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ब्रिटिश राज में भी चार दिन आजाद रहा बुलंदशहर
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कालाआम चौराहा : इसी स्थान पर क्रांतिकारियों को फांसी दी जाती थी।
- फोटो : BULANDSHAHR
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ब्रिटिश राज में भी चार दिन आजाद रहा बुलंदशहर
बुलंदशहर। कालाआम चौराहा और मालागढ़ किले के अवशेष देश की आजादी के लिए कुर्बान हुए शूरवीरों की याद दिलाते हैं। 1857 में मेरठ से शुरू हुई क्रांति की आंच बुलंदशहर के भी गांव-गांव तक फैल गई। आजादी के दीवानों ने पीढ़ी दर पीढ़ी क़ुर्बानी की इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्ष 1947 तक जिले के अनेक अनाम क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया।
जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कल्याण परिषद के सचिव पीके शर्मा ने आजादी की जंग में बुलंदशहर के लोगों की भूमिका पर पुस्तक लिखी है। शर्मा बताते हैं कि वर्ष 1857 से 1947 के दौरान कालाआम पर अंग्रेेजों ने हजारों क्रांतिकारियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया। तब यहां बड़ी संख्या में पेड़ थे। अब यहां चौराहे के बीच शहीद पार्क है।
1857 में चार दिन अंग्रेजी राज से मुक्त रहा बुलंदशहर
21 मई 1857 को क्रांतिकारियों ने बुलंदशहर को अंग्रेजी शासन से मुक्त करा दिया था। हालांकि ठीक चार दिन बाद 25 मई को अंग्रेजों ने फिर से कब्जा कर लिया। मालागढ़ के नवाब वलीदाद खां बादशाह बहादुर शाह जफर के काफी करीबी थे। क्रांति में सहयोग देने के लिए वह वह दिल्ली से चलकर 14वां रिसाला झांसी की 12वीं पलटन और छह तोपों को लेकर बुलंदशहर आए थे।
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सिकंदराबाद दादरी में तोड़े गए अंग्रेजों के डाक बंगले
सिकंदराबाद और दादरी के क्रांतिकारियों ने विदेशी शासन का प्रतीक डाक बंगलों, तारघरों और सरकारी इमारतों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया था। क्रांतिकारियों ने सरकारी संस्थानों को आग के हवाले कर दिया गया था। जब स्वतंत्रता की ज्वालाएं जिले के बंतराल में प्रवेश कर विदेशी सत्ता को ध्वस्त करने लगी थी तो अंग्रेजों ने अपने उच्चाधिकारियों से मदद की गुहार लगाई थी। अंग्रेजों को बरेली से नकारात्मक उत्तर मिला, रामपुर के नवाब भी घुड़सवार नहीं भेज सके। सिरमूर की दो फौजी टुकडिय़ां भी मौके पर नहीं पहुंची।जनरल डीवट को मेरठ का सरकारी खजाना भेजने के लिए यूरोपियन सैनिक भेजने थे, लेकिन वह पूरा नहीं हो सका था। इसके बाद अलीगढ़ की 9वीं भारतीय पलटन ने 20 मई को नारायण शर्मा को फांसी दिए जाने के बाद विद्रोह शुरू कर दिया था।
लाल तालाब में गांधीजी को सुनने उमड़े थे लोग
तीन नवंबर 1929 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बुलंदशहर, खुर्जा और सिकंदराबाद में खादी के प्रचार के लिए पदार्पण किया। महात्मा गांधी के इस दौरे से युवाओं में आजादी के संग्राम के लिए तैयार होने के लिए प्रेरित किया। इस दौरान बुलंदशहर से चार हजार, सिकंदराबाद से 3600 और खुर्जा से 3600 रुपये की धनराशि आजादी के आंदोलन के लिए गांधीजी को भेंट की गई थी। इस दौरान बुलंदशहर के लाल तालाब नामक स्थान पर महात्मा गांधी की सभा का आयोजन किया गया था, जिसमें हजारों की संख्या में युवाओं ने हिस्सा लिया था।
विजय सिंह पथिकके दादा ने किया था गुरिल्ला युद्ध
स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह पथिक के दादा इंद्र सिंह बुलंदशहर के गुठावली कल गांव में रहते थे। वह क्रांतिकारी सैनिक टुकड़ी के सेनापति भी थे। विजय सिंह पथिक की मां कंवलकुवर भी आजादी की जंग में शामिल थीं। वर्ष 1867 की क्रांति के दौरान विजय सिंह के दादा इंद्र सिंह के नेतृत्व में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने गुरिल्ला युद्ध में हिस्सा लिया था। इसके बाद विजय सिंह के परिजन उन्हें लेकर राजस्थान चले गए थे।
साइमन कमीशन के विरोध में खुर्जा ने झोंकी ताकत
वर्ष 1927 में साइमन कमीशन भारत आया तो बुलंदशहर ने भी इसके विरोध में योगदान दिया। तब खुर्जा में हिंदुस्तानी सेवादल संस्था की स्थापना करते हुए पंडित रामचंद्र शर्मा, पंडित चंपतलाल शर्मा, मास्टर रेवती शरण और मास्टर लक्ष्मण सहित सैकड़ों क्रांतिकारियों ने साइमन कमीशन का विरोध किया। इसके बाद अगस्त 1929 में ठाकुर माजिक सिंह, महाशय हरी गोपाल और बाबू गिरधारी सरन के प्रयत्न से जिला कांग्रेस कमेटी को एक बार फिर से गठित किया गया था।
