंद्रमौलि मुनि उदासीन, पुंडरीक शास्त्री, निक्की सिंह, अजय सिंह, अप्पू सिंह आदि मौजूद रहे।
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प्रेम से अर्पित पत्ते और पुष्प भगवान करते हैं सहज स्वीकार
कंदवा। रामहि केवल प्रेम पियारा, जानि लेहु जो जान निहारा। भगवान को प्रेम सर्वाधिक प्रिय है। प्रेम से अर्पित किए हुए पत्ते व पुष्प भगवान को सहज ही स्वीकार हैं। ये बातें कसवढ़ डेहरियाडीह में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के अंतिम दिन सोमवार को काशी से पधारे डॉ. पुंडरीक महाराज ने कहीं। महराज ने कहा कि भक्तों के दिल का प्रेम बंधन ही भगवान के प्रेमपाश को बांधने में सक्षम है। लोगों को शांति के लिए कथा को अपने जीवन चरित्र में उतारने की जरूरत है। अगर मन में निश्चल प्रेम नहीं है तो हमें भगवान प्राप्त नहीं हो सकते। अगर भगवान को प्राप्त करना है तो प्रेम को आधार बनाना होगा। श्रीमद्भागवत कथा का प्रभाव मानव जीवन की दिशा ही बदल देता है।
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