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होली में समाहित हैं श्रृंगार, प्रकृति, स्नेह व सद्भावना के रंग
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चकिया। होली पर्व में शांति, स्नेह, समरसता, शृंगार, प्रकृति, सद्भावना व आराध्य के कई रंग समाहित है। इन रंगों से प्रभावित मानव जीवन में सार्थक पथ का अनुसरण करने की क्षमता प्राप्त करता है।
प्रसिद्ध साहित्यकार डा. रामकिशोर शर्मा बेहद कहते है कि बसंत ऋतु की अमराई में मादकता की मंजरी जब अपनी उमंग से मानव मन को गुदगुदाने लगती है, टेसू के लाल पीले फूल जब मुस्कराकर अपूर्व छटा बिखेरने लगते हैं, कोयल बासंती स्वर में राग बसंत का आलाप करने लगती है तब संस्कृति की धरातल पर आमोद- प्रमोद के उल्लास के अव्यक्त आश्चर्य की तरह होली का पर्व आता है। उनके इस कथन से होली पर्व की व्यापकता का आभास स्पष्ट हो जाता है। होली के आगमन से मानव मन उमंग के अतिरेक में बेसुध होकर झंकृत हो उठता है। यह होली के मनोविज्ञान को पारिभाषित करने के लिए काफी है।
पौराणिक दृष्टि से होली का पर्व भारतीय नववर्ष का उद्गम है लेकिन चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा होने के कारण भारतीय नववर्ष शुल्क पक्ष के आने पर वासंतिक नवरात्र के प्रथम दिन माना जाता है। रंगों के त्यौहार होली के एक दिन पूर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन होलिका दहन किया जाता है। मान्यता है कि मानव वर्ष भर के किए गए गलत कार्यों का परित्याग कर नवीन कलेवर के साथ जीवन पथ पर अग्रसर होता है। होली में समाहित विविध रंगों को होली गीतों के माध्यम से दर्शाया गया है। होली में निहित शृंगार के संयोग पक्ष को उजागर करते हुए डा. शर्मा ने ‘रंग अबीर गुलाल भरी पिचुकारी छटा उतरी सुतरी बा, अंग नियंग अनंग भरी ई बसंत परी बा कि रंग भरी बा, का उल्लेख किया। वही ‘आए टिकोरे मगर तुम न आये’ में वियोग पक्ष को उजागर किया है। शिव पार्वती की होली के जरिए आराध्य के प्रति प्रेम का निरूपण किया गया है। ‘जबले फगुनवा आयल सखी, देखा भोला क मन बउरायल’ में उन्होने गांव की भौगोलिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डालते हुए कहा है कि ‘माटी क गांव आवे फागुनी बयार’ और ‘सदभाव्रो के समता रंग में डूबे तन-मन खिलते हैं, होली में मानवता राधा स्नेह कन्हैया मिलते हैं।
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प्रसिद्ध साहित्यकार डा. रामकिशोर शर्मा बेहद कहते है कि बसंत ऋतु की अमराई में मादकता की मंजरी जब अपनी उमंग से मानव मन को गुदगुदाने लगती है, टेसू के लाल पीले फूल जब मुस्कराकर अपूर्व छटा बिखेरने लगते हैं, कोयल बासंती स्वर में राग बसंत का आलाप करने लगती है तब संस्कृति की धरातल पर आमोद- प्रमोद के उल्लास के अव्यक्त आश्चर्य की तरह होली का पर्व आता है। उनके इस कथन से होली पर्व की व्यापकता का आभास स्पष्ट हो जाता है। होली के आगमन से मानव मन उमंग के अतिरेक में बेसुध होकर झंकृत हो उठता है। यह होली के मनोविज्ञान को पारिभाषित करने के लिए काफी है।
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पौराणिक दृष्टि से होली का पर्व भारतीय नववर्ष का उद्गम है लेकिन चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा होने के कारण भारतीय नववर्ष शुल्क पक्ष के आने पर वासंतिक नवरात्र के प्रथम दिन माना जाता है। रंगों के त्यौहार होली के एक दिन पूर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन होलिका दहन किया जाता है। मान्यता है कि मानव वर्ष भर के किए गए गलत कार्यों का परित्याग कर नवीन कलेवर के साथ जीवन पथ पर अग्रसर होता है। होली में समाहित विविध रंगों को होली गीतों के माध्यम से दर्शाया गया है। होली में निहित शृंगार के संयोग पक्ष को उजागर करते हुए डा. शर्मा ने ‘रंग अबीर गुलाल भरी पिचुकारी छटा उतरी सुतरी बा, अंग नियंग अनंग भरी ई बसंत परी बा कि रंग भरी बा, का उल्लेख किया। वही ‘आए टिकोरे मगर तुम न आये’ में वियोग पक्ष को उजागर किया है। शिव पार्वती की होली के जरिए आराध्य के प्रति प्रेम का निरूपण किया गया है। ‘जबले फगुनवा आयल सखी, देखा भोला क मन बउरायल’ में उन्होने गांव की भौगोलिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डालते हुए कहा है कि ‘माटी क गांव आवे फागुनी बयार’ और ‘सदभाव्रो के समता रंग में डूबे तन-मन खिलते हैं, होली में मानवता राधा स्नेह कन्हैया मिलते हैं।
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