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Budaun News: पशुओं को भा रहा बीयर बाटा, उत्तराखंड से बढ़ी मांग

Mon, 05 May 2025 01:15 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 05 May 2025 01:15 AM IST
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Animals are liking the beer, demand increased from Uttarakhand
उझानी में बिक्री को अनलोड़ किया गया बीयर बाटा। संवाद
उझानी। फैक्टि्रयों में बीयर बनने के बाद बचे अनाज के अपशिष्ट का पशुओं के सूखे चारा में इस्तेमाल बढ़ गया है। बीयर बाटा नामक अपशिष्ट पहले मुरादाबाद और रामपुर से लाया जा रहा था। फिर शाहजहांपुर जिले की फैक्टरी तो इलाके के विक्रेताओं ने वहां से माल मंगाना शुरू कर दिया। अब उत्तराखंड का बीयर बाटा भी पशुओं को खूब भा रहा है।
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पशुओं को सूखे चारे में जैसे गेहूं और सरसों के भूसे, पुआल और बाजरे की कुटी में बीयर बाटा मिलाकर खिलाने की शुरूआत बदायूं में करीब दो- तीन साल पहले से हुई है। बीयर बाटा पहले उन्हीं इलाकों में ज्यादा बिकता था, जहां आसपास बीयर की फैक्टि्रयां हुआ करती थीं। फैक्टि्रयों की संख्या में वृद्धि के साथ ही बीयर बाटा पड़ोसी राज्य और जिलों से आने लगा। अब पशुपालकों का भी इस ओर रूझान बढ़ गया। दुधारू पशुओं को खिलाने के लिए पशुपालक खासकर गर्मी के दिनों में दो- तीन दिन के अंतर से 10 किलोग्राम तक बीयर बाटा खरीद ले जाते हैं।
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जानकार बताते हैं कि बीयर बनाने में जौ, मक्का, मटर, ज्वार और गेहूं आदि का इस्तेमाल होता है। इसके अपशिष्ट में फाइबर की भी मात्रा कम नहीं होती है। इये दुधारू पशुओं गाय, भैंस और बकरियों के लिए ज्यादा फायदेमंद बताया जाता है। स्थानीय विक्रेता आकाश शर्मा और मुजम्मिल ने बताया कि पशुपालकों को बीयर बाटा छह- सात रुपये प्रति किलोग्राम में घर के पास ही आसानी से मिल जाता है। जबकि सरसों, मूंगफली और अलसी की खली का भाव इससे दो- ढाई गुना प्रति किलोग्राम अधिक है।
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अत्यधिक इस्तेमाल से मादा पशुओं में बांझपन का शोर
बीयर बाटा में गेहूं, ज्वार, मक्का, जौ और मटर आदि का जो अपशिष्ट पाया जाता है, उसमें किस अनाज की कितनी मात्रा है, यह तो विक्रेताओं को भी सही से नहीं पता है। ऐसे में अनाज की मात्रा का असंतुलन मादा पशुओं में बांझपन का खतरा बढ़ा सकता है। बीयर बाटा में अगर फंगस हो जाए तो पशुओं की सेहत भी प्रभावित हो जाती है।

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- ग्रेन वाई प्रोडक्ट में प्रोटीन और फाइबर भरपूर होता है। सूखे चारे में मिलाकर ऐसे मिक्चर को खिलाने से पशुओं को फायदा रहता है। बीयर बनाने में अनाज के मिश्रण के प्रतिशत का तो उन्हें नहीं पता, लेकिन पड़ोसी राज्य पंजाब और हरियाणा के अलावा पश्चिमी यूपी में इसका प्रचलन बढ़ा है।- डॉ. रोशन कुमार सिंह, पशुधन उत्पादन वैज्ञानिक
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