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मौसम का बदला मिजाज प्रभावित कर सकता है धान का उत्पादन

Thu, 07 Oct 2021 01:27 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 07 Oct 2021 01:27 AM IST
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agricultural
उझानी क्षेत्र में बारिश से खेत में बिछी धान की फसल। - फोटो : BADAUN
उझानी (बदायूं)। मौसम का बदला मिजाज बंपर पैदावार की आस लगाए बैठे धान उत्पादकों का हलक सुखाता नजर आ रहा है। कभी तेज हवा के साथ झमाझम बारिश तो किसी दिन रुक-रुककर होने वाली बूंदाबांदी ने फसल में बीमारी और कीट का प्रकोप का खतरा बढ़ा दिया है। मौसम का मिजाज ऐसा ही रहा तो ‘कंडुआ रोग’ धान की बालियों में दाने को नष्ट कर देगा या फिर गंधी कीट उत्पादन का प्रभावित करेगा।
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पिछले महीने जिले में कई स्थानों पर तेज हवा के साथ झमाझम बारिश हुई थी। चूंकि धान की फसल पकने को तैयार है, इसलिए बारिश के दौरान तेज हवा की चपेट में आकर फसल खेत में गिर गई। 30 फीसदी तक फसल जमीन पर बिछ गई। इस दौरान भी कई बार रुक रुक कर बारिश हुई।
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कुबेर सिंह और भागमल चौधरी कहते हैं कि कभी ज्यादा बारिश भी धान के लिए नुकसानदेह साबित होती है। फसल पकने के लिए खेतों में नमी कम होनी चाहिए। बार-बार बूंदाबांदी हो जाती है तो नमी बरकरार रहती है। ऐसे में ही गंधी कीट और कंडुआ रोग फैलता है। पांच साल पहले जिले में कंडुआ की वजह से धान की फसल बुरी तरह प्रभावित हुई थी। सकरी जंगल गांव के शमशाद ने बताया कि उसके खेत में बालियों में कालापन नजर आया है। गंधी कीट का प्रकोप दिखा तो धान का ज्यादा नुकसान होगा। इससे बचाव के लिए कीटनाशक फिलहाल कारगर हो सकता है लेकिन जरूरी है कि उसे कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के बाद ही इस्तेमाल किया जाए।
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लहटा और लाही की बुआई भी प्रभावित
सितंबर के अंत और अक्तूबर के शुरू में खेतों में लहटा की बुआई हो जानी चाहिए। इसके लिए किसानों ने खेतों को तैयार भी कर लिया लेकिन दो-तीन बार बूंदाबांदी ने ऐसा प्रभाव डाला कि एक-दो दिन पहले बुआई हुई, मिट्टी की ऊपरी सतह मजबूत हो गई जो कल्ले निकलने में बाधक दिखी। ऐसे में किसानों को फिर से लहटा की बुआई करनी पड़ रही है। किसानों को आर्थिक रूप से भी नुकसान उठाना पड़ा है।

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फिलहाल धान की फसल को नुकसान नहीं दिख रहा है। जहां तेज हवा और बारिश के दौरान फसल गिर गई है, वहां उत्पादन प्रभावित होगा। कंडुआ और गंधी कीट भी इन्हीं दिनों में प्रकोप दिखाते हैं। अगर कहीं पर कीट का प्रकोप दिखे तो किसान प्रभावित पौधे लाकर सलाह ले सकते हैं।
- डॉ. संजय कुमार, कृषि वैज्ञानिक
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