फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bulandshahar News ›   bulandshahr news

नई किरण लेकर आई थी आजादी की पहली सुबह

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Sat, 14 Aug 2021 10:12 PM IST
विज्ञापन
bulandshahr news
नई किरण लेकर आई थी आजादी की पहली सुबह
विज्ञापन

बुलंदशहर। वर्षों से चली आ रही आजादी की लड़ाई पर विराम लग चुका था। 15 अगस्त 1947 की सुबह का लोगों को बेसब्री से इंतजार था। कुछ लोग खुशी के मारे रातभर सो नहीं पाए। सुबह की नई किरण आजादी की नई ऊर्जा, नया उल्लास लेकर भारत की धरती पर उदय हुई। ठीक 75 वर्ष पूर्व बंटवारे के बाद आजादी की मुहर लगी। यह पल तो सुखद था, लेकिन आजादी के साथ बंटवारे का दर्द भी लोगों के मन में था। हालात सुधरने में वक्त लगा और आज हमारा आजाद देश दुनिया भर में अपनी धाक जमा रहा है। अमर उजाला से बातचीत के दौरान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की आंखें पुरानी यादों को साझा कर भर आईं।
क्रांतिकारियों को रखते थे भूखा, देते थे यातनाएं
22 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए जेल जाने वाले पंडित मदनलाल ज्योतिषी गांधीवादी हैं। उन्होंने बताया कि वह पहली बार बुलंदशहर जेल में तीन माह, फिर बरेली सेंट्रल जेल में तीन माह और लखनऊ कैंट जेल में 13 वर्ष तक रहे थे। जेल में बंद रखने के दौरान क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ने के लिए अंग्रेज भूखा रखते और पिटाई करते थे। जिले में हुए कत्लेआम की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पंडित मदन लाल ज्योतिषी जब आजादी की लड़ाई को याद करते हैं तो उनकी आंखें छलक पड़ती हैं। आजादी की पहली सुबह जनपदभर में प्रभातफेरी निकाली गई। घरों में उल्लास का माहौल था। इन सब के बीच पाकिस्तान और पंजाब में मची मारकाट को यादकर मन व्यथित था।
विज्ञापन

नेता जी के तोपखाने में तैनात थे महावीर सिंह
गांव रहमापुर स्यावली निवासी महावीर सिंह वर्ष 1941 में लखावटी इंटर कालेज में पढ़ते थे। इसी दौरान वह आजाद हिंद फौज में भर्ती हुए थे। वह बताते हैं कि आठ दिसंबर 1941 को जब सिंगापुर और मलयेशिया पर जापान ने हमला किया था, उस समय वह तोपखाने में तैनात थे। उनका काम तोप से हवाई जहाज को गिराने का था। इसके बाद युद्ध में जापान की जीत हुई तो करीब 30 हजार सैनिकों को बंधक बना लिया था। उन्होंने बताया कि देश में आजादी का उल्लास था। बड़ी संख्या में लोग जश्न मनाते हुए घरों में पकवान बना रहे थे, कहीं पर युवा तिरंगा यात्रा निकाल रहे थे, तो कहीं पर लोग एक दूसरे को गले मिलकर आजादी की बधाई दे रहे थे।
विज्ञापन
विज्ञापन

यूं ही नहीं मिली आजादी, देश ने झेली थी पीड़ा
देश को आजाद हुए 75 वर्ष बीत गए हैं, लेकिन आजादी की पहली सुबह देखने वाले लोग आज भी आजादी की पहली किरण को याद कर भावुक हो उठते हैं। कभी आजाद होने की खुशी उनकी बातों में होती है, तो कभी बदहाल लोगों की स्थिति को बयां करते हुए उनकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं। आजादी की पहली किरण देखने वाले आज अपने नाती-पोतों और बच्चों को उस समय की कहानियां सुनाते हैं, किस तरह स्वतंत्रता की वेदी पर मतवालों ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया था, गांव, कस्बा, शहर और गली-मोहल्लों में लोग आजादी के तराने गुनगुनाते थे। आजादी के लिए गांव की चौपाल पर प्रबुद्धजन एकत्रित होते और अपने-अपने विचार रखते थे।
पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को कराते थे भोजन
सिकंदराबाद गांव खानपुर निवासी रघुनाथ सिंह सोलंकी ने बताया कि देश की आजादी के दौरान उनकी उम्र करीब 17 वर्ष थी। वर्ष 1947 में जब उनके पिता बाबू सिंह पहली बार जेल गए थे तो उनसे जेल में मुलाकात करने जाते थे। अंग्रेजों की हुकूमत में माहौल इतना खराब था, कि पढ़ने-लिखने की उम्र में बच्चों को जेल भेज दिया जाता था या फिर उनकी हत्या कर दी जाती थी। आजादी की पहली सुबह को याद करते हुए रघुनाथ सिंह ने बताया कि उस वक्त दिल्ली के लिए रात करीब 11 बजे ट्रेन जाती थी। आजादी की घोषणा के बाद पाकिस्तान से लौटने वाले लोगों को अपने पिता के साथ खाना खिलाते थे। लेकिन, लोग अपनों के बिछड़ने, हत्या, दुष्कर्म जैसी वारदात के गम में खाना भी नहीं खाते थे।
अंग्रेजी हुकूमत जब्त कर लेती थी संपत्ति
सिकंदराबाद निवासी करीब 90 वर्षीय भजनलाल बोहरा ने बताया कि तिरंगा के बिना जीवन संभव नहीं है। जब वह दस वर्ष के थे तो उनका पूरा परिवार पाकिस्तान के फतेहगंज में रहता था। देश की आजादी के बाद जब देश का विभाजन हुआ तो उनके परिवार ने हिंदुस्तान को ही अपना घर माना। जिसके चलते वह भी अन्य लोगों की तरह ट्रेनों में सवार होकर हरिद्वार पहुंच गए थे। रात में जंगल में सोना पड़ता था। लकड़ियां काटकर अपना जीवन यापन किया था। हालांकि, करीब तीन वर्ष तक वहां रहने और कोई रोजगार न होने के कारण वह सिकंदराबाद क्षेत्र में आकर बस गए थे।
आजादी से खुशी मिली तो मार-काट से मन था दुखी
शिकारपुर के गांव कैलावन निवासी 101 वर्षीय श्योराज सिंह कश्यप बताते हैं कि आजादी की लड़ाई में भाग लेने के लिए वह घर से भागकर बाबू बनारसी दास गुप्ता के गांव उटरावली पहुंच गए थे। हालांकि, परिजनों को जानकारी लगने पर उनकी बाल विधवा बहन उन्हें बुलाने के लिए वहां पहुंच गई। आजादी के दिन एक तरफ खुशी का माहौल था, एक दूसरे को मिठाई बांटी जा रही थी।

आजादी का पल जीवन का सबसे सुनहरा पल था
शिकारपुर के गांव चित्सौन निवासी 100 वर्षीय विशंभर दयाल शर्मा ने बताया कि वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गांव निवासी देवदत्त शर्मा के साथ में रहे थे। जिसके चलते उन्हें भी जेल जाना पड़ा था। 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने पर जगह-जगह मिठाई बांटी गई। वहीं भारत और पाकिस्तान का बंटवारा होने के बाद पाकिस्तान से हिंदुओं को मारपीट कर भगाया जाने लगा।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed