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Budaun News: बेहटा गोसाईं से उठी क्रांति की लौ, गांधी जी के आगमन ने भरी नई ऊर्जा

Tue, 12 Aug 2025 01:11 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 12 Aug 2025 01:11 AM IST
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The flame of revolution rose from Behta Gosain, Gandhiji's arrival filled it with new energy
शहर में ​स्थित इकलास खान का मकबरा। संवाद
बदायूं। मेरठ और बैरकपुर छावनी से उठी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला 15 मई 1857 को बदायूं पहुंचते ही भड़क उठीं। जिले के कोने-कोने में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गुस्से की लहर दौड़ गई। सबसे पहले बिल्सी तहसील के गांव बेहटा गोसाईं में विद्रोह की शुरुआत हुई, जहां ग्रामीणों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। यह आग जल्द ही परगना असदपुर पहुंची और अंग्रेजी प्रशासन में खलबली मच गई।
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कलेक्टर विलियम एडवर्ड्स ने हालात काबू में करने के लिए एटा, मुरादाबाद, शाहजहांपुर और बरेली जिलों से फौज मदद मांगी, लेकिन क्रांति की लपटें पूरे जिले में फैल चुकी थी। एक जून 1857 को बरेली की ब्रिगेड ने भी बगावत कर दी। खजाने की रक्षा कर रहे सिपाहियों ने विद्रोह कर खजाना लूट लिया और जेल के दरवाजे तोड़कर 300 बंदियों को मुक्त करा दिया। अंग्रेजी हुकूमत ने अप्रैल 1858 तक आंदोलन को बर्बरता से दबा दिया। कई क्रांतिकारियों को फांसी पर चढ़ा दिया गया और हजारों को जेलों में ठूंस दिया गया। हालांकि 1857 की क्रांति दब गई, लेकिन उसकी चिंगारी बुझी नहीं थी। एक मार्च 1921 को महात्मा गांधी के बदायूं आगमन ने स्वतंत्रता सेनानियों के भीतर नई ऊर्जा भर दी। उसी वर्ष गांधी जी के असहयोग आंदोलन में बदायूं की सक्रिय भूमिका रही। 1929 में गांधी जी दोबारा बदायूं आए और आजादी के आंदोलन में जनभागीदारी को नई गति दी।
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1930 में बदायूं पूर्ण स्वराज्य दिवस में हुआ दर्ज
-26 जनवरी 1930 को बदायूं के इतिहास में पूर्ण स्वराज्य दिवस के रूप में दर्ज किया गया। इस दिन आयोजित सभा में स्वतंत्रता सेनानी रघुवीर सहाय ने पूर्ण स्वराज का घोषणा पत्र पढ़कर सुनाया। जून 1932 में अंग्रेजों ने दमनकारी नीति अपनाते हुए सैकड़ों सेनानियों को गिरफ्तार कर फतेहगढ़ जेल भेज दिया, जहां वे 1933 तक कैद रहे। इससे आंदोलन कुछ समय के लिए धीमा पड़ा। वहीं, 1941 में सत्याग्रह आंदोलन के साथ बदायूं में क्रांति की लौ फिर से भड़क उठी।
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1942 से 1945 के बीच हिलने लगी थी अंग्रेजी शासन की जड़ें
-वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने जिले के सेनानियों में नई स्फूर्ति का संचार किया। मुंशी मंगलसेन, मास्टर जंग बहादुर जौहरी, कुंवर रुकुम सिंह, चौधरी तुलसीराम, पंडित निरंजन लाल, चौधरी बदन सिंह सहित सैकड़ों सेनानी संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में डटे रहे। 1942 से 1945 के बीच अंग्रेजी शासन की जड़ें हिलने लगीं। क्रांतिकारियों का हौसला आसमान छूने लगा। आखिरकार लंबे संघर्ष, बलिदानों और अडिग संकल्प के बाद 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली और बदायूं का नाम भी आजादी के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया।
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