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यूपी: वादी जज और आरोपी वकील, मुकदमे का फैसला आने में लगे 34 साल, केवल एक गवाह ही पेश कर सका अभियोजन; दो बरी

Mon, 05 Oct 2026 01:48 PM IST
Sharukh Khan विकास वत्स, संवाद न्यूज एजेंसी, बुलंदशहर
विकास वत्स, संवाद न्यूज एजेंसी, बुलंदशहर Published by: Sharukh Khan Updated Mon, 05 Oct 2026 01:48 PM IST
सार

यूपी के बुलंदशहर जिले की अदालत ने 34 साल सुनवाई के बाद फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आरोपी वकीलों को बरी कर दिया है। मुकदमा जज ने दर्ज कराया था। अभियोजन इतने वर्षों में केवल एक गवाह ही पेश कर पाया था। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में दो अधिवक्ताओं को बरी कर दिया।

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Complainant was a judge and accused a lawyer case took 34 years to conclude Two lawyers acquitted bulandshahr
bulandshahr court - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

एक मुकदमे में वादी स्वयं जज थे और आरोपी तीन वकील। इसके बावजूद इस मुकदमे का फैसला आने में 34 साल लग गए। 12,368 दिन तक चले इस मुकदमे में अपर सिविल जज अवर खंड/न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय कक्ष संख्या-08, मोनिका कालरा की अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में अधिवक्ता प्रेमशंकर चौहान और वेदपाल राघव को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। 
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तीसरे आरोपी अधिवक्ता विजय राघव का फैसला आने से पहले ही निधन हो चुका है। 24 जून 1992 को खुर्जा न्यायालय में तैनात तत्कालीन मुंसिफ/न्यायिक दंडाधिकारी एसीजे-जेडी अशोक कुमार वर्मा ने खुर्जा नगर थाने में तहरीर दी थी। 
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न्यायिक अधिकारी का आरोप था कि जब वह मोटर वाहन रिलीज प्रार्थना पत्र की सुनवाई कर रहे थे, उसी दौरान स्थानीय अधिवक्ता वेदपाल राघव, प्रेमशंकर चौहान और विजय राघव ने अदालत कक्ष में प्रवेश किया और अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाते हुए अशोभनीय भाषा व गाली-गलौज की। 
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जज को दी थी जान से मारने की धमकी
आरोप था कि अधिवक्ताओं ने न्यायिक पत्रावली की अर्जी फाड़कर अपनी जेब में रख ली, डायस पर चढ़कर अभद्रता की और बाद में पीठासीन अधिकारी के चैंबर में घुसकर उनके साथ मारपीट तथा जान से मारने की धमकी दी। 

पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित धाराओं में आनन-फानन में चार्जशीट तो दाखिल कर दी, लेकिन बाद में अभियोजन पक्ष 34 वर्षों की लंबी जद्दोजहद के दौरान एक गवाह ही पेश कर सका। यह इकलौता गवाह भी अदालत में अपने मूल बयानों से मुकर गया। 

गवाह ने जज के साथ किसी भी प्रकार की बदसलूकी, मारपीट या पत्रावली फाड़ने की घटना से इन्कार कर दिया।अदालत ने अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न नजीरों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पर यह कानूनी दायित्व होता है कि वह आरोपों को किसी भी संदेह से परे साबित करे। 

अधिवक्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया
किसी स्वतंत्र गवाह या ठोस साक्ष्य के न होने पर अदालत ने दोनों अधिवक्ताओं को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया और पत्रावली को हमेशा के लिए दाखिल दफ्तर करने का आदेश सुनाया।

 

न्यायालय ने क्या आदेश दिया है, इससे अधिक यह महत्वपूर्ण है कि दोनों पक्षों को इस फैसले के लिए इतना लंबा इंतजार करना पड़ा। कोर्ट में अभी भी चार लाख से अधिक मुकदमे लंबित हैं और लोग वर्षों से न्याय की आस लगाए हुए हैं। - अनुज कौशिक, अधिवक्ता

वास्तव में सिस्टम की इस लापरवाही को संबंधित अधिवक्ताओं को झेलना पड़ा है। इतने वर्षों तक  वे न्याय के लिए इंतजार करते रहे। इतने लंबे समय तक उन्हें इन आरोपों में घिरे रहना पड़ा।  - ब्रूनो भूषण, अधिवक्ता 
 

डीएम और एसएसपी को भी लिखे गए पत्र
अदालती आदेश के अनुसार, वर्ष 2004 में आरोप तय होने के बाद से ही यह महत्वपूर्ण फाइल केवल गवाही के इंतजार में वर्षों तक धूल फांकती रही। अदालत ने अभियोजन को गवाह प्रस्तुत करने के दर्जनों अवसर दिए। 

17 सितंबर 2026 को अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए जिलाधिकारी, एसएसपी और  संयुक्त निदेशक अभियोजन, बुलंदशहर को पत्र लिखकर सख्त चेतावनी दी थी कि यदि 24 सितंबर 2026 तक गवाह पेश नहीं किए गए तो प्रतिकूल आदेश की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन की होगी। 

इस सख्त अदालती चेतावनी के बाद भी पुलिस और अभियोजन किसी अन्य गवाह को कठघरे में खड़ा करने में नाकाम रहे।
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