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पीएचडी के बाद सौरभ ने पकड़ी किसानी की राह, बने उन्नत किसान
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डॉ. सौरभ सिंह।
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद युवा सरकारी नौकरी की ओर भागते हैं, लेकिन ऐसे युवा भी हैं जो खेती किसानी में नाम कमा रहे हैं। उनमें खेती-किसानी के जरिये ही कुछ कर दिखाने का जज्बा है। यही नहीं वह परंपरागत खेती से हटकर कम लागत में अधिक उत्पाद के लिए तकनीकी खेती को लेकर प्रेरित कर रहे हैं। शहर के मोहल्ला पटियाली सराय में रहने वाले डॉ. सौरभ सिंह भी ऐसे ही किसानों में शामिल हैं।
डॉ. सौरभ सिंह उच्च शिक्षित परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता डॉ. विनय कुमार सिंह भी प्रोफेसर थे। छोटे भाई डॉ. शालीन कुमार सिंह एसएस कॉलेज शाहजहांपुर में अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष हैं। अंग्रेजी में रुहेलखंड विवि के बरेली कॉलेज से 2019 में पीएचडी की उपाधि हासिल की। अंग्रेजी साहित्यकार प्रोफेसर आईएच रिजवी का कृतित्व उनका शोध विषय रहा। पीएचडी करने के बाद सौरभ सिंह ने कानून जानने के लिए एलएलबी भी की, यहीं नहीं रुके उन्होंने पत्रकारिता में भी पीजी किया।
डॉ. सौरभ सिंह जिले के बड़े किसान परिवार से आते हैं, ऐसे में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी, वकालत और पत्रकारिता का पेशा न अपना कर खेती-किसानी की राह चुनी।
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डॉ. सौरभ सिंह ने परंपरागत फसलों का उत्पाद न करके अदरक, हल्दी जैसी फसलों पर ध्यान दिया। इन दिनों उन्होंने छह एकड़ में हल्दी की फसल की है। सौरभ कहते हैं कि कम लागत और पानी की कम खपत में अधिक उत्पाद तकनीकी रूप से खेती में ही हो सकता है। पिछले वर्ष उन्होंने एक एकड़ भूमि में गन्ने की फसल की तो जिले में उनका गन्ना भी सबसे अच्छी गुणवत्ता का पाया गया।
सौरभ सिंह बताते हैं कि कम सिंचाई और लागत में उनके गन्ने की लंबाई 17 फुट तक थी जो अपने आप में रिकार्ड थी। जिला गन्ना अधिकारी ने टीम के साथ खुद उनके खेत का निरीक्षण भी किया, लेकिन समय से भुगतान न मिलने के कारण उनका मन गन्ना की फसल में नहीं लगा।
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कम सिंचाई में धान की फसल की कर रहे तैयार
डॉ. सौरभ सिंह का कहना है कि फसलों का उत्पादन गिरने का एक कारण ग्लोबल वार्मिंग भी है। वह फसलों में तरह तरह के प्रयोग करते हैं। उसमें सफलता भी मिलती है। अब उन्होंने अपना ध्यान धान की फसल पर केंद्रित किया है। डॉ. सौरभ सिंह बताते हैं कि उनकी कम से कम छह एकड़ में धान की फसल करने की योजना है। उनकी फसल में सिंचाई के लिए पानी का इस्तेमाल काफी कम होगा और उत्पाद ज्यादा रहेगा। इसके लिए वह अभी से तैयारी कर रहे हैं। अपने खेतों के लिए खुद ही जैविक खाद भी तैयार करते हैं। उनका कहना है कि रासायनिक खादों के ज्यादा इस्तेमाल के कारण भी भूमि की उर्वरक क्षमता कम हो रही है, किसानों को यह बात समझनी चाहिए।
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डॉ. सौरभ सिंह उच्च शिक्षित परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता डॉ. विनय कुमार सिंह भी प्रोफेसर थे। छोटे भाई डॉ. शालीन कुमार सिंह एसएस कॉलेज शाहजहांपुर में अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष हैं। अंग्रेजी में रुहेलखंड विवि के बरेली कॉलेज से 2019 में पीएचडी की उपाधि हासिल की। अंग्रेजी साहित्यकार प्रोफेसर आईएच रिजवी का कृतित्व उनका शोध विषय रहा। पीएचडी करने के बाद सौरभ सिंह ने कानून जानने के लिए एलएलबी भी की, यहीं नहीं रुके उन्होंने पत्रकारिता में भी पीजी किया।
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डॉ. सौरभ सिंह जिले के बड़े किसान परिवार से आते हैं, ऐसे में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी, वकालत और पत्रकारिता का पेशा न अपना कर खेती-किसानी की राह चुनी।
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डॉ. सौरभ सिंह ने परंपरागत फसलों का उत्पाद न करके अदरक, हल्दी जैसी फसलों पर ध्यान दिया। इन दिनों उन्होंने छह एकड़ में हल्दी की फसल की है। सौरभ कहते हैं कि कम लागत और पानी की कम खपत में अधिक उत्पाद तकनीकी रूप से खेती में ही हो सकता है। पिछले वर्ष उन्होंने एक एकड़ भूमि में गन्ने की फसल की तो जिले में उनका गन्ना भी सबसे अच्छी गुणवत्ता का पाया गया।
सौरभ सिंह बताते हैं कि कम सिंचाई और लागत में उनके गन्ने की लंबाई 17 फुट तक थी जो अपने आप में रिकार्ड थी। जिला गन्ना अधिकारी ने टीम के साथ खुद उनके खेत का निरीक्षण भी किया, लेकिन समय से भुगतान न मिलने के कारण उनका मन गन्ना की फसल में नहीं लगा।
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कम सिंचाई में धान की फसल की कर रहे तैयार
डॉ. सौरभ सिंह का कहना है कि फसलों का उत्पादन गिरने का एक कारण ग्लोबल वार्मिंग भी है। वह फसलों में तरह तरह के प्रयोग करते हैं। उसमें सफलता भी मिलती है। अब उन्होंने अपना ध्यान धान की फसल पर केंद्रित किया है। डॉ. सौरभ सिंह बताते हैं कि उनकी कम से कम छह एकड़ में धान की फसल करने की योजना है। उनकी फसल में सिंचाई के लिए पानी का इस्तेमाल काफी कम होगा और उत्पाद ज्यादा रहेगा। इसके लिए वह अभी से तैयारी कर रहे हैं। अपने खेतों के लिए खुद ही जैविक खाद भी तैयार करते हैं। उनका कहना है कि रासायनिक खादों के ज्यादा इस्तेमाल के कारण भी भूमि की उर्वरक क्षमता कम हो रही है, किसानों को यह बात समझनी चाहिए।