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बहुचर्चित दोहरे हत्याकांडे के भगौड़ा मुजरिम को उम्रकैद

Fri, 24 Aug 2018 12:00 AM IST
Updated Fri, 24 Aug 2018 12:00 AM IST
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बहुचर्चित दोहरे हत्याकांडे के भगौड़ा मुजरिम को उम्रकैद
बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड के भगोड़े मुजरिम को उम्रकैद
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दस लाख 15 हजार का जुर्माना भी डाला
साढ़े तेरह साल पहले म्याऊं ब्लाक परिसर में कर दी थी दलित चचेरे-तहेरे भाइयों की हत्या
इस मामले में पूर्व ब्लॉक प्रमुख पिता समेत दो मुजरिमों को कोर्ट से हो चुकी है फांसी की सजा
अमर उजाला ब्यूरो
बदायूं। साढ़े तेरह साल पहले सहकारी समिति म्याऊं ब्लाक परिसर में चुनाव के नामांकन के दौरान हुए खूनी संघर्ष में दलित दो चचेरे-तहेरे भाइयों की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में मुजरिम विकास भारद्वाज को दोषी ठहराते हुए स्पेशल जज एससी एसटी एक्ट-अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय अशोक कुमार सप्तम ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। मुजरिम पर दस लाख 15 हजार का आर्थिक जुर्माना भी डाला है। जुर्माने की राशि में चार-चार लाख रुपये दोनों मृतकों के परिजनों को देने का आदेश दिया है।
यह बहुचर्चित दोहरा हत्याकांड आठ जनवरी 2005 को हुआ था। थाना अलापुर के अंतर्गत ब्लाक म्याऊं परिसर में इस दिन सहकारी समिति के संचालक पद के चुनाव के लिए नामांकन की प्रक्रिया चल रही थी। इस मुकदमे के वादी माधवराम अपने गांव के प्यारेलाल का नामांकन कराने को गए थे। वहां पर ब्लाक प्रमुख पातांजलि भारद्वाज बैठे थे। उन्होंने नामांकन पत्र देने से साफ इंकार कर दिया। इस पर प्यारेलाल ने अपना पिछड़ी जाति का प्रमाणपत्र दिया। इस पर ब्लाक प्रमुख ने माधवराम को जातिसूचक शब्दों से गालियां दीं और मार पीटकर ब्लाक परिसर से बाहर निकाल दिया। इसकी शिकायत पुलिस से की गई। इसका पता लगने पर माधवराम का भतीजा अशोक और बेटा अरवेंद्र ब्लाक परिसर जा पहुंचे। तभी ब्लाक प्रमुख पक्ष के लोगों ने गोलियां बरसा दीं। इसमें गोली लगने से अरवेंद्र की मौके पर ही मौत हो गई थी। जबकि गोली लगने से घायल हुए अशोक ने इलाज के दौरान दम तोड़ा था।
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इस दोहरे हत्याकांड में ब्लाक प्रमुख पातांजलि भारद्वाज, उनके बेटे विकास भारद्वाज, राहुल उर्फ मोनू और वरुण उर्फ चीनू, भाई वशिष्ठ भारद्वाज को नामजद किया था। इसमें नौ दिसंबर 2014 को इसी न्यायालय ने मुजरिम पातांजलि भारद्वाज, वरिष्ठ भारद्वाज को फांसी की सजा सुनाई थी। पातांजलि के बेटे राहुल उर्फ मोनू और वरुण उर्फ चीनू को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। उन्होंने हाईकोर्ट में अपील कर रखी है, जो लंबित है। उधर, सजा सुनाए जाने से से पहले विकास भारद्वाज फरार हो गया था। तब कोर्ट ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया था। इस पर उसकी फाइल अलग हो गई थी। चार मुजरिमों को सजा दिलाने में अभियोजन की पैरवी एडीजीसी रईस अहमद ने की थी। मगर भगोड़ा घोषित होने के बाद विकास भारद्वाज खुद ही कोर्ट में हाजिर हो गया। स्पेशल जज अशोक कुमार सप्तम ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों का अवलोकन किया। अभियोजन की ओर से एडीजीसी रईस अहमद और बचाव पक्ष के अधिवक्ता की दलीलों को सुनने के बाद मुजरिम विकास भारद्वाज को दोषी ठहराते हुए कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। मुजरिम पर दस लाख 15 हजार का आर्थिक दंड भी डाला है।
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