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दल बदलने पर भी नहीं बदल पाई दिग्गजों की किस्मत
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दल बदलने पर भी नहीं बदल पाई दिग्गजों की किस्मत
बुलंदशहर। विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने के लिए दल बदलने वाले नेताओं की किस्मत यहां भी नहीं बदल सकी। हालात यह रहे कि चुनाव के समय में जिले की चार विधानसभाओं से टिकट के लिए जोड़-तोड़ तो कर ली गई, लेकिन मतदाताओं से गठबंधन नहीं कर सके, जिसके चलते विधानसभा पहुंचने की उनकी उम्मीद बीच रास्ते में ही दम तोड़ गई।
विधानसभा चुनाव के लिए सुगबुगाहट शुरू होने के साथ ही विभिन्न दलों के नेताओं में पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में जाने के लिए भगदड़ मच गई थी। पहले नेता बसपा, रालोद, सपा छोड़कर भाजपा की सदस्यता ले रहे थे, लेकिन बाद में हालात बदले और सभी दलों से कुछ नेता पार्टी छोड़कर गठबंधन में अपना भविष्य तलाशने लगे थे। इसके बाद जब टिकट तय हुए तो कई बागियों को यहां भी कुछ नहीं मिला, जिसके चलते वह दूसरे दलों में भी गए, लेकिन यहां भी उन्हें जीत नहीं मिल सकी। खुर्जा सीट पर कांग्रेस के पूर्व विधायक बंशी पहाड़िया ने इस बार साइकिल की सवारी करते हुए टिकट तो लिया, लेकिन जनता के बीच खोई जमीन को वापस नहीं पा सके, जबकि अनूपशहर सीट से बसपा के पूर्व विधायक गजेंद्र चौधरी को लगा कि इस बार बसपा का जनाधार खिसक रहा है और वह टिकट के लिए रालोद में शामिल हो गए। रालोद से भी निराशा हाथ लगी तो उन्होंने हाथ के पंजे का ही सहारा ले लिया। भागदौड़ करके टिकट तो हासिल कर लिया, लेकिन जनता ने उन्हें नकार दिया।
पूर्व मंत्री ने कई बार बदली पार्टी, पर मिली हार
सपा सरकार में बेसिक शिक्षा मंत्री और छह बार विधायक रहे किरनपाल सिंह ने 74 वर्ष की उम्र में चुनाव लड़ने का फैसला लिया। सपा छोड़कर एक साल तक भाजपा में रहे और चुनाव के समय में रालोद में पहुंचकर जाट मतदाताओं को एकजुट करने का प्रयास किया। रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने उन पर भरोसा जताया, लेकिन मतदाताओं की उम्मीदों पर वह खरा नहीं उतर सके और पूर्व मंत्री अनिल शर्मा के हाथों हार झेलनी पड़ी। जबकि बुलंदशहर से बसपा के ब्लॉक प्रमुख हाजी यूनुस को गठबंधन में भविष्य दिखाई दिया और उन्होंने बसपा छोड़कर रालोद ज्वाइन की। हालांकि इसके बाद लोगों ने उन्हें भी अपना समर्थन नहीं दिया और यह उनकी हार का कारण बना।
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बुलंदशहर। विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने के लिए दल बदलने वाले नेताओं की किस्मत यहां भी नहीं बदल सकी। हालात यह रहे कि चुनाव के समय में जिले की चार विधानसभाओं से टिकट के लिए जोड़-तोड़ तो कर ली गई, लेकिन मतदाताओं से गठबंधन नहीं कर सके, जिसके चलते विधानसभा पहुंचने की उनकी उम्मीद बीच रास्ते में ही दम तोड़ गई।
विधानसभा चुनाव के लिए सुगबुगाहट शुरू होने के साथ ही विभिन्न दलों के नेताओं में पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में जाने के लिए भगदड़ मच गई थी। पहले नेता बसपा, रालोद, सपा छोड़कर भाजपा की सदस्यता ले रहे थे, लेकिन बाद में हालात बदले और सभी दलों से कुछ नेता पार्टी छोड़कर गठबंधन में अपना भविष्य तलाशने लगे थे। इसके बाद जब टिकट तय हुए तो कई बागियों को यहां भी कुछ नहीं मिला, जिसके चलते वह दूसरे दलों में भी गए, लेकिन यहां भी उन्हें जीत नहीं मिल सकी। खुर्जा सीट पर कांग्रेस के पूर्व विधायक बंशी पहाड़िया ने इस बार साइकिल की सवारी करते हुए टिकट तो लिया, लेकिन जनता के बीच खोई जमीन को वापस नहीं पा सके, जबकि अनूपशहर सीट से बसपा के पूर्व विधायक गजेंद्र चौधरी को लगा कि इस बार बसपा का जनाधार खिसक रहा है और वह टिकट के लिए रालोद में शामिल हो गए। रालोद से भी निराशा हाथ लगी तो उन्होंने हाथ के पंजे का ही सहारा ले लिया। भागदौड़ करके टिकट तो हासिल कर लिया, लेकिन जनता ने उन्हें नकार दिया।
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पूर्व मंत्री ने कई बार बदली पार्टी, पर मिली हार
सपा सरकार में बेसिक शिक्षा मंत्री और छह बार विधायक रहे किरनपाल सिंह ने 74 वर्ष की उम्र में चुनाव लड़ने का फैसला लिया। सपा छोड़कर एक साल तक भाजपा में रहे और चुनाव के समय में रालोद में पहुंचकर जाट मतदाताओं को एकजुट करने का प्रयास किया। रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने उन पर भरोसा जताया, लेकिन मतदाताओं की उम्मीदों पर वह खरा नहीं उतर सके और पूर्व मंत्री अनिल शर्मा के हाथों हार झेलनी पड़ी। जबकि बुलंदशहर से बसपा के ब्लॉक प्रमुख हाजी यूनुस को गठबंधन में भविष्य दिखाई दिया और उन्होंने बसपा छोड़कर रालोद ज्वाइन की। हालांकि इसके बाद लोगों ने उन्हें भी अपना समर्थन नहीं दिया और यह उनकी हार का कारण बना।
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