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रेलई माधौपुर में थी कंकड़ों की खान
सहसवान (बदायूं)।
Updated Sun, 15 Feb 2015 12:22 AM IST
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रेलई माधौपुर गांव कभी कंकड़ों की खान हुआ करता था। गांव में कंकड़ों से बनी मीर हादे अली की कोठी इसका उदाहरण है। अंग्रेजी हुकूमत में बने कछला के रेलवे पुल के किनारे बांधने में भी इसी गांव के कंकड़ प्रयुक्त हुए थे। जिले की पुरानी कोठियों और मंदिर-मस्जिदों की बुनियादों में यहां का ही कंकड़ लगा है।
बदायूं-मेरठ राजमार्ग पर सहसवान के गांव खंदक से उत्तर-पूरब में पांच किमी दूर यह गांव है। गांव के पूरब में वह तालाब है, जो कभी कंकड़ों की खान कहा जाता था। उस समय सड़कों के निर्माण हो या इमारत बनानी हो, कंकड़ों का लदान यहीं से होता था। बुजुर्ग बताते हैं कि कभी भागीरथी का प्रवाह उनके गांव के पास से ही था। उस समय उसके तट पर सैकड़ों साल पुराना पीपल का वृक्ष अभी भी है। पीपल के इसी वृक्ष के पास गमादेवत (ग्राम देवता) का मठ है। समय गुजरने के साथ-साथ भागीरथी का प्रवाह दक्षिण की ओर सरकता गया। जनश्रुति है कि भागीरथी के जगह छोड़ने के बाद एक महात्मा ने इस गांव को बसाया था।
क्षेत्र में कंकड़ों की इमारत बनाने में बिल्सी के कारीगरों को महारत थी। यहां के अब्दुल वाजिद और अब्दुल आसिफ जमींदार थे, जो मूल रूप से सहसवान के मुल्ला टोला के रहने वाले थे। बाद में इनके परिवार के लोग भी इस गांव में जाकर बस गए।
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इनाम के तौर पर मिला लाइसेंस
1955 में पड़ोस के गांव सुजातगंज पस्तौर में महमूद खां के घर डकैती के दौरान गांव के अब्दुल माजिद, अब्दुल शाहिद और अनबर अली ने डकैतों का मुकाबला करते हुए एटा के दो डकैतों को मार गिराया। उस समय इनके पास टोपी वाली बंदूकें थी। इनकी बहादुरी को देखते हुए तत्कालीन डीआईजी ने अनबर अली को 12 बोर की बंदूक और अब्दुल माजिद को दोनाली 22 बोर रायफल का लाइसेंस इनाम में दिया था।
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बदायूं-मेरठ राजमार्ग पर सहसवान के गांव खंदक से उत्तर-पूरब में पांच किमी दूर यह गांव है। गांव के पूरब में वह तालाब है, जो कभी कंकड़ों की खान कहा जाता था। उस समय सड़कों के निर्माण हो या इमारत बनानी हो, कंकड़ों का लदान यहीं से होता था। बुजुर्ग बताते हैं कि कभी भागीरथी का प्रवाह उनके गांव के पास से ही था। उस समय उसके तट पर सैकड़ों साल पुराना पीपल का वृक्ष अभी भी है। पीपल के इसी वृक्ष के पास गमादेवत (ग्राम देवता) का मठ है। समय गुजरने के साथ-साथ भागीरथी का प्रवाह दक्षिण की ओर सरकता गया। जनश्रुति है कि भागीरथी के जगह छोड़ने के बाद एक महात्मा ने इस गांव को बसाया था।
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क्षेत्र में कंकड़ों की इमारत बनाने में बिल्सी के कारीगरों को महारत थी। यहां के अब्दुल वाजिद और अब्दुल आसिफ जमींदार थे, जो मूल रूप से सहसवान के मुल्ला टोला के रहने वाले थे। बाद में इनके परिवार के लोग भी इस गांव में जाकर बस गए।
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इनाम के तौर पर मिला लाइसेंस
1955 में पड़ोस के गांव सुजातगंज पस्तौर में महमूद खां के घर डकैती के दौरान गांव के अब्दुल माजिद, अब्दुल शाहिद और अनबर अली ने डकैतों का मुकाबला करते हुए एटा के दो डकैतों को मार गिराया। उस समय इनके पास टोपी वाली बंदूकें थी। इनकी बहादुरी को देखते हुए तत्कालीन डीआईजी ने अनबर अली को 12 बोर की बंदूक और अब्दुल माजिद को दोनाली 22 बोर रायफल का लाइसेंस इनाम में दिया था।