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बुलंदशहर। कालाआम चौराहा और मालागढ़ किले के अवशेष देश की आजादी के लिए कुर्बान हुए शूरवीरों की याद दिलाते हैं। 1857 में मेरठ से शुरू हुई क्रांति की आंच बुलंदशहर के भी गांव-गांव तक फैल गई। आजादी के दीवानों ने पीढ़ी दर पीढ़ी क़ुर्बानी की इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्ष 1947 तक जिले के अनेक अनाम क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया।
जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कल्याण परिषद के सचिव पीके शर्मा ने आजादी की जंग में बुलंदशहर के लोगों की भूमिका पर पुस्तक लिखी है। शर्मा बताते हैं कि वर्ष 1857 से 1947 के दौरान कालाआम पर अंग्रेेजों ने हजारों क्रांतिकारियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया। तब यहां बड़ी संख्या में पेड़ थे। अब यहां चौराहे के बीच शहीद पार्क है।
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1857 में चार दिन अंग्रेजी राज से मुक्त रहा बुलंदशहर
21 मई 1857 को क्रांतिकारियों ने बुलंदशहर को अंग्रेजी शासन से मुक्त करा दिया था। हालांकि ठीक चार दिन बाद 25 मई को अंग्रेजों ने फिर से कब्जा कर लिया। मालागढ़ के नवाब वलीदाद खां बादशाह बहादुर शाह जफर के काफी करीबी थे। क्रांति में सहयोग देने के लिए वह वह दिल्ली से चलकर 14वां रिसाला झांसी की 12वीं पलटन और छह तोपों को लेकर बुलंदशहर आए थे।
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सिकंदराबाद दादरी में तोड़े गए अंग्रेजों के डाक बंगले
सिकंदराबाद और दादरी के क्रांतिकारियों ने विदेशी शासन का प्रतीक डाक बंगलों, तारघरों और सरकारी इमारतों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया था। क्रांतिकारियों ने सरकारी संस्थानों को आग के हवाले कर दिया गया था। जब स्वतंत्रता की ज्वालाएं जिले के बंतराल में प्रवेश कर विदेशी सत्ता को ध्वस्त करने लगी थी तो अंग्रेजों ने अपने उच्चाधिकारियों से मदद की गुहार लगाई थी। अंग्रेजों को बरेली से नकारात्मक उत्तर मिला, रामपुर के नवाब भी घुड़सवार नहीं भेज सके। सिरमूर की दो फौजी टुकडिय़ां भी मौके पर नहीं पहुंची।जनरल डीवट को मेरठ का सरकारी खजाना भेजने के लिए यूरोपियन सैनिक भेजने थे, लेकिन वह पूरा नहीं हो सका था। इसके बाद अलीगढ़ की 9वीं भारतीय पलटन ने 20 मई को नारायण शर्मा को फांसी दिए जाने के बाद विद्रोह शुरू कर दिया था।
लाल तालाब में गांधीजी को सुनने उमड़े थे लोग
तीन नवंबर 1929 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बुलंदशहर, खुर्जा और सिकंदराबाद में खादी के प्रचार के लिए पदार्पण किया। महात्मा गांधी के इस दौरे से युवाओं में आजादी के संग्राम के लिए तैयार होने के लिए प्रेरित किया। इस दौरान बुलंदशहर से चार हजार, सिकंदराबाद से 3600 और खुर्जा से 3600 रुपये की धनराशि आजादी के आंदोलन के लिए गांधीजी को भेंट की गई थी। इस दौरान बुलंदशहर के लाल तालाब नामक स्थान पर महात्मा गांधी की सभा का आयोजन किया गया था, जिसमें हजारों की संख्या में युवाओं ने हिस्सा लिया था।
विजय सिंह पथिकके दादा ने किया था गुरिल्ला युद्ध
स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह पथिक के दादा इंद्र सिंह बुलंदशहर के गुठावली कल गांव में रहते थे। वह क्रांतिकारी सैनिक टुकड़ी के सेनापति भी थे। विजय सिंह पथिक की मां कंवलकुवर भी आजादी की जंग में शामिल थीं। वर्ष 1867 की क्रांति के दौरान विजय सिंह के दादा इंद्र सिंह के नेतृत्व में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने गुरिल्ला युद्ध में हिस्सा लिया था। इसके बाद विजय सिंह के परिजन उन्हें लेकर राजस्थान चले गए थे।
साइमन कमीशन के विरोध में खुर्जा ने झोंकी ताकत
वर्ष 1927 में साइमन कमीशन भारत आया तो बुलंदशहर ने भी इसके विरोध में योगदान दिया। तब खुर्जा में हिंदुस्तानी सेवादल संस्था की स्थापना करते हुए पंडित रामचंद्र शर्मा, पंडित चंपतलाल शर्मा, मास्टर रेवती शरण और मास्टर लक्ष्मण सहित सैकड़ों क्रांतिकारियों ने साइमन कमीशन का विरोध किया। इसके बाद अगस्त 1929 में ठाकुर माजिक सिंह, महाशय हरी गोपाल और बाबू गिरधारी सरन के प्रयत्न से जिला कांग्रेस कमेटी को एक बार फिर से गठित किया गया था।