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तट पर गंदगी... गंगा मैली करने के सारे इंतजाम
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ककोड़ा में गंगा तट पर फैली गंदगी। संवाद
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। कार्तिक पूर्णिमा के मुख्य गंगा स्नान और इसके बाद शनिवार को प्रतिपदा पर स्नान के बाद अधिकांश श्रद्धालु अपने घरों को लौट गए। देवोत्थान एकादशी से जिस तरह गंगा तट पर दुकानदारों और कल्पवास करने वाले परिवार और साधु-संत गंगा तट पर डेरा जमाए थे। मेला छंटने के साथ ककोड़ा गंगा तट पर गंदगी का अंबार नजर आने लगा है।
मेला स्थल से लेकर गंगा तट तक प्लास्टिक, पॉलिथीन, गंदगी और कचरा से पटा हुआ है। सफाई के नाम पर पंचायती राज विभाग के कर्मचारी गंदगी, कचहरा, प्लास्टिक और पॉलीथिन को गड्ढों में दबा रहे हैं। मिनी कुंभ में इस बार पॉलिथीन के साथ प्लास्टिक का काफी इस्तेमाल हुआ। बोतल बंद के साथ पैकिंग के पानी की बिक्री भी खूब हुई। दुकानदारों या मेलार्थियों पर पॉलिथीन के इस्तेमाल को ले लेकर कोई रोक-टोक का असर अब मेला स्थल से लेकर गंगा घाट तक दिख रहा है। गंगा तट पर जगह-जगह गंदगी, कचरा, प्लास्टिक और पॉलिथीन के ढेर लगे हुए हैं।
मेला ककोड़ा में 14 नवंबर को देवोत्थान एकादशी से मेलार्थी पहुंच रहे थे। हजारों की संख्या में परिवारों ने यहां कई दिन तक कल्पवास किया। हजारों की संख्या में दुकानदार भी पहुंचे। 19 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के मुख्य स्नान के दौरान गंगा तट पर पांच लाख से ज्यादा श्रद्धालु जुटे थे। इसका असर मेला वापसी के साथ गंदगी के रूप में गंगा तट पर दिख रहा है।
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हजारों लोगों को रोजगार देता है मिनी कुंभ
बदायूं। गंगा के बदायूं और कासगंज के तटवर्ती सैकड़ों गांवों के हजारों ग्रामीणों को सल भर मिनी कुंभ का इंतजार रहता है। दरअसल, मिनी कुंभ से ग्रामीणों को यहां कई दिन तक रोजगार मिलता है। गांव देहात में बिगने वाले कई ऐसे सामान होते हैं जो शहरों की बड़े बाजारों में नहीं मिलते।
मिनी कुंभ में कच्ची सड़कें बनाने के लिए बड़ी मात्रा में सूखी हुई पतेल और सिरकी की जरूरत होती है। गंगा की कटरी से ग्रामीण मेला आयोजन से पहले काफी तादाद में पतेल और सिरकी कटरी से एकत्र कर लेते हैं। इसकी काफी बिक्री होती हे। जिला पंचायत भी यह खरीदती है। इसके अलावा मिट्टी के चूल्हे, लकड़ी की छोटी-बड़ी मथानी, लकड़ी के सामान, घरेलू और कृषि उपयोग में आने वाले लोहे के सामान की दुकानें भी यहां बहुतायत में लगती हैं। करीब 15 दिन चलने वाला मिनी कुंभ ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को रफ्तार देता है। एक अनुमान के अनुसार इस बार मिनी कुंभ में छोटे-बड़े 18 हजार से ज्यादा दुकानदार पहुंचे थे। आस-पास के गांवों के ग्रामीणों ने भी जरूरत के हिसाब से दुकानें लगाई हैं। अधिकारिक रूप से मेला 26 नवंबर तक चलेगा। हालांकि, सरकारी कार्यालय यहां से बोरिया बिस्तरा समेटने लगे हैं।
श्रद्धालुओं की वापसी के साथ तेज हुई खरीदारी
