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आस्थाः मंगला माता के मंदिर से खाली हाथ नहीं लौटता कोई
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वजीरगंज में माता का दरबार। संवाद
- फोटो : BADAUN
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वजीरगंज (बदायूं)। कस्बे के पास पठारनुमा किले के अवशेष पर माता मंगला देवी का प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर की आसपास इलाके में बड़ी मान्यता है। मंदिर में हर साल बड़ा मेला लगता है जो इस बार 16 अप्रैल से लगेगा।
नगर से मात्र दो किमी दूर आंवला मार्ग स्थित एक ऊंचे टीले पर श्री राज राजेश्वरी मंगला माता का मंदिर है। लोगों की ऐसी आस्था है कि यहां दर्शन लाभ से ही विभिन्न कष्टों और संकटों से छुटकारा मिल जाता है। माता के दरबार से कोई निराश होकर नहीं लौटता। मां की आराधना के लिए वैसे तो बारहों महीने भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन सर्वश्रेष्ठ समय नवरात्र ही माना गया है। नवरात्र के बाद श्रद्धालु चैत्र मास की द्वादशी से लेकर पूर्णिमा तक देवी मां की जात (विशेष पूजा) करते हैं। इन्हीं दिनों में लोग अपने बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं।
मान्यता है कि यहां मुंडन कराने से बच्चे स्वस्थ तथा दीर्घायु होते हैं। पूर्णिमा के दिन से यहां मां के विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है, इस बार यह मेला 16 अप्रैल से लगेगा। इसमें प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों से भी आकर दुकानदार दुकानें लगाते हैं बल्कि श्रद्धालु भी हाजिरी लगाते हैं।
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देवी मां के भव्य मंदिर की प्राचीनता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि प्राचीन ग्रंथों के साथ आल्हा ऊदल की कथाओं में भी इस मंदिर का कई बार जिक्र किया गया है।
जानकार बताते हैं कि जिस जगह मां का मंदिर है पहले यहां मई भवानीगंज नाम की रियासत का किला था। जिसे किसी राजा ने आक्रमण करके खंडहर बना दिया । इसने एक टीले का रूप ले लिया, उसी टीले से मां का मठ बाहर से दिखने लगा तो इस मंदिर की मान्यता बढ़ती गई। समय के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी होता गया।
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मनौती पूरी होने पर भक्त घंटा चढ़ाकर करते हैं भंडारा
देवी मां के मंदिर की सदियों से सेवा करते आ रहे नगर के माली परिवार के सेवादार शिवसहाय ने बताया कि यहां मेला कब से लग रहा है इसकी सही जानकारी उनके पुरखों को भी नही थी। यहां मांगी गई भक्तों की हर मुराद पूरी होती है। इसके बाद भक्त यहां घंटा चढ़ाकर भंडारा कराते है।
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मां काली, लक्ष्मी तथा सरस्वती के स्वरूप में हैं मूर्ति
मठ से निकली देवी मां की प्रतिमा को देखने से ही सिद्धपीठ का आभास होता है। प्रतिमा में तीन देवियों का प्रतिरूप बड़े आकार में है जो शक्ति का स्वरूप मां काली, धन की देवी मां लक्ष्मी एवं ज्ञान की देवी मां सरस्वती के स्वरूप हैं। इसके अतिरिक्त तीनो देवियों की प्रतिमा में कई छोटे छोटे स्वरूप भी हैं जो देखने में तो अलग लगते हैं मगर कोई भी भक्त आज तक उनकी सही गिनती नही कर पाया है। हर बार गिनने में संख्या भिन्न ही आती है। संवाद
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नगर से मात्र दो किमी दूर आंवला मार्ग स्थित एक ऊंचे टीले पर श्री राज राजेश्वरी मंगला माता का मंदिर है। लोगों की ऐसी आस्था है कि यहां दर्शन लाभ से ही विभिन्न कष्टों और संकटों से छुटकारा मिल जाता है। माता के दरबार से कोई निराश होकर नहीं लौटता। मां की आराधना के लिए वैसे तो बारहों महीने भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन सर्वश्रेष्ठ समय नवरात्र ही माना गया है। नवरात्र के बाद श्रद्धालु चैत्र मास की द्वादशी से लेकर पूर्णिमा तक देवी मां की जात (विशेष पूजा) करते हैं। इन्हीं दिनों में लोग अपने बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं।
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मान्यता है कि यहां मुंडन कराने से बच्चे स्वस्थ तथा दीर्घायु होते हैं। पूर्णिमा के दिन से यहां मां के विशाल मेले का भी आयोजन किया जाता है, इस बार यह मेला 16 अप्रैल से लगेगा। इसमें प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों से भी आकर दुकानदार दुकानें लगाते हैं बल्कि श्रद्धालु भी हाजिरी लगाते हैं।
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देवी मां के भव्य मंदिर की प्राचीनता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि प्राचीन ग्रंथों के साथ आल्हा ऊदल की कथाओं में भी इस मंदिर का कई बार जिक्र किया गया है।
जानकार बताते हैं कि जिस जगह मां का मंदिर है पहले यहां मई भवानीगंज नाम की रियासत का किला था। जिसे किसी राजा ने आक्रमण करके खंडहर बना दिया । इसने एक टीले का रूप ले लिया, उसी टीले से मां का मठ बाहर से दिखने लगा तो इस मंदिर की मान्यता बढ़ती गई। समय के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार भी होता गया।
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मनौती पूरी होने पर भक्त घंटा चढ़ाकर करते हैं भंडारा
देवी मां के मंदिर की सदियों से सेवा करते आ रहे नगर के माली परिवार के सेवादार शिवसहाय ने बताया कि यहां मेला कब से लग रहा है इसकी सही जानकारी उनके पुरखों को भी नही थी। यहां मांगी गई भक्तों की हर मुराद पूरी होती है। इसके बाद भक्त यहां घंटा चढ़ाकर भंडारा कराते है।
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मां काली, लक्ष्मी तथा सरस्वती के स्वरूप में हैं मूर्ति
मठ से निकली देवी मां की प्रतिमा को देखने से ही सिद्धपीठ का आभास होता है। प्रतिमा में तीन देवियों का प्रतिरूप बड़े आकार में है जो शक्ति का स्वरूप मां काली, धन की देवी मां लक्ष्मी एवं ज्ञान की देवी मां सरस्वती के स्वरूप हैं। इसके अतिरिक्त तीनो देवियों की प्रतिमा में कई छोटे छोटे स्वरूप भी हैं जो देखने में तो अलग लगते हैं मगर कोई भी भक्त आज तक उनकी सही गिनती नही कर पाया है। हर बार गिनने में संख्या भिन्न ही आती है। संवाद