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दया के संपर्क में आने से मानव छोड़ देता है क्रूरता
बिल्सी।
Updated Wed, 13 Sep 2017 12:45 AM IST
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रामकथा
- फोटो : अमर उजाला
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बिल्सी में रामकथा का आठवां दिन
नगर की माहेश्वरी धर्मशाला में श्रीराम-कृष्ण समिति के तत्वावधान में चल रही भगवान राम की कथा के आठवें दिन स्वामी अयोध्यादास रामायणी जी महाराज ने हिरण्यकश्यप की कथा का वर्णन किया।
उन्होंने हुए कहा कि हिरण्यकश्यप ने अपनी मृत्यु के लिए अनेक बचाव करते हुए वरदान मांगे कि उसकी मृत्यु न दिन में, न रात में हो, न पृथ्वी पर और ही आकाश में हो। न किसी शस्त्र से हो लेकिन नरसिंह भगवान ने उसकी सारी बातें मानते हुए भक्त प्रहलाद की भक्ति की मान्यता रखी और हिरण्यकश्यप को मृत्यु का सामना करना ही पड़ा। इसके बाद स्वामी ने हनुमान जी के कौशल का वर्णन करते हुए कहा कि अशोक वन में सीता जी को उनके स्वरूप पर संदेह हुआ कि यह भी रावण की माया हो सकती है। इसलिए उन्होंने हनुमान जी के प्रगट होने का अनुरोध किया। हनुमान प्रगट हुए और उन्होंने श्रीराम जी की मनोदशा का विस्तार से वर्णन किया और कहा कि श्रीराम जी का मन आपके ही पास रहता है। इसी प्रकार रावण के दरबार में अंगद का संवाद सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। उन्होंने कहा कि पृथ्वी जानकी जी की जननी है अत:पृथ्वी ने स्वयं अंगद का पांव लिया और कोई उसे नहीं हिला सका। स्वामी ने करुणा और दया की परिभाषा और महत्व समझाते हुए कहा कि अपने प्रति उपकार करने वाले पर भी दया-भाव रखना चाहिए। क्योंकि क्रूर से क्रूर व्यक्ति भी दया के संपर्क में आने पर अपनी क्रूरता छोड़ देता है। अनेक महात्माओं की सरलता और ममता से निठर व्यक्तियों का भी हृदय परिवर्तन हो गया है। इसलिए मानव को हर परिस्थिति में करुणा-भाव अपनाना चाहिए। इसके बाद यहां आरती के बाद प्रसाद का वितरण किया गया। इस मौके पर नरेंद्र गरल, बनवारी लाल शर्मा, दयाचंद्र, गोरेलाल व्यास, लोकेश बाबू, आशीष वशिष्ठ, नीरज माहेश्वरी, मनोज वार्ष्णेय, सुवीन माहेश्वरी, दिनेश चंद्र वार्ष्णेय आदि समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे।
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नगर की माहेश्वरी धर्मशाला में श्रीराम-कृष्ण समिति के तत्वावधान में चल रही भगवान राम की कथा के आठवें दिन स्वामी अयोध्यादास रामायणी जी महाराज ने हिरण्यकश्यप की कथा का वर्णन किया।
उन्होंने हुए कहा कि हिरण्यकश्यप ने अपनी मृत्यु के लिए अनेक बचाव करते हुए वरदान मांगे कि उसकी मृत्यु न दिन में, न रात में हो, न पृथ्वी पर और ही आकाश में हो। न किसी शस्त्र से हो लेकिन नरसिंह भगवान ने उसकी सारी बातें मानते हुए भक्त प्रहलाद की भक्ति की मान्यता रखी और हिरण्यकश्यप को मृत्यु का सामना करना ही पड़ा। इसके बाद स्वामी ने हनुमान जी के कौशल का वर्णन करते हुए कहा कि अशोक वन में सीता जी को उनके स्वरूप पर संदेह हुआ कि यह भी रावण की माया हो सकती है। इसलिए उन्होंने हनुमान जी के प्रगट होने का अनुरोध किया। हनुमान प्रगट हुए और उन्होंने श्रीराम जी की मनोदशा का विस्तार से वर्णन किया और कहा कि श्रीराम जी का मन आपके ही पास रहता है। इसी प्रकार रावण के दरबार में अंगद का संवाद सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। उन्होंने कहा कि पृथ्वी जानकी जी की जननी है अत:पृथ्वी ने स्वयं अंगद का पांव लिया और कोई उसे नहीं हिला सका। स्वामी ने करुणा और दया की परिभाषा और महत्व समझाते हुए कहा कि अपने प्रति उपकार करने वाले पर भी दया-भाव रखना चाहिए। क्योंकि क्रूर से क्रूर व्यक्ति भी दया के संपर्क में आने पर अपनी क्रूरता छोड़ देता है। अनेक महात्माओं की सरलता और ममता से निठर व्यक्तियों का भी हृदय परिवर्तन हो गया है। इसलिए मानव को हर परिस्थिति में करुणा-भाव अपनाना चाहिए। इसके बाद यहां आरती के बाद प्रसाद का वितरण किया गया। इस मौके पर नरेंद्र गरल, बनवारी लाल शर्मा, दयाचंद्र, गोरेलाल व्यास, लोकेश बाबू, आशीष वशिष्ठ, नीरज माहेश्वरी, मनोज वार्ष्णेय, सुवीन माहेश्वरी, दिनेश चंद्र वार्ष्णेय आदि समेत सैकड़ों लोग मौजूद रहे।
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