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कुंवर रुकुम सिंह ने जलाई थी क्रांति की मशाल
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कुंवर रुकुम सिंह राठौर फाइल फोटो स्केच। संवाद
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। स्वतंत्रता की खातिर बदायूं के क्रांतिकारियों ने जान की परवाह न करते हुए अंग्रेजी शासन के खिलाफ मोर्चा खोला था। बदायूं के क्रांतिकारियों में कुंवर रुकुम सिंह का नाम प्रमुख है। नगला शर्की के जमींदार परिवार में जन्मे रुकुम सिंह ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों की लाठियां खाईं और जेल भी गए। आजादी के बाद उन्होंने क्षेत्र में शिक्षा के प्रचार प्रसार का काम किया और शिक्षण संस्थान खोले। वह विधायक भी चुने गए।
बदायूं सूचना विभाग की पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक’ और इतिहासकार गिरिराज नंदन की पुस्तक ‘अतीत और वर्तमान के आइने में बदायूं दर्शन, में बदायूं के क्रांतिकारियों के किस्से भरे पड़े हैं। इनमें जिक्र है कि कुंवर रुकुम सिंह शहर के नजदीक बसे गांव नगला शर्की के जमींदार केहरी सिंह के पुत्र थे। बचपन से ही वह क्रांतिकारी विचारधारा के थे। वर्ष 1920-21 में बापू के असहयोग आंदोलन के लिए उन्होंने आनरेरी मुंसिफ मजिस्ट्रेट का पद छोड़ दिया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण 1921 में अंग्रेजों ने उनको जेल भेज दिया। वर्ष 1930 में नमक आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके बाद फिर जेल जाना पड़ा। कुछ समय के लिए वह देवासराज चले गए। वहां उन्होंने महाराज के सलाहाकार के रूप में काम किया।
1939 में अंग्रेज कलेक्टर के आदेश के विरोध में कुंवर रुकुम सिंह के नेतृत्व में पूरा नगला गांव दो मील दूर जंगल में जाकर रहने लगा। बाद में यह आदेश वापस हुआ तो ग्रामीण घरों को लौट आए। 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान उनको फिर जेल में डाल दिया गया। इसके बाद 1942 में वह काफी समय तक नजरबंद रहे। वर्ष 1937 में वह उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। 1962 से 1967 तक फिर से वह विधानसभा सदस्य चुने गए। उन्होंने आजादी के बाद शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण काम किए। वैदिक जूनियर हाईस्कूल की स्थापना की जिसे उनके स्वर्गवास के बाद कुंवर रुकुम सिंह वैदिक इंटर कॉलेज नाम दे दिया गया। साथ ही दूसरे विद्यालय को उनकी बेटी के नाम पर विद्यावती देवी इंटर कॉलेज का नाम दिया गया। ग्रामीण क्षेत्र के सैकड़ों बच्चे इन संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
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पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को बसाया
पंद्रह अगस्त 1947 की आधी रात में जब भारत आजाद हो रहा था। बदायूं से गुजर रही ट्रेन जब नगला गांव के पास रुकी तो हरवंश लाल मलिक के नेतृत्व में कई ऐसे लोग उतरे जो पाकिस्तान से जान बचाकर आए थे। उन्होंने ग्रामीणों से पूछा कि यहां आजादी का दीवाना कौन है। तब ग्रामीण उन्हें कुंवर रुकुम सिंह के पास ले गए। उन्होंने न केवल इन लोगों को शरण दी बल्कि उनके खाने, पहनने के कपड़ों से लेकर तमाम जरूरतें अतिथि की तरह पूरी कीं। बाद में अपने विद्यालय की प्रबंध समिति का स्थायी सदस्य बनाया। नरोत्तम दत्त पांडेय, रामसहाय यादव जैसे कई नाम हैं जो कुंवर साहब के संपर्क में आए, उन्हें नौकरी व सम्मान देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया। ऐसे परिवारों की नई पीढ़ियां भी विद्यालयों से आज तक जुड़ी हैं।
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पिता और ग्रामीणों ने बताया कि हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों से मोर्चा लेने में कसर नहीं छोड़ी। नमक कानून का विरोध हो या असहयोग आंदोलन, ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का पद छोड़कर कुंवर रुकुम सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। देश की आजादी के बाद उन्होंने पिछड़े इलाके में शिक्षा से चेतना जागृत करने का काम किया। ऐसे परिवार का हिस्सा होने पर गर्व होता है।
- कुंवर शिवराज सिंह राठौर, कुंवर रुकुम सिंह के प्रपौत्र
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मैं भाग्यशाली हूं जो माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड से चयनित होने के बाद मुझे कुंवर साहब के नाम पर बने विद्यालय में लंबी सेवा का अवसर मिला। उनके परिवार को देखा समझा और स्कूल से जुड़े रिकार्ड देखे तो पता लगा कि क्रांतिकारी का पूरा परिवार ही देश व समाज को समर्पित है। विद्यालय शासन से वित्तपोषित है और कम शुल्क में ग्रामीण अंचल के बच्चे यहां शिक्षा पाते हैं। कुंवर साहब के दो बेटे भी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहे थे।
- डॉ. विष्णु प्रकाश मिश्रा, पूर्व प्रधानाचार्य, कुंवर रुकुम सिंह इंटर कॉलेज
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बदायूं सूचना विभाग की पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक’ और इतिहासकार गिरिराज नंदन की पुस्तक ‘अतीत और वर्तमान के आइने में बदायूं दर्शन, में बदायूं के क्रांतिकारियों के किस्से भरे पड़े हैं। इनमें जिक्र है कि कुंवर रुकुम सिंह शहर के नजदीक बसे गांव नगला शर्की के जमींदार केहरी सिंह के पुत्र थे। बचपन से ही वह क्रांतिकारी विचारधारा के थे। वर्ष 1920-21 में बापू के असहयोग आंदोलन के लिए उन्होंने आनरेरी मुंसिफ मजिस्ट्रेट का पद छोड़ दिया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण 1921 में अंग्रेजों ने उनको जेल भेज दिया। वर्ष 1930 में नमक आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके बाद फिर जेल जाना पड़ा। कुछ समय के लिए वह देवासराज चले गए। वहां उन्होंने महाराज के सलाहाकार के रूप में काम किया।
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1939 में अंग्रेज कलेक्टर के आदेश के विरोध में कुंवर रुकुम सिंह के नेतृत्व में पूरा नगला गांव दो मील दूर जंगल में जाकर रहने लगा। बाद में यह आदेश वापस हुआ तो ग्रामीण घरों को लौट आए। 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान उनको फिर जेल में डाल दिया गया। इसके बाद 1942 में वह काफी समय तक नजरबंद रहे। वर्ष 1937 में वह उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। 1962 से 1967 तक फिर से वह विधानसभा सदस्य चुने गए। उन्होंने आजादी के बाद शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण काम किए। वैदिक जूनियर हाईस्कूल की स्थापना की जिसे उनके स्वर्गवास के बाद कुंवर रुकुम सिंह वैदिक इंटर कॉलेज नाम दे दिया गया। साथ ही दूसरे विद्यालय को उनकी बेटी के नाम पर विद्यावती देवी इंटर कॉलेज का नाम दिया गया। ग्रामीण क्षेत्र के सैकड़ों बच्चे इन संस्थाओं में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
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पंद्रह अगस्त 1947 की आधी रात में जब भारत आजाद हो रहा था। बदायूं से गुजर रही ट्रेन जब नगला गांव के पास रुकी तो हरवंश लाल मलिक के नेतृत्व में कई ऐसे लोग उतरे जो पाकिस्तान से जान बचाकर आए थे। उन्होंने ग्रामीणों से पूछा कि यहां आजादी का दीवाना कौन है। तब ग्रामीण उन्हें कुंवर रुकुम सिंह के पास ले गए। उन्होंने न केवल इन लोगों को शरण दी बल्कि उनके खाने, पहनने के कपड़ों से लेकर तमाम जरूरतें अतिथि की तरह पूरी कीं। बाद में अपने विद्यालय की प्रबंध समिति का स्थायी सदस्य बनाया। नरोत्तम दत्त पांडेय, रामसहाय यादव जैसे कई नाम हैं जो कुंवर साहब के संपर्क में आए, उन्हें नौकरी व सम्मान देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया। ऐसे परिवारों की नई पीढ़ियां भी विद्यालयों से आज तक जुड़ी हैं।
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पिता और ग्रामीणों ने बताया कि हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजों से मोर्चा लेने में कसर नहीं छोड़ी। नमक कानून का विरोध हो या असहयोग आंदोलन, ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का पद छोड़कर कुंवर रुकुम सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। देश की आजादी के बाद उन्होंने पिछड़े इलाके में शिक्षा से चेतना जागृत करने का काम किया। ऐसे परिवार का हिस्सा होने पर गर्व होता है।
- कुंवर शिवराज सिंह राठौर, कुंवर रुकुम सिंह के प्रपौत्र
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मैं भाग्यशाली हूं जो माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड से चयनित होने के बाद मुझे कुंवर साहब के नाम पर बने विद्यालय में लंबी सेवा का अवसर मिला। उनके परिवार को देखा समझा और स्कूल से जुड़े रिकार्ड देखे तो पता लगा कि क्रांतिकारी का पूरा परिवार ही देश व समाज को समर्पित है। विद्यालय शासन से वित्तपोषित है और कम शुल्क में ग्रामीण अंचल के बच्चे यहां शिक्षा पाते हैं। कुंवर साहब के दो बेटे भी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहे थे।
- डॉ. विष्णु प्रकाश मिश्रा, पूर्व प्रधानाचार्य, कुंवर रुकुम सिंह इंटर कॉलेज