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ककोड़ा मेले का आज होगा समापन, झंडी पहुंचेगी मंदिर
Updated Sat, 11 Nov 2017 12:33 AM IST
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MELA
- फोटो : demo pic
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कादरचौक। मेले में जिस स्थान पर झंडी को स्थापित किया जाता है, मेले की अवधि के बाद झंडी को फिर ककोड़ देवी मंदिर पर विधिविधान से पहुंचाया जाता है। पुजारी ने बताया कि शनिवार को झंडी मेले से वापस मंदिर लाई जाएगी। इसके साथ ही मेले का समापन मान लिया जाएगा। बता दें कि मिनी कुंभ मेला ककोड़ा की आधिकारिक रूप से पंद्रह दिन की स्वीकृति होती है। मेले में व्यवस्थाओं का हवाला भी पंद्रह दिन का ही दिया जाता है लेकिन जिला पंचायत से लेकर अन्य विभाग तीन से चार दिन की ड्यूटी बजाकर निकल लेते हैं। यही वजह है कि बाकी दिनों में मेले में कोई व्यवस्था पूरी नहीं की जाती है। इस बार तो मेला अवधि से पहले ही कोतवाली भी उखड़ गई। गंगा की कटरी में मेले की सुरक्षा राम भरोसे छोड़ दी गई ।
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कासगंज जिले के रकबे में लगा था मेला
मेले को बदायूं जिला पंचायत लगातार कासगंज की जमीन पर ही लगाती आ रही है। तीन साल से मेला स्थल का क्षेत्र आपराधिक दृष्टि से भी कासगंज चला गया है। बावजूद स्थानीय अमले को वहां के पुलिस प्रशासन का सहयोग नहीं मिलता है। बता दें कि पहले जोरी नगला के पास मेला कई बरस तक लगता रहा है। वहां का क्षेत्र भी बदायूं में ही लगता है। अगर अभी से मेले का स्थान चयनित कर सूचना किसानों को दी जाए तो वे वही फसल खेतों मे लगाएंगे जो मेले से पूर्व ही काट ली जाए। इससे उनका नुकसान भी नहीं होगा। इस बार मेले की समीक्षा बैठक में पटियाली तहसील के एसडीएम भी शामिल नहीं हुए। मेले के लिए रूट डायवर्जन भी नहीं किया गया जो जाम का मुख्य कारण रहा। कासगंज की ओर से आने वाले भारी वाहनों को भी नहीं रोका गया। इसके कारण गंगपुर मोड़ पर पत्थर भरा ट्रक सड़क में धंस गया और पूरे दिन जाम लगा रहा।
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अंग्रेजों के जमाने का चल रहा नक्शा
कादरचौक। मेला ककोड़ा का मानचित्र अंग्रेजों के जमाने वाला ही है। इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। मेले में आधा भाग राजनेता और वीआईपी के लिए आरक्षित कर दिया जाता है। आम जनता को बाईपास बनाकर मेले के बाहर ही रखा जाता है।
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कासगंज जिले के रकबे में लगा था मेला
मेले को बदायूं जिला पंचायत लगातार कासगंज की जमीन पर ही लगाती आ रही है। तीन साल से मेला स्थल का क्षेत्र आपराधिक दृष्टि से भी कासगंज चला गया है। बावजूद स्थानीय अमले को वहां के पुलिस प्रशासन का सहयोग नहीं मिलता है। बता दें कि पहले जोरी नगला के पास मेला कई बरस तक लगता रहा है। वहां का क्षेत्र भी बदायूं में ही लगता है। अगर अभी से मेले का स्थान चयनित कर सूचना किसानों को दी जाए तो वे वही फसल खेतों मे लगाएंगे जो मेले से पूर्व ही काट ली जाए। इससे उनका नुकसान भी नहीं होगा। इस बार मेले की समीक्षा बैठक में पटियाली तहसील के एसडीएम भी शामिल नहीं हुए। मेले के लिए रूट डायवर्जन भी नहीं किया गया