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गूंगे शाह की मजार पर हिंदू बनते सज्जादानशीन
अमर उजाला ब्यूरो, बदायूं
Updated Wed, 20 Jan 2016 07:10 PM IST
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अब तक छह सज्जादानशीन बन चुके हैं हिंदू, माघ के पहले रविवार को होगी ठिलिया रस्म
रज्जू शाह से पहले अब तक नौ सज्जादनशीन हुए हैं, जिनमें अधिकांश हिंदू ही थे। इनमें दीना शाह, अज्जू शाह, खमानी शाह, भोला शाह और यतीन शाह हिंदू परिवारों से ताल्लुक रखते थे। बाद में उन लोगों ने इस दरगाह की सेवा की और गद्दीनशीन भी बने। इससे इस दरगाह पर मुस्लिमों के साथ हिंदू अकीदतमंदों का भी बड़ा वर्ग शामिल है। गूंगे शाह की दरगाह के सज्जादानशीन रज्जू शाह के मुताबिक उनका वास्तविक नाम राजकुमार चौहान था। वह दिल्ली के चाणक्यपुरी के इलाके में रहते थे। एयरफोर्स की स्कूली बस पर कर्मचारी थे, जबकि उनके पिता मदन चौहान भी एयरफोर्स में कार्यरत थे। पांच भाई-बहनों में चौथे नंबर के थे। पहले वह दिल्ली की एक दरगाह में सेवा करते थे।
रज्जू शाह के मुताबिक एक दिन ख्वाब में उन्हें रमजानपुर की दरगाह पर खिदमत करने का आदेश मिला और वह यहां आ गए। यहां वह सज्जादानशीन मियां मंसूर शाह के चेले बन गए। मंसूर शाह के गुजरने के बाद गद्दी रज्जू शाह को सौंप दी गई। मान्यतानुसार यह गद्दी अविवाहित को दी जाती है।
अल्लाह के काम में दखल देने पर हुए थे गूंगे
कादरचौक। बुजुर्गों के अनुसार करीब दो शताब्दी पूर्व रमजानपुर में रेत के टीले के पास बाग में बारात ठहरी थी, जिसमें दूल्हा मर गया। तभी पास में टीले पर गूंहे शाह ने बारातियों को रोता देखकर दूल्हे को जिंदा कर दिया। इससे उनके बड़े भाई रेता शाह जो कादरगंज में रहते थे, वह भी पहुंचे हुए फकीर थे। उन्होंने गूंगे शाह से कहा कि तुमने अल्लाह के काम में दखल दिया है। आज से तुम बोल नहीं पाओगे। उन्होंने बोलना बंद कर दिया। तभी से लोग गूंगे शाह के नाम से पुकारने लगे।
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माघ के पहले रविवार को होगी ठिलिया (गागर) रस्म
कादरचौक। मेला ठेकेदार प्रधान चुन्नू मियां ने बताया कि मेला करीब 200 वर्षों से लग रहा है। मेला ग्राम पंचायत और सज्जादानशीन द्वारा लगवाया जाता था। वर्ष 1959 से मेला वफ्फ बोर्ड की ओर से लगवाया जाने लगा है। मेला एक माह तक चलता है। इसकी शुरुआत हो चुकी है, 24 जनवरी को को ठिलिया गागर रस्म होगी। यह माघ के पहले रविवार को ही मनाई जाती है। मेला में दूरदराज के पशु व्यापारी भी पहुंच रहे है, जिनकी पूरी व्यवस्था कमेटी की ओर से की जाती है। मेला मे मनोरंजन के साधनों के साथ ही दुकानें भी सजने लगी हैं।
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रज्जू शाह से पहले अब तक नौ सज्जादनशीन हुए हैं, जिनमें अधिकांश हिंदू ही थे। इनमें दीना शाह, अज्जू शाह, खमानी शाह, भोला शाह और यतीन शाह हिंदू परिवारों से ताल्लुक रखते थे। बाद में उन लोगों ने इस दरगाह की सेवा की और गद्दीनशीन भी बने। इससे इस दरगाह पर मुस्लिमों के साथ हिंदू अकीदतमंदों का भी बड़ा वर्ग शामिल है। गूंगे शाह की दरगाह के सज्जादानशीन रज्जू शाह के मुताबिक उनका वास्तविक नाम राजकुमार चौहान था। वह दिल्ली के चाणक्यपुरी के इलाके में रहते थे। एयरफोर्स की स्कूली बस पर कर्मचारी थे, जबकि उनके पिता मदन चौहान भी एयरफोर्स में कार्यरत थे। पांच भाई-बहनों में चौथे नंबर के थे। पहले वह दिल्ली की एक दरगाह में सेवा करते थे।
रज्जू शाह के मुताबिक एक दिन ख्वाब में उन्हें रमजानपुर की दरगाह पर खिदमत करने का आदेश मिला और वह यहां आ गए। यहां वह सज्जादानशीन मियां मंसूर शाह के चेले बन गए। मंसूर शाह के गुजरने के बाद गद्दी रज्जू शाह को सौंप दी गई। मान्यतानुसार यह गद्दी अविवाहित को दी जाती है।
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अल्लाह के काम में दखल देने पर हुए थे गूंगे
कादरचौक। बुजुर्गों के अनुसार करीब दो शताब्दी पूर्व रमजानपुर में रेत के टीले के पास बाग में बारात ठहरी थी, जिसमें दूल्हा मर गया। तभी पास में टीले पर गूंहे शाह ने बारातियों को रोता देखकर दूल्हे को जिंदा कर दिया। इससे उनके बड़े भाई रेता शाह जो कादरगंज में रहते थे, वह भी पहुंचे हुए फकीर थे। उन्होंने गूंगे शाह से कहा कि तुमने अल्लाह के काम में दखल दिया है। आज से तुम बोल नहीं पाओगे। उन्होंने बोलना बंद कर दिया। तभी से लोग गूंगे शाह के नाम से पुकारने लगे।
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माघ के पहले रविवार को होगी ठिलिया (गागर) रस्म
कादरचौक। मेला ठेकेदार प्रधान चुन्नू मियां ने बताया कि मेला करीब 200 वर्षों से लग रहा है। मेला ग्राम पंचायत और सज्जादानशीन द्वारा लगवाया जाता था। वर्ष 1959 से मेला वफ्फ बोर्ड की ओर से लगवाया जाने लगा है। मेला एक माह तक चलता है। इसकी शुरुआत हो चुकी है, 24 जनवरी को को ठिलिया गागर रस्म होगी। यह माघ के पहले रविवार को ही मनाई जाती है। मेला में दूरदराज के पशु व्यापारी भी पहुंच रहे है, जिनकी पूरी व्यवस्था कमेटी की ओर से की जाती है। मेला मे मनोरंजन के साधनों के साथ ही दुकानें भी सजने लगी हैं।