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संगीत दिलाता है तनाव से मुक्ति
ब्यूरो/अमर उजाला, चंदौली
Updated Wed, 26 Aug 2015 01:55 AM IST
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पंडित कमलापति त्रिपाठी राजकीय डिग्री कालेज में मंगलवार को लोक एवं जनजाति
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कला संस्कृति संस्थान की ओर से कजरी एवं पारम्परिक लोकगीत प्रस्तुतिपरक
कार्यशाला का आयोजन किया गया।
इसका शुभारंभ प्राचार्या डा. विजय लक्ष्मी व पंडित देवाशीष डे ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद दीप प्रज्ज्वलित करके किया। इस अवसर पर डा. विजय लक्ष्मी ने कहा कि गीत-संगीत से मानव जीवन को तनावमुक्त रखा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि कजरी और अन्य पारंपरिक लोक गीत का चलन धीरे-धीरे कम हो रहा है। हम सभी को पारम्परिक लोककलाओं को जीवित रखना होगा। इसके लिए बच्चों को दस दिनों तक कजरी व पारम्परिक लोकगीत व शास्त्री संगीत का प्रशिक्षण किया जाएगा।
इसके बाद चार सितंबर को प्रशिक्षण के अंतिम दिन उनकी प्रतिभा का अवलोकन भी किया जाएगा। डा. देवाशीष डे ने कहा कि चरित्र निर्माण में संगीत का अहम योगदान होता है। शास्त्रीय संगीत वर्तमान परिवेश में पाश्चात्य शैली के संगीतों में दब गया है।
लोकगीत के नाम पर भी फूहड़पन ही परोसा जा रहा है। आवश्यकता है शास्त्रीय संगीत को अधिक से अधिक लोगों को प्रशिक्षण करने के साथ ही प्रेरित करने की।
इस मौके पर पंडित देवाशीष डे और अंकिता गोस्वामी, रागिनी सरना ने लोकगीत व कजरी, चैती, झूला, फागुन आदि की प्रस्तुति भी की। दस दिनों तक चलने वाले इस प्रशिक्षण शिविर को अंकिता गोस्वामी व रागिनी सरना प्रशिक्षित करेंगी।
इस अवसर पर डा. पवन गुप्ता, डा. मोरध्वज सिंह, उर्मिला पांडेय, डा. गायत्री माहेश्वरी, डा. रीतू खरवार, आदि उपस्थित रहीं।
इसका शुभारंभ प्राचार्या डा. विजय लक्ष्मी व पंडित देवाशीष डे ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद दीप प्रज्ज्वलित करके किया। इस अवसर पर डा. विजय लक्ष्मी ने कहा कि गीत-संगीत से मानव जीवन को तनावमुक्त रखा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि कजरी और अन्य पारंपरिक लोक गीत का चलन धीरे-धीरे कम हो रहा है। हम सभी को पारम्परिक लोककलाओं को जीवित रखना होगा। इसके लिए बच्चों को दस दिनों तक कजरी व पारम्परिक लोकगीत व शास्त्री संगीत का प्रशिक्षण किया जाएगा।
इसके बाद चार सितंबर को प्रशिक्षण के अंतिम दिन उनकी प्रतिभा का अवलोकन भी किया जाएगा। डा. देवाशीष डे ने कहा कि चरित्र निर्माण में संगीत का अहम योगदान होता है। शास्त्रीय संगीत वर्तमान परिवेश में पाश्चात्य शैली के संगीतों में दब गया है।
लोकगीत के नाम पर भी फूहड़पन ही परोसा जा रहा है। आवश्यकता है शास्त्रीय संगीत को अधिक से अधिक लोगों को प्रशिक्षण करने के साथ ही प्रेरित करने की।
इस मौके पर पंडित देवाशीष डे और अंकिता गोस्वामी, रागिनी सरना ने लोकगीत व कजरी, चैती, झूला, फागुन आदि की प्रस्तुति भी की। दस दिनों तक चलने वाले इस प्रशिक्षण शिविर को अंकिता गोस्वामी व रागिनी सरना प्रशिक्षित करेंगी।
इस अवसर पर डा. पवन गुप्ता, डा. मोरध्वज सिंह, उर्मिला पांडेय, डा. गायत्री माहेश्वरी, डा. रीतू खरवार, आदि उपस्थित रहीं।