मिनी कुंभ मेला ककोड़ा में रविवार से श्रद्धालुओं की वापसी तेज हो गई है। रविवार को काफी संख्या में परिवार मेले से खट्टी-मीठी यादें लेकर अपने घरों के लिए कूच कर गए। मेलार्थियों के वापसी के साथ ही मेले में खरीदारी ने रफ्तार पकड़ी है। हालांकि, 19 नवंबर को मुख्य गंगास्नान के दिन जब मेला में पांच लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी थी उस दिन भी यहां काफी खरीदारी हुई थी, लेकिन अब मेला में इतनी भीड़ नहीं है। ऐसे में घर वापसी से पहले मेलार्थी अपनी सहूलियत के अनुसार खरीदारी कर रहे हैं।
बांस मंडी में किसानों को भा रहीं लाठियां
मिनी कुंभ मेला ककोड़ा की बांस मंडी में ग्रामीणों और किसानों को लाठियां अपनी ओर रिझा रही हैं। बांस मंडी में रविवार को लाठियों की दुकानों पर किसानों और ग्रामीणों ने खूब खरीदारी की। दरअसल, अब परिवारों को यहां से वापस होना है। हजारों की संख्या में ग्रामीण परिवार ऐसे होते हैं जो इस तरह की चीजों की खरीदारी के लिए मिली कुंभ का इंतजार करते हैं। पिछले वर्ष मिनी कुंभ का आयोजन नहीं हो सका था। इस कारण भी इस बार पिछले वर्ष की तुलना में ज्यादा बिक्री हो रही है।
संदूक और जानवर सजाने का सामान भी खूब बिका
-मेला ककोड़ा में मुख्य स्नान के दिन जिन दुकानों पर रौनक नहीं रही थी वहां भी अब रौनक दिख रही है। मेला में बक्सों से लेकर कपड़े और जानवरों के सजाने का सामान भी खूब बिक रहा है। हालांकि, इस बार मे पशु नखासा का आयोजन नहीं किया गया। बदायूं समेत कासगंज जिलों के पशु पालक यहां बड़े पैमाने पर पशुओं की खरीद-फरोख्त करते हैं। इस बार पशु नखासा न लगने के बाद भी मेला में पशुओं के सजाने का सामान खूब बिक रहा है।
महिलाओं की पसंद बनी ढोलक
मिनी कुंभ में काफी संख्या में ढोलकों की दुकानें भी लगी हैं। रविवार को काफी संख्या में महिलाओं ने ढोलकों की खरीद की। मेला से बैलगाड़ी से लौट रहे ग्रामीण परिवारों की महिलाएं बैलगाड़ी में ढोलक बजाने के साथ लोकगीत गाते हुए घरों को वापसी कर रही हैं। महिलाओं ने सौंदर्य प्रसाधनों की भी खरीद की। सोमवार को भी मेला में खेल-तमाशों के साथ झूलों और सर्कस में भीड़ रही।
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मेला स्थल से लेकर गंगा तट तक प्लास्टिक, पॉलिथीन, गंदगी और कचरा से पटा हुआ है। सफाई के नाम पर पंचायती राज विभाग के कर्मचारी गंदगी, कचहरा, प्लास्टिक और पॉलीथिन को गड्ढों में दबा रहे हैं। मिनी कुंभ में इस बार पॉलिथीन के साथ प्लास्टिक का काफी इस्तेमाल हुआ। बोतल बंद के साथ पैकिंग के पानी की बिक्री भी खूब हुई। दुकानदारों या मेलार्थियों पर पॉलिथीन के इस्तेमाल को ले लेकर कोई रोक-टोक का असर अब मेला स्थल से लेकर गंगा घाट तक दिख रहा है। गंगा तट पर जगह-जगह गंदगी, कचरा, प्लास्टिक और पॉलिथीन के ढेर लगे हुए हैं।
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मेला ककोड़ा में 14 नवंबर को देवोत्थान एकादशी से मेलार्थी पहुंच रहे थे। हजारों की संख्या में परिवारों ने यहां कई दिन तक कल्पवास किया। हजारों की संख्या में दुकानदार भी पहुंचे। 19 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के मुख्य स्नान के दौरान गंगा तट पर पांच लाख से ज्यादा श्रद्धालु जुटे थे। इसका असर मेला वापसी के साथ गंदगी के रूप में गंगा तट पर दिख रहा है।
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हजारों लोगों को रोजगार देता है मिनी कुंभ
बदायूं। गंगा के बदायूं और कासगंज के तटवर्ती सैकड़ों गांवों के हजारों ग्रामीणों को सल भर मिनी कुंभ का इंतजार रहता है। दरअसल, मिनी कुंभ से ग्रामीणों को यहां कई दिन तक रोजगार मिलता है। गांव देहात में बिगने वाले कई ऐसे सामान होते हैं जो शहरों की बड़े बाजारों में नहीं मिलते।
मिनी कुंभ में कच्ची सड़कें बनाने के लिए बड़ी मात्रा में सूखी हुई पतेल और सिरकी की जरूरत होती है। गंगा की कटरी से ग्रामीण मेला आयोजन से पहले काफी तादाद में पतेल और सिरकी कटरी से एकत्र कर लेते हैं। इसकी काफी बिक्री होती हे। जिला पंचायत भी यह खरीदती है। इसके अलावा मिट्टी के चूल्हे, लकड़ी की छोटी-बड़ी मथानी, लकड़ी के सामान, घरेलू और कृषि उपयोग में आने वाले लोहे के सामान की दुकानें भी यहां बहुतायत में लगती हैं। करीब 15 दिन चलने वाला मिनी कुंभ ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को रफ्तार देता है। एक अनुमान के अनुसार इस बार मिनी कुंभ में छोटे-बड़े 18 हजार से ज्यादा दुकानदार पहुंचे थे। आस-पास के गांवों के ग्रामीणों ने भी जरूरत के हिसाब से दुकानें लगाई हैं। अधिकारिक रूप से मेला 26 नवंबर तक चलेगा। हालांकि, सरकारी कार्यालय यहां से बोरिया बिस्तरा समेटने लगे हैं।
श्रद्धालुओं की वापसी के साथ तेज हुई खरीदारी
मिनी कुंभ मेला ककोड़ा में रविवार से श्रद्धालुओं की वापसी तेज हो गई है। रविवार को काफी संख्या में परिवार मेले से खट्टी-मीठी यादें लेकर अपने घरों के लिए कूच कर गए। मेलार्थियों के वापसी के साथ ही मेले में खरीदारी ने रफ्तार पकड़ी है। हालांकि, 19 नवंबर को मुख्य गंगास्नान के दिन जब मेला में पांच लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी थी उस दिन भी यहां काफी खरीदारी हुई थी, लेकिन अब मेला में इतनी भीड़ नहीं है। ऐसे में घर वापसी से पहले मेलार्थी अपनी सहूलियत के अनुसार खरीदारी कर रहे हैं।
बांस मंडी में किसानों को भा रहीं लाठियां
मिनी कुंभ मेला ककोड़ा की बांस मंडी में ग्रामीणों और किसानों को लाठियां अपनी ओर रिझा रही हैं। बांस मंडी में रविवार को लाठियों की दुकानों पर किसानों और ग्रामीणों ने खूब खरीदारी की। दरअसल, अब परिवारों को यहां से वापस होना है। हजारों की संख्या में ग्रामीण परिवार ऐसे होते हैं जो इस तरह की चीजों की खरीदारी के लिए मिली कुंभ का इंतजार करते हैं। पिछले वर्ष मिनी कुंभ का आयोजन नहीं हो सका था। इस कारण भी इस बार पिछले वर्ष की तुलना में ज्यादा बिक्री हो रही है।
संदूक और जानवर सजाने का सामान भी खूब बिका
-मेला ककोड़ा में मुख्य स्नान के दिन जिन दुकानों पर रौनक नहीं रही थी वहां भी अब रौनक दिख रही है। मेला में बक्सों से लेकर कपड़े और जानवरों के सजाने का सामान भी खूब बिक रहा है। हालांकि, इस बार मे पशु नखासा का आयोजन नहीं किया गया। बदायूं समेत कासगंज जिलों के पशु पालक यहां बड़े पैमाने पर पशुओं की खरीद-फरोख्त करते हैं। इस बार पशु नखासा न लगने के बाद भी मेला में पशुओं के सजाने का सामान खूब बिक रहा है।
महिलाओं की पसंद बनी ढोलक
मिनी कुंभ में काफी संख्या में ढोलकों की दुकानें भी लगी हैं। रविवार को काफी संख्या में महिलाओं ने ढोलकों की खरीद की। मेला से बैलगाड़ी से लौट रहे ग्रामीण परिवारों की महिलाएं बैलगाड़ी में ढोलक बजाने के साथ लोकगीत गाते हुए घरों को वापसी कर रही हैं। महिलाओं ने सौंदर्य प्रसाधनों की भी खरीद की। सोमवार को भी मेला में खेल-तमाशों के साथ झूलों और सर्कस में भीड़ रही।