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Budaun News: होली के दिन भी अपनों की राह तक रहीं 30 बुजुर्गों की आंखें
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कुंवरगांव (बदायूं)। होली आते ही परदेस गए बेटों-बेटियों की घर वापसी शुरू हो जाती है। बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों पर रौनक बढ़ जाती है। गांव-कस्बों में चौपालें सजने लगती हैं। बावजूद इसके नगर के साप्ताहिक बाजार के पास संचालित एक वृद्धाश्रम में 30 बुजुर्गों की आंखें अब भी उसी राह को तकती हैं कि शायद कोई अपना लौट आए।
यहां रहने वाले बुजुर्गों के लिए होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि उम्मीद और इंतजार का दिन बन जाता है। कोई बेटा दिल्ली में नौकरी करता है, तो किसी की बेटी दूसरे राज्य में बस चुकी है। कई बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिनसे वर्षों से कोई मिलने नहीं आया। वृद्धाश्रम के एक बुजुर्ग ने बताया कि होली पर लगता है कि शायद इस बार कोई लेने आ जाएगा…। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान है, लेकिन आंखों में इंतजार साफ झलकता है।
संस्था के संचालकों का कहना है कि यहां करीब 30 वृद्ध रह रहे हैं। त्योहारों पर संस्था की ओर से रंग-गुलाल, मिठाई और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है, ताकि बुजुर्ग खुद को अकेला महसूस न करें। फिर भी अपनों की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।
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कुछ बुजुर्गों ने बताया कि पहले उनके घरों में होली पर पकवान बनते थे, बच्चे रंग खेलने आते थे, लेकिन अब यादों के सहारे ही त्योहार गुजर जाता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, रिश्तों की डोर को मजबूत करने का अवसर भी होते हैं। ऐसे में परिवारों को चाहिए कि वे अपने बुजुर्गों के साथ समय बिताएं, ताकि उनके जीवन में भी रंग भर सकें।
होली हमारे समय में परिवार का सबसे बड़ा त्योहार होता था। सुबह से ही घर में गुझिया बनती थीं। दोपहर तक आंगन रंगों से भर जाता था। अब यहां साथ तो हैं, पर अपना परिवार नहीं। हर साल सोचता हूं शायद इस बार बेटा आ जाए। - वेदराम
बेटा दूसरे राज्य में नौकरी करता है। फोन पर कहता है मां अपना ध्यान रखना। पर त्योहार पर मां को बेटे का हाथ चाहिए, सिर्फ आवाज नहीं। होली पर सबसे ज्यादा खालीपन महसूस होता है। - रामप्यारी
संस्था हमें अच्छे से रखती है, किसी चीज की कमी नहीं। त्योहार पर मन अपने घर की चौखट ढूंढता है। रंग तो लगा लेते हैं, पर रिश्तों का रंग फीका पड़ गया है। बहुत दुख होता है। - गिरवर
मैं आज भी उम्मीद रखती हूं। होली मिलन का पर्व है, शायद इस बार कोई दरवाजा खटखटा दे। जब तक सांस है, तब तक आस है। कई साल से बस यहीं इंतजार करती आ रहीं हूं। - निर्मला देवी
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यहां रहने वाले बुजुर्गों के लिए होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि उम्मीद और इंतजार का दिन बन जाता है। कोई बेटा दिल्ली में नौकरी करता है, तो किसी की बेटी दूसरे राज्य में बस चुकी है। कई बुजुर्ग ऐसे भी हैं जिनसे वर्षों से कोई मिलने नहीं आया। वृद्धाश्रम के एक बुजुर्ग ने बताया कि होली पर लगता है कि शायद इस बार कोई लेने आ जाएगा…। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान है, लेकिन आंखों में इंतजार साफ झलकता है।
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संस्था के संचालकों का कहना है कि यहां करीब 30 वृद्ध रह रहे हैं। त्योहारों पर संस्था की ओर से रंग-गुलाल, मिठाई और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है, ताकि बुजुर्ग खुद को अकेला महसूस न करें। फिर भी अपनों की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।
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कुछ बुजुर्गों ने बताया कि पहले उनके घरों में होली पर पकवान बनते थे, बच्चे रंग खेलने आते थे, लेकिन अब यादों के सहारे ही त्योहार गुजर जाता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि त्योहार केवल उत्सव नहीं, रिश्तों की डोर को मजबूत करने का अवसर भी होते हैं। ऐसे में परिवारों को चाहिए कि वे अपने बुजुर्गों के साथ समय बिताएं, ताकि उनके जीवन में भी रंग भर सकें।
होली हमारे समय में परिवार का सबसे बड़ा त्योहार होता था। सुबह से ही घर में गुझिया बनती थीं। दोपहर तक आंगन रंगों से भर जाता था। अब यहां साथ तो हैं, पर अपना परिवार नहीं। हर साल सोचता हूं शायद इस बार बेटा आ जाए। - वेदराम
बेटा दूसरे राज्य में नौकरी करता है। फोन पर कहता है मां अपना ध्यान रखना। पर त्योहार पर मां को बेटे का हाथ चाहिए, सिर्फ आवाज नहीं। होली पर सबसे ज्यादा खालीपन महसूस होता है। - रामप्यारी
संस्था हमें अच्छे से रखती है, किसी चीज की कमी नहीं। त्योहार पर मन अपने घर की चौखट ढूंढता है। रंग तो लगा लेते हैं, पर रिश्तों का रंग फीका पड़ गया है। बहुत दुख होता है। - गिरवर
मैं आज भी उम्मीद रखती हूं। होली मिलन का पर्व है, शायद इस बार कोई दरवाजा खटखटा दे। जब तक सांस है, तब तक आस है। कई साल से बस यहीं इंतजार करती आ रहीं हूं। - निर्मला देवी