{"_id":"5df3d8c58ebc3e879279644e","slug":"stamp-scame-badaun-news-bly387963598","type":"story","status":"publish","title_hn":"जांच की जद में आने वाले अधिकारियों ने शुरू कर दिया सेटिंग करना","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जांच की जद में आने वाले अधिकारियों ने शुरू कर दिया सेटिंग करना
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बदायूं। दातागंज स्थित उपकोषागार में हुए स्टांप घोटाले का दूसरा आरोपी अभी पुलिस गिरफ्त से बाहर चल रहा है। पुलिस उसकी तलाश में लगातार दबिश दे रही है। मुख्य आरोपी हरीश के जेल जाने के बाद अब इस घोटाले में शामिल अन्य लोगों में हलचल मची है। बताते हैं कि जांच की जद में आने वाले अधिकारियों ने अब उच्च स्तर पर सेटिंग शुरू कर दी है, ताकि वे अपना नाम किसी भी तरह इसमें आने से बचा सकें। उनमें यह बेचैनी शासन से आए एक पत्र के बाद बढ़ी है, जिसमें उनके नाम शामिल हैं।
दातागंज के उपकोषागार में हुआ स्टांप घोटाला वर्ष 1994 से चले आ रहे कारनामों का है। तब से लेकर अब तक करीब 11 तहसीलदार तैनात रहे। इनमें से दो नायब तहसीलदारों पर भी तहसीलदार का चार्ज रहा है। ऐसे में शासन ने इन पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। अधिकारियों के अनुसार किसी भी उपकोषागार की दो चाबी होती है, जिसमें एक चाबी रोकड़िया और दूसरी चाबी तहसीलदार के पास रहती है। इन दोनों चाबी को लगाए बिना उपकोषागार का गेट खुल नहीं सकता है। नियमानुसार प्रतिदिन तहसीलदार और रोकड़ियों को स्टांप निकलने के लिए ताला खोलना होता है। वहां से कितने स्टांप निकले, इसकी एंट्री रजिस्टर में करनी होती है। वहीं शाम को फिर से उपकोषागार का ताला खुलता है। इसमें पूरे दिन में जितने स्टांप बेचे, उनकी बिक्री की रकम और बकाया स्टांप गिनकर रखे जाते हैं। लेकिन इसमें अधिकारी स्तर से लापरवाही बरती गई। इसी का फायदा उठाकर रोकड़िया हरीश कुमार और सहायक राजेश घोटाले को अंजाम देने में लगे रहे।
सूत्रों के अनुसार अब शासन के निर्देश पर इन लोगों के कार्यकाल में कितने-कितने रुपये का घोटाला हुआ है, इसकी लिस्ट बनाई गई है। इसकी जानकारी जब पुराने समय में तहसीलदार के पद पर रहे अधिकारियों को हुई, तो उनमें हड़कंप मच गया है। बताते हैं कि उनकी तरफ से सेटिंग बैठाना शुरू कर दी गई है, ताकि उनका नाम सार्वजानिक न हो, और वे किसी भी तरह की कार्रवाई से बच सकें। वहीं घोटाला करने में सहायक आरोपी राजेश हाथ नहीं आ सका है, पुलिस उसकी तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
विज्ञापन
हां, शासन से एक पत्र आया है, इसमें पुराने समय में रहे तहसीलदारों के नाम और उनके समय में कितना-कितना रुपये में अंतर आ रहा है, उसका जिक्र किया गया है। उपकोषागार में जो भी घोटाला हुआ है, मेरे आने से पूर्व का है। मैं अभी यहां आया हूं, अब इसकी जानकारी जुटाई जा रही है। -धीरेंद्र कुमार, तहसीलदार दातागंज
विज्ञापन
दातागंज के उपकोषागार में हुआ स्टांप घोटाला वर्ष 1994 से चले आ रहे कारनामों का है। तब से लेकर अब तक करीब 11 तहसीलदार तैनात रहे। इनमें से दो नायब तहसीलदारों पर भी तहसीलदार का चार्ज रहा है। ऐसे में शासन ने इन पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। अधिकारियों के अनुसार किसी भी उपकोषागार की दो चाबी होती है, जिसमें एक चाबी रोकड़िया और दूसरी चाबी तहसीलदार के पास रहती है। इन दोनों चाबी को लगाए बिना उपकोषागार का गेट खुल नहीं सकता है। नियमानुसार प्रतिदिन तहसीलदार और रोकड़ियों को स्टांप निकलने के लिए ताला खोलना होता है। वहां से कितने स्टांप निकले, इसकी एंट्री रजिस्टर में करनी होती है। वहीं शाम को फिर से उपकोषागार का ताला खुलता है। इसमें पूरे दिन में जितने स्टांप बेचे, उनकी बिक्री की रकम और बकाया स्टांप गिनकर रखे जाते हैं। लेकिन इसमें अधिकारी स्तर से लापरवाही बरती गई। इसी का फायदा उठाकर रोकड़िया हरीश कुमार और सहायक राजेश घोटाले को अंजाम देने में लगे रहे।
विज्ञापन
सूत्रों के अनुसार अब शासन के निर्देश पर इन लोगों के कार्यकाल में कितने-कितने रुपये का घोटाला हुआ है, इसकी लिस्ट बनाई गई है। इसकी जानकारी जब पुराने समय में तहसीलदार के पद पर रहे अधिकारियों को हुई, तो उनमें हड़कंप मच गया है। बताते हैं कि उनकी तरफ से सेटिंग बैठाना शुरू कर दी गई है, ताकि उनका नाम सार्वजानिक न हो, और वे किसी भी तरह की कार्रवाई से बच सकें। वहीं घोटाला करने में सहायक आरोपी राजेश हाथ नहीं आ सका है, पुलिस उसकी तलाश में लगातार दबिश दे रही है।
विज्ञापन
हां, शासन से एक पत्र आया है, इसमें पुराने समय में रहे तहसीलदारों के नाम और उनके समय में कितना-कितना रुपये में अंतर आ रहा है, उसका जिक्र किया गया है। उपकोषागार में जो भी घोटाला हुआ है, मेरे आने से पूर्व का है। मैं अभी यहां आया हूं, अब इसकी जानकारी जुटाई जा रही है। -धीरेंद्र कुमार, तहसीलदार दातागंज