{"_id":"5d8fac838ebc3e93c418b63c","slug":"religion-badaun-news-bly377983899","type":"story","status":"publish","title_hn":"पितृपक्ष अमावस्या पर आस्था की डुबकी लगाकर पितरों को दी विदाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पितृपक्ष अमावस्या पर आस्था की डुबकी लगाकर पितरों को दी विदाई
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उझानी (बदायूं)। पितृृपक्ष अमावस्या पर शनिवार को कछला गंगाघाट पितरों के प्रति आस्था से सराबोर नजर आया। गंगा में आस्था की डुबकी लगाने के बाद लोगों ने पहले पूजा-अर्चना की फिर पितरों को तृप्त करने के लिए ब्राह्मणों को भोजन कराया। ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा भेंट कर पितरों को पृथ्वीलोक से विदा कर दिया गया।
कछला गंगाघाट पर शनिवार सुबह से लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने पितरों को तृप्त करने के सभी प्रकार के अनुष्ठान किए। गंगा स्नान के बाद सबसे पहले पितरों को अर्घ्य दिया गया। फिर पूजन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। ज्यादातर लोग अपने घरों से ही पितरों के मनपसंद पकवान बनवा कर घाट पर पहुंचे थे। उन्होंने ब्राह्मणों को दक्षिणा भी भेंट की। मान्यता है कि पितृपक्ष पूर्णिमा वाले दिन पृथ्वी पर पधारने वाले पितरों को अमावस्या वाले दिन विदाई दी जाती है। अमावस्या पर वह सभी लोग श्राद्ध करते हैं, जिन्होंने पितृपक्ष में किसी भी दिन पितर निमित्तों को भोजन नहीं कराया हो। इसे सर्व पितृ अमावस्या भी कहा जाता है। भूले-बिसरे पितरों का भी अमावस्या पर श्राद्ध किया जाता है। गंगाघाट पर मौजूद प्रसाद विक्रेताओं की मानें तो अमावस्या पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या काफी रही।
पितृदोष से बचने को श्राद्ध आवश्यक
ब्राह्मणों समेत जानकार कहते हैं कि पितृपक्ष के 14 दिन में अगर आप अपने पितरों का श्राद्ध नहीं कर पाए हों या फिर उनके श्राद्ध करने की तिथि भूल गए हों तो अमावस्या के दिन उन्हें तृप्त किया जा सकता है। श्राद्ध करने का तौर-तरीका एक जैसा होता है। मान्यता है कि इन 14 दिनों में पितर किसी भी दिन आपके घर आ सकते हैं। इसलिए अपने दरवाजे पर आने वाले जीव का भूलकर भी निरादर नहीं करें।
विज्ञापन
विज्ञापन
कछला गंगाघाट पर शनिवार सुबह से लोगों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने पितरों को तृप्त करने के सभी प्रकार के अनुष्ठान किए। गंगा स्नान के बाद सबसे पहले पितरों को अर्घ्य दिया गया। फिर पूजन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। ज्यादातर लोग अपने घरों से ही पितरों के मनपसंद पकवान बनवा कर घाट पर पहुंचे थे। उन्होंने ब्राह्मणों को दक्षिणा भी भेंट की। मान्यता है कि पितृपक्ष पूर्णिमा वाले दिन पृथ्वी पर पधारने वाले पितरों को अमावस्या वाले दिन विदाई दी जाती है। अमावस्या पर वह सभी लोग श्राद्ध करते हैं, जिन्होंने पितृपक्ष में किसी भी दिन पितर निमित्तों को भोजन नहीं कराया हो। इसे सर्व पितृ अमावस्या भी कहा जाता है। भूले-बिसरे पितरों का भी अमावस्या पर श्राद्ध किया जाता है। गंगाघाट पर मौजूद प्रसाद विक्रेताओं की मानें तो अमावस्या पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या काफी रही।
विज्ञापन
पितृदोष से बचने को श्राद्ध आवश्यक
ब्राह्मणों समेत जानकार कहते हैं कि पितृपक्ष के 14 दिन में अगर आप अपने पितरों का श्राद्ध नहीं कर पाए हों या फिर उनके श्राद्ध करने की तिथि भूल गए हों तो अमावस्या के दिन उन्हें तृप्त किया जा सकता है। श्राद्ध करने का तौर-तरीका एक जैसा होता है। मान्यता है कि इन 14 दिनों में पितर किसी भी दिन आपके घर आ सकते हैं। इसलिए अपने दरवाजे पर आने वाले जीव का भूलकर भी निरादर नहीं करें।
विज्ञापन