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मुस्लिम महिला ने भी रखा जिउतिया व्रत
Updated Thu, 14 Sep 2017 01:11 AM IST
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मुगलसराय। मां की ममता का कोई धर्म नहीं होता है। मां तो सिर्फ मां होती है। पिछले डेढ़ दशक मां की ममता का धर्म सलमा निभा रही है। धर्म की दीवार को तोड़ कर सलमा जिउतिया पर निराजल व्रत रखती है और हिन्दू महिलाओं के साथ सरोवर तट पर पहुंच कर रीति रिवाज माता लक्ष्मी की पूजन अर्चन कर संतान के दीर्घायु की कामना कर रही है। यदि वह सरोवर तट पर नहीं भी पहुंचती है तो दूसरी महिला को फल आदि देकर पूजा करवाती है लेकिन स्वयं निराजल व्रत रखना नहीं भूलती।
मूल रूप से बिहार के भभुआ से आकर मुगलसराय के हनुमानपुर में बसे नूर मुहम्मद के सबसे बड़े पुत्र मोहम्मद फिरोज की शादी वर्ष 1997 में रामनगर की सलमा बेगम के साथ हुई थी। शादी के बाद जब संतान की प्राप्ति नहीं हुई तो परिवार में कलह शुरू हुआ। जिससे ऊब कर फिरोज अपनी पत्नी को लेकर नगर के सब्जी मंडी में राकेश शर्मा के मकान में किराए पर रहने लगा। जहां उसे जिउतिया व्रत रखने की सलाह महिलाओं ने दी। फिरोज की पत्नी मान गई और व्रत रखने लगी। संयोग उसे संतान की प्राप्ति हुई। अब वह प्रति वर्ष निराजल व्रत रहने लगी और घाट पर जा पूजा भी करने लगी। कुछ वर्ष पूर्व फिरोज ने अपना मकान मुस्लिम बाहुल्य दुलहीपुर के भिसौड़ी में बना लिया तो पूजा स्थल उसके घर से दूर पड़ने लगा। उसकी पत्नी पूजा स्थल पर नहीं जा पाती तब वह फल आदि अन्य व्रत रहने वाली हिंदु महिलाओें को दे पूजा करवाती है लेकिन स्वयं निराजल व्रत रहना नहीं छोड़ती है।
मूल रूप से बिहार के भभुआ से आकर मुगलसराय के हनुमानपुर में बसे नूर मुहम्मद के सबसे बड़े पुत्र मोहम्मद फिरोज की शादी वर्ष 1997 में रामनगर की सलमा बेगम के साथ हुई थी। शादी के बाद जब संतान की प्राप्ति नहीं हुई तो परिवार में कलह शुरू हुआ। जिससे ऊब कर फिरोज अपनी पत्नी को लेकर नगर के सब्जी मंडी में राकेश शर्मा के मकान में किराए पर रहने लगा। जहां उसे जिउतिया व्रत रखने की सलाह महिलाओं ने दी। फिरोज की पत्नी मान गई और व्रत रखने लगी। संयोग उसे संतान की प्राप्ति हुई। अब वह प्रति वर्ष निराजल व्रत रहने लगी और घाट पर जा पूजा भी करने लगी। कुछ वर्ष पूर्व फिरोज ने अपना मकान मुस्लिम बाहुल्य दुलहीपुर के भिसौड़ी में बना लिया तो पूजा स्थल उसके घर से दूर पड़ने लगा। उसकी पत्नी पूजा स्थल पर नहीं जा पाती तब वह फल आदि अन्य व्रत रहने वाली हिंदु महिलाओें को दे पूजा करवाती है लेकिन स्वयं निराजल व्रत रहना नहीं छोड़ती है।
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