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गंगा में समा रहे 0अवशेष
ब्यूरो/ अमरउजाला, चंदौली
Updated Mon, 27 Jun 2016 01:44 AM IST
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मौयकालीन अवशेष
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धानापुर विकास खंड में गंगा नदी के तट पर प्रहलादपुर गांव में बौद्ध और गुप्तकालीन नगर के अवशेष गंगा की कटान में समा रहे हैं। इसीलिए सम्राट अशोक महान के पुत्र और पुत्री द्वारा स्थापित स्तंभ को यहां से हटाकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संग्रहालय में रख दिया गया। लेकिन बचे खुचे अवशेष गंगा में समाने के करीब हैं। पुरातत्वविदों को यहां बौद्धकाल के अनेक अवशेष मिले हैं। इस स्थान पर खुदाई करने से और भी अहम जानकारियां मिल सकती हैं।
ब्लाक से 11 किमी दूर प्रहलादपुर गांव है। अंग्रेजी काल में इतिहासकारों ने गंगा तट पर स्थापित 9.15 मीटर ऊंचे और .92 मीटर की परिधि में स्थापित स्तंभ को देखा। सर्वेक्षण में यह स्तंभ मौर्यकालीन पाई गई। 1853 में उसे जेम््स थामसन द्वारा तत्कालीन राजकीय संस्कृत कालेज अब संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में पहुंचा दिया गया। हालांकि यहां के अन्य अवशेषों को छोड दिया गया। 1988 में यहां बीएचयू के पुरातत्वविदों के दल ने खोजबीन की तो यहां 12 सिक्के, मूर्तियां, बर्तन, पुरानी बड़ी ईंट आदि मिले। इसकी कार्बन डेटिंग करायी गई तो इसका समय बुद्ध और गुप्तकालीन पाया गया। डॉ. जयराम सिंह और डा. विनोद सिंह की पुस्तक महाइच का इतिहास में इन चीजों का संकलन किया गया है। उनके अनुसार भगवान बुद्ध ने स्वयं यहां नगरी बसायी थी और बहुत समय तक रहे थे। बाद में अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने इस स्थल का विकास किया। हालांकि मौर्य वंश के बाद पुष्यमित्र शुंग ने इस नगरी को विध्वंस करने का प्रयास किया तथा शिवालय बनवाया। जो अब नष्ट होने की कगार पर है।
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ब्लाक से 11 किमी दूर प्रहलादपुर गांव है। अंग्रेजी काल में इतिहासकारों ने गंगा तट पर स्थापित 9.15 मीटर ऊंचे और .92 मीटर की परिधि में स्थापित स्तंभ को देखा। सर्वेक्षण में यह स्तंभ मौर्यकालीन पाई गई। 1853 में उसे जेम््स थामसन द्वारा तत्कालीन राजकीय संस्कृत कालेज अब संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में पहुंचा दिया गया। हालांकि यहां के अन्य अवशेषों को छोड दिया गया। 1988 में यहां बीएचयू के पुरातत्वविदों के दल ने खोजबीन की तो यहां 12 सिक्के, मूर्तियां, बर्तन, पुरानी बड़ी ईंट आदि मिले। इसकी कार्बन डेटिंग करायी गई तो इसका समय बुद्ध और गुप्तकालीन पाया गया। डॉ. जयराम सिंह और डा. विनोद सिंह की पुस्तक महाइच का इतिहास में इन चीजों का संकलन किया गया है। उनके अनुसार भगवान बुद्ध ने स्वयं यहां नगरी बसायी थी और बहुत समय तक रहे थे। बाद में अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने इस स्थल का विकास किया। हालांकि मौर्य वंश के बाद पुष्यमित्र शुंग ने इस नगरी को विध्वंस करने का प्रयास किया तथा शिवालय बनवाया। जो अब नष्ट होने की कगार पर है।
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