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...हिंद में प्यार की बहती गंगा रहे
badaun
Updated Thu, 29 Jan 2015 08:05 PM IST
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नगर पंचायत हॉल में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें कवियों ने अपनी-अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। चेयरमैन राजीव कुमार गुप्ता ने दीप प्रज्ज्वलित कर और अभिषेक अनंत ने सरस्वती वंदना से सम्मेलन का शुभारंभ किया।
नवोदित हस्ताक्षर आकांक्षित केशव ने कहा-
भरी बरसात में मेरे सिर का छप्पर बिक गया,
इस सावन के चक्कर में पतझड़ बिक गया,
जहां दोस्तों के संग चाय की चुस्कियां लेते थे,
एक हाईवे के चक्कर में मेरा नुक्कड़ बिक गया।
शृंगार रस के कवि अभिषेक अनंत ने कहा-
प्रेम कलिका क्या खिलीं, इन पत्थरों के बीच में,
यूं लगा की जूं आंख रख दी नस्तरों के बीच में।
आनंद मिश्रा अधीर ने कहा-
हम रहे न रहे, ये तिरंगा रहे,
हिंद में प्यार की बहती गंगा रहे।
हे, प्रभु आपसे कामना है यहीं,
धर्म-जाति का नहीं कोई दंगा रहे।
भानु ने कहा-
दम सोचो उनका कितना यार घुटा होगा,
जो जिए देश के लिए, देश को याद नहीं,
सब निछावर किया जिन्होंने हम पर,
पर अपने लिए करी कभी कोई फरियाद नहीं।
मुकेश कमल ने कहा-
मन के ये भाव, सारे चरणों में उनके अर्पित,
बलिदान करके खुद को कुछ न कर पाए अर्जित,
मस्तक मेरे वतन का ऊंचा जो कर गए हैं,
उन वीर सैनिकों को श्रद्धा सुमन समर्पित
डॉ. अरविंद धवल ने कहा-
अच्छाई की कभी बुराई मत करना,
पड़े छिपानी ऐसी कमाई मत करना,
आंसू को सम्मानित करना जीवनभर,
मुस्कानों की बदन दिखाई मत करना
इसके अलावा डॉ. अब्दुल, शराफत, उमेंद्र कुमार वर्मा आदि ने भी अपनी रचनाएं पढ़ी। संचालन भूराज सिंह राजलॉयर ने किया।
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नवोदित हस्ताक्षर आकांक्षित केशव ने कहा-
भरी बरसात में मेरे सिर का छप्पर बिक गया,
इस सावन के चक्कर में पतझड़ बिक गया,
जहां दोस्तों के संग चाय की चुस्कियां लेते थे,
एक हाईवे के चक्कर में मेरा नुक्कड़ बिक गया।
शृंगार रस के कवि अभिषेक अनंत ने कहा-
प्रेम कलिका क्या खिलीं, इन पत्थरों के बीच में,
यूं लगा की जूं आंख रख दी नस्तरों के बीच में।
आनंद मिश्रा अधीर ने कहा-
हम रहे न रहे, ये तिरंगा रहे,
हिंद में प्यार की बहती गंगा रहे।
हे, प्रभु आपसे कामना है यहीं,
धर्म-जाति का नहीं कोई दंगा रहे।
भानु ने कहा-
दम सोचो उनका कितना यार घुटा होगा,
जो जिए देश के लिए, देश को याद नहीं,
सब निछावर किया जिन्होंने हम पर,
पर अपने लिए करी कभी कोई फरियाद नहीं।
मुकेश कमल ने कहा-
मन के ये भाव, सारे चरणों में उनके अर्पित,
बलिदान करके खुद को कुछ न कर पाए अर्जित,
मस्तक मेरे वतन का ऊंचा जो कर गए हैं,
उन वीर सैनिकों को श्रद्धा सुमन समर्पित
डॉ. अरविंद धवल ने कहा-
अच्छाई की कभी बुराई मत करना,
पड़े छिपानी ऐसी कमाई मत करना,
आंसू को सम्मानित करना जीवनभर,
मुस्कानों की बदन दिखाई मत करना
इसके अलावा डॉ. अब्दुल, शराफत, उमेंद्र कुमार वर्मा आदि ने भी अपनी रचनाएं पढ़ी। संचालन भूराज सिंह राजलॉयर ने किया।