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गांधी आश्रम की स्थिति लगातार होती जा रही है डांवाडोल
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छह सड़का पर श्री गांधी आश्रम का केंद्र। संवाद
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। जिले में गांधी आश्रम की हालात पहले से डांवाडोल थी, सात साल से यह और खराब हो गई है। अब केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से यहां कोई छूट नहीं मिलती, सिर्फ केंद्र से ही 10 से 20 फीसदी छूट मिलती है। ऐसे में यहां जो उत्पाद उपलब्ध हैं उन्हें लेने पहले के मुकाबले कम संख्या में खरीदार पहुंचते हैं।
श्री गांधी आश्रम संस्था की करीब दर्जन भर दुकानें संचालित हैं। इनमें से दो शहर में हैं। एक मुख्य स्टोर छह सड़का के पास तो दूसरा नाहर खां सराय में हैं। बाकी दुकानें तहसील मुख्यालयों और बड़े कस्बों में हैं। किसी जमाने में अग्रणी संस्था रही गांधी आश्रम की स्थिति लगातार दयनीय होती जा रही है। यहां मुख्य स्टोर की हालत देखकर सहजता से इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है। स्टोर पर कहने को लिहाफ, तकिया, गद्दे, कवर, चादर, कंबल जैसे उत्पाद मौजूद हैं पर गिनती के ही खरीदार यहां खरीदारी के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा च्यवनप्राश, तेल, लोशन जैसे उत्पाद भी यहां हैं पर खुले बाजार में इस श्रेणी के उत्पादों से इनकी कीमत कहीं ज्यादा है। ऐसे में इनकी बिक्री भी नाममात्र की होती है।
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तेरह सौ का लिहाफ कवर, ढाई सौ का तकिया
गांधी आश्रम के उत्पाद भले ही खादी या मजबूत कपड़े के हों पर उनकी कीमत सुनकर ही तमाम लोग लौट जाते हैं। यहां अच्छी क्वालिटी के लिहाफ कवर की कीमत तेरह सौ रुपये है जो बीस फीसदी कम होने के बाद भी करीब हजार रुपये होती है। इसके मुकाबले में यही लिहाफ कवर बाजार में पांच सौ रुपये में आराम से मिल जाता है। इसके अलावा यहां तकिया भी ढाई सौ रुपये का है जो छूट के बाद 230 का बैठता है। जबकि इसके मुकाबले बाजार में यही तकिया काफी सस्ता मिल जाता है।
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अब उत्पादों पर कम हो गई छूट
गांधी आश्रम के मुख्य स्टोर के प्रभारी अफसर अली ने बताया कि पहले केंद्र सरकार की ओर से 20 फीसदी और राज्य सरकार की ओर से 10 फीसदी छूट दी जाती थी। इस तरह ग्राहकों को उत्पाद की मूल कीमत पर तीस फीसदी या उससे ज्यादा छूट मिल जाती थी। वर्ष 2014 से यह छूट मिलना बंद हो गई। तब से सिर्फ संस्था के मेरठ व लखनऊ मुख्यालय से ही छूट मिलती है जो दस से अधिकतम बीस फीसदी मिल पाती है। बताते हैं कि कई बार ग्राहक सामान की कीमत कम करने पर अड़ जाते हैं पर उन्हें पक्का बिल देकर समझाते हैं कि यहां इससे कम छूट दे पाना संभव नहीं है।
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सात साल में दस लाख कम हुआ टर्नओवर
छड़ सड़का स्थित दुकान के प्रभारी अफसर अली के मुताबिक इस समय टर्नओवर 22 लाख रुपये के करीब है जो सात साल पहले तक 32 लाख से ज्यादा था।
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कर्मचारियों को नहीं मिलता समय से वेतन
रामपुर निवासी केंद्र प्रभारी अफसर अली और नाहर खां सराय के जौनपुर निवासी कर्मचारी केशव राम पांडेय बताते हैं कि संस्था ही किसी तरह कर्मचारियों का वेतन वहन कर रही है, अन्य कोई अनुदान नहीं मिलता। अल्प वेतन पर इस आस में बरसों से काम कर रहे हैं कि बुढ़ापे में फंड और पेंशन से काम चल जाएगा पर स्थिति अब उतनी अच्छी नहीं रही। अक्तूबर से मार्च तक सामान की बिक्री ठीक होती है तो वेतन मिलता रहता है। बाकी महीनों में वेतन समय से मिलने की कोई गारंटी नहीं रहती।
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पानीपत की फैक्टरी में सूत कात रहे रमजानपुर के कारीगर
गांधी आश्रम की ओर से पहले रमजानपुर समेत कई गांवों में तमाम कारीगरों को रुई उपलब्ध कराई जाती थी। कारीगर इससे सूत कातते थे और उसे गांधी आश्रम को ही बेचा करते थे। कई बार यही कारीगर चादर और कंबल भी बुनते थे। वक्त के साथ बदली नीतियों की वजह से यह काम करीब दस साल से बंद है। ऐसे में रमजानपुर के अधिकतर लोगों ने अब ठेकेदार के अधीन कालीन और जरी का काम पकड़ लिया है। वहीं कमरुद्दीन अंसारी समेत कुछ परिवारों ने शहर ही बदल लिया है। वह पानीपत में फैक्टरी के लिए काम कर रहे हैं।
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क्या कहते हैं रमजानपुर के पुराने कारीगर
गांधी आश्रम की ओर से अब सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं। कच्चे माल की कीमत के बाद तैयार धागे का मूल्य सही नहीं मिलने से काम बंद कर दिया है।
- जहीरुल हसन अंसारी
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मशीनीकरण होने से चर्खे से सूत काटना बंद हो गया है। उचित कमाई नहीं हो पा रही। सरकारों की ओर से कारीगरों को कोई अनुदान नहीं दिया जा रहा।
- अब्दुल बाबर
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चर्खा कारीगरों को अनुदान नहीं मिल रहा। कच्चा माल महंगा हो गया है। अब फैशन के दौर में सूत का कपड़ा कम ही लोग पहनते हैं। ऐसे में स्थिति खराब है।
- दिलशाद
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महंगाई के कारण मजदूरी भी नहीं निकलती है। एक दशक पहले तक लकड़ी का चर्खा गांव के कई घरों में पूरे दम से चलता था लेकिन मशीनीकरण के युग ने सब खत्म हो गया है। घरों में कपड़े बुनना भी बंद हो गया है।
- समीउद्दीन
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श्री गांधी आश्रम संस्था की करीब दर्जन भर दुकानें संचालित हैं। इनमें से दो शहर में हैं। एक मुख्य स्टोर छह सड़का के पास तो दूसरा नाहर खां सराय में हैं। बाकी दुकानें तहसील मुख्यालयों और बड़े कस्बों में हैं। किसी जमाने में अग्रणी संस्था रही गांधी आश्रम की स्थिति लगातार दयनीय होती जा रही है। यहां मुख्य स्टोर की हालत देखकर सहजता से इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है। स्टोर पर कहने को लिहाफ, तकिया, गद्दे, कवर, चादर, कंबल जैसे उत्पाद मौजूद हैं पर गिनती के ही खरीदार यहां खरीदारी के लिए पहुंचते हैं। इसके अलावा च्यवनप्राश, तेल, लोशन जैसे उत्पाद भी यहां हैं पर खुले बाजार में इस श्रेणी के उत्पादों से इनकी कीमत कहीं ज्यादा है। ऐसे में इनकी बिक्री भी नाममात्र की होती है।
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तेरह सौ का लिहाफ कवर, ढाई सौ का तकिया
गांधी आश्रम के उत्पाद भले ही खादी या मजबूत कपड़े के हों पर उनकी कीमत सुनकर ही तमाम लोग लौट जाते हैं। यहां अच्छी क्वालिटी के लिहाफ कवर की कीमत तेरह सौ रुपये है जो बीस फीसदी कम होने के बाद भी करीब हजार रुपये होती है। इसके मुकाबले में यही लिहाफ कवर बाजार में पांच सौ रुपये में आराम से मिल जाता है। इसके अलावा यहां तकिया भी ढाई सौ रुपये का है जो छूट के बाद 230 का बैठता है। जबकि इसके मुकाबले बाजार में यही तकिया काफी सस्ता मिल जाता है।
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अब उत्पादों पर कम हो गई छूट
गांधी आश्रम के मुख्य स्टोर के प्रभारी अफसर अली ने बताया कि पहले केंद्र सरकार की ओर से 20 फीसदी और राज्य सरकार की ओर से 10 फीसदी छूट दी जाती थी। इस तरह ग्राहकों को उत्पाद की मूल कीमत पर तीस फीसदी या उससे ज्यादा छूट मिल जाती थी। वर्ष 2014 से यह छूट मिलना बंद हो गई। तब से सिर्फ संस्था के मेरठ व लखनऊ मुख्यालय से ही छूट मिलती है जो दस से अधिकतम बीस फीसदी मिल पाती है। बताते हैं कि कई बार ग्राहक सामान की कीमत कम करने पर अड़ जाते हैं पर उन्हें पक्का बिल देकर समझाते हैं कि यहां इससे कम छूट दे पाना संभव नहीं है।
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सात साल में दस लाख कम हुआ टर्नओवर
छड़ सड़का स्थित दुकान के प्रभारी अफसर अली के मुताबिक इस समय टर्नओवर 22 लाख रुपये के करीब है जो सात साल पहले तक 32 लाख से ज्यादा था।
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कर्मचारियों को नहीं मिलता समय से वेतन
रामपुर निवासी केंद्र प्रभारी अफसर अली और नाहर खां सराय के जौनपुर निवासी कर्मचारी केशव राम पांडेय बताते हैं कि संस्था ही किसी तरह कर्मचारियों का वेतन वहन कर रही है, अन्य कोई अनुदान नहीं मिलता। अल्प वेतन पर इस आस में बरसों से काम कर रहे हैं कि बुढ़ापे में फंड और पेंशन से काम चल जाएगा पर स्थिति अब उतनी अच्छी नहीं रही। अक्तूबर से मार्च तक सामान की बिक्री ठीक होती है तो वेतन मिलता रहता है। बाकी महीनों में वेतन समय से मिलने की कोई गारंटी नहीं रहती।
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पानीपत की फैक्टरी में सूत कात रहे रमजानपुर के कारीगर
गांधी आश्रम की ओर से पहले रमजानपुर समेत कई गांवों में तमाम कारीगरों को रुई उपलब्ध कराई जाती थी। कारीगर इससे सूत कातते थे और उसे गांधी आश्रम को ही बेचा करते थे। कई बार यही कारीगर चादर और कंबल भी बुनते थे। वक्त के साथ बदली नीतियों की वजह से यह काम करीब दस साल से बंद है। ऐसे में रमजानपुर के अधिकतर लोगों ने अब ठेकेदार के अधीन कालीन और जरी का काम पकड़ लिया है। वहीं कमरुद्दीन अंसारी समेत कुछ परिवारों ने शहर ही बदल लिया है। वह पानीपत में फैक्टरी के लिए काम कर रहे हैं।
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क्या कहते हैं रमजानपुर के पुराने कारीगर
गांधी आश्रम की ओर से अब सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं। कच्चे माल की कीमत के बाद तैयार धागे का मूल्य सही नहीं मिलने से काम बंद कर दिया है।
- जहीरुल हसन अंसारी
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मशीनीकरण होने से चर्खे से सूत काटना बंद हो गया है। उचित कमाई नहीं हो पा रही। सरकारों की ओर से कारीगरों को कोई अनुदान नहीं दिया जा रहा।
- अब्दुल बाबर
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चर्खा कारीगरों को अनुदान नहीं मिल रहा। कच्चा माल महंगा हो गया है। अब फैशन के दौर में सूत का कपड़ा कम ही लोग पहनते हैं। ऐसे में स्थिति खराब है।
- दिलशाद
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महंगाई के कारण मजदूरी भी नहीं निकलती है। एक दशक पहले तक लकड़ी का चर्खा गांव के कई घरों में पूरे दम से चलता था लेकिन मशीनीकरण के युग ने सब खत्म हो गया है। घरों में कपड़े बुनना भी बंद हो गया है।
- समीउद्दीन