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दातागंज की शिप्रा मध्यप्रदेश में बनीं ‘वाटर वुमन’
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शिप्रा पाठक। संवाद
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। दातागंज के राजनीतिक परिवार से जुड़ी शिप्रा पाठक ने मध्य प्रदेश में सामाजिक सरोकार के जरिये अपनी पहचान बनाई है। वह नर्मदा की 3600 किमी की पदयात्रा कर चुकी हैं। इन दिनों मध्यप्रदेश में जल व जंगल संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहीं हैं। वहां वह ‘वाटर वुमन’ के तौर पर प्रसिद्ध हैं।
शिप्रा दातागंज निवासी भाजपा नेता डॉ. शैलेश पाठक की बेटी व पूर्व विधायक स्व. संतोष कुमारी पाठक की पोती हैं। उनकी शिक्षा बदायूं जिले में ही हुई। कछला गंगा घाट स्थित गोविंद बल्लभ पंत डिग्री कॉलेज से स्नातक करने के दौरान ही जल से जुड़ाव हुआ। एमए के बाद एक इवेंट कंपनी से जुड़ गईं। इवेंट मैनेजर के तौर पर श्रीलंका, चीन, हांगकांग, और भूटान जैसे देशों में रहना हुआ। तब महसूस हुआ कि कई जगह बाकी सुविधाएं तो बहुतेरी हैं पर जल संकट बरकरार है। बड़े शहरों में भी पानी के टैंकर आते हैं और लोग हिसाब से ही पानी खर्च करते हैं। यहीं से जल संरक्षण का विचार पनपा।
फिर नर्मदा परिक्रमा का निर्णय लिया। परिवार शुरू में इसके लिए तैयार नहीं था कि अकेली बेटी नदी और जंगलों की खाक छाने। उनके समझाने पर घरवाले मान गए। फिर उन्होंने 3600 किमी की नर्मदा यात्रा 108 दिन में पूरी की। नर्मदा किनारे घूमते हुए महसूस हुआ कि जल बचाने को जंगल बचाना भी जरूरी है। इसके लिए एक करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया।
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इतनी संख्या में पौधे तैयार करना, उन्हें रोपना और देखभाल करना आसान नहीं था। इसके लिए उन्होंने पंचतत्व नाम की संस्था की स्थापना की। नर्मदा व शिप्रा नदी किनारे बसे गांवों के लोगों जो अभियान से जोड़ा और उन्हीं के खेतों में पौध तैयार कराने का काम किया। शिप्रा का दावा है कि करीब तीन लाख पौधे नदियों के किनारे लगाए जा चुकी हैं। करीब एक करोड़ लोगों को जल संरक्षण की शपथ दिला चुकी हैं। आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए औषधीय खेती पर भी उनका जोर है। मानसरोवर, शिप्रा व सरयू नदी की पदयात्रा भी वह कर चुकी हैं। उनके कार्यों से प्रभावित होकर मध्यप्रदेश की कई संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं। मध्यप्रदेश के उज्जैन व उससे जुड़े इलाकों में शिप्रा को ‘वाटर वुमन’ के नाम से जाना जाता है। संवाद
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शिप्रा दातागंज निवासी भाजपा नेता डॉ. शैलेश पाठक की बेटी व पूर्व विधायक स्व. संतोष कुमारी पाठक की पोती हैं। उनकी शिक्षा बदायूं जिले में ही हुई। कछला गंगा घाट स्थित गोविंद बल्लभ पंत डिग्री कॉलेज से स्नातक करने के दौरान ही जल से जुड़ाव हुआ। एमए के बाद एक इवेंट कंपनी से जुड़ गईं। इवेंट मैनेजर के तौर पर श्रीलंका, चीन, हांगकांग, और भूटान जैसे देशों में रहना हुआ। तब महसूस हुआ कि कई जगह बाकी सुविधाएं तो बहुतेरी हैं पर जल संकट बरकरार है। बड़े शहरों में भी पानी के टैंकर आते हैं और लोग हिसाब से ही पानी खर्च करते हैं। यहीं से जल संरक्षण का विचार पनपा।
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फिर नर्मदा परिक्रमा का निर्णय लिया। परिवार शुरू में इसके लिए तैयार नहीं था कि अकेली बेटी नदी और जंगलों की खाक छाने। उनके समझाने पर घरवाले मान गए। फिर उन्होंने 3600 किमी की नर्मदा यात्रा 108 दिन में पूरी की। नर्मदा किनारे घूमते हुए महसूस हुआ कि जल बचाने को जंगल बचाना भी जरूरी है। इसके लिए एक करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया।
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इतनी संख्या में पौधे तैयार करना, उन्हें रोपना और देखभाल करना आसान नहीं था। इसके लिए उन्होंने पंचतत्व नाम की संस्था की स्थापना की। नर्मदा व शिप्रा नदी किनारे बसे गांवों के लोगों जो अभियान से जोड़ा और उन्हीं के खेतों में पौध तैयार कराने का काम किया। शिप्रा का दावा है कि करीब तीन लाख पौधे नदियों के किनारे लगाए जा चुकी हैं। करीब एक करोड़ लोगों को जल संरक्षण की शपथ दिला चुकी हैं। आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए औषधीय खेती पर भी उनका जोर है। मानसरोवर, शिप्रा व सरयू नदी की पदयात्रा भी वह कर चुकी हैं। उनके कार्यों से प्रभावित होकर मध्यप्रदेश की कई संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं। मध्यप्रदेश के उज्जैन व उससे जुड़े इलाकों में शिप्रा को ‘वाटर वुमन’ के नाम से जाना जाता है। संवाद