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महंगाई ने रावण का कद किया छोटा
अमर उजाला ब्यूरो,बदायूं
Updated Fri, 29 Sep 2017 07:19 PM IST
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देश की अर्थ व्यवस्था को भले ही मजबूत बताने का दावा किया जाता हो किंतु हकीकत यहीं है कि महंगाई से हर कोई प्रभावित हुआ है। गरीबों की थाली से लेकर त्योहारों पर भी उसकी मार पड़ रही है। महंगाई की वजह से हर साल रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों की ऊंचाई भी घटती जा रही है।
गांधी ग्राउंड पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले तैयार हो रहे हैं। उन्हें आंवला निवासी तालीब मसूंदी तैयार कर रहे हैं। बातचीत में उन्होंने बताया कि इन सब पुतलों के अलावा लंका बनाने में 24-25 हजार रुपये का ठेका मिलता था। तब पुतलों की ऊंचाई 50 से 55 फुट होती थी। पुतलों में काफी आतिशबाजी भी लगती थी। पुतला बनाने में उपयोग में लाई जाने वाली सामग्री में राशि खर्च करने के बाद भी कुछ पैसा बच जाता था,लेकिन महंगाई के इस दौर में धंधा प्रभावित हुआ है।
बोले-अब तीनों पुतलों का ठेका 30 से 32 हजार का होता है। इसमें मात्र दिहाड़ी ही बच पाती है। पुतलों की ऊंचाई भी करीब 40 फुट रह गई है। तालीब मंसूदी ने बताया कि यह उनका पैतृक काम है। पिता और दो भाई भी यहीं धंधा करते हैं। उसी से परिवार का पालन-पोषण होता है।
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ठेका के मुताबिक होता है क्षेत्रों में काम
पुतला बनाने वाले तालीब मंसूदी ने बताया कि रामलीला के दिनों में बनने वाले पुतलों को बनाने का हर साल क्षेत्र वार ठेका होता है। उनको आंवला, वजीरगंज, बदायूं, उझानी और इफको का एरिया मिला है। बाकी अन्य स्थानों पर दूसरे लोग इन पुतलों को तैयार करते हैं।
कला को कभी नहीं जोड़ा मजहब से
तालीब मंसूदी कहते हैं कि चूंकि उनका यह पैतृक धंधा है। सो उन्होंने कभी अपनी कला को मजहब से नहीं जोड़ा। वह पूरे मनोयोग से पुतलों को तैयार करते हैं। कलाकार कभी खुद को मजहब से नहीं जोड़ता है।
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गांधी ग्राउंड पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले तैयार हो रहे हैं। उन्हें आंवला निवासी तालीब मसूंदी तैयार कर रहे हैं। बातचीत में उन्होंने बताया कि इन सब पुतलों के अलावा लंका बनाने में 24-25 हजार रुपये का ठेका मिलता था। तब पुतलों की ऊंचाई 50 से 55 फुट होती थी। पुतलों में काफी आतिशबाजी भी लगती थी। पुतला बनाने में उपयोग में लाई जाने वाली सामग्री में राशि खर्च करने के बाद भी कुछ पैसा बच जाता था,लेकिन महंगाई के इस दौर में धंधा प्रभावित हुआ है।
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बोले-अब तीनों पुतलों का ठेका 30 से 32 हजार का होता है। इसमें मात्र दिहाड़ी ही बच पाती है। पुतलों की ऊंचाई भी करीब 40 फुट रह गई है। तालीब मंसूदी ने बताया कि यह उनका पैतृक काम है। पिता और दो भाई भी यहीं धंधा करते हैं। उसी से परिवार का पालन-पोषण होता है।
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ठेका के मुताबिक होता है क्षेत्रों में काम
पुतला बनाने वाले तालीब मंसूदी ने बताया कि रामलीला के दिनों में बनने वाले पुतलों को बनाने का हर साल क्षेत्र वार ठेका होता है। उनको आंवला, वजीरगंज, बदायूं, उझानी और इफको का एरिया मिला है। बाकी अन्य स्थानों पर दूसरे लोग इन पुतलों को तैयार करते हैं।
कला को कभी नहीं जोड़ा मजहब से
तालीब मंसूदी कहते हैं कि चूंकि उनका यह पैतृक धंधा है। सो उन्होंने कभी अपनी कला को मजहब से नहीं जोड़ा। वह पूरे मनोयोग से पुतलों को तैयार करते हैं। कलाकार कभी खुद को मजहब से नहीं जोड़ता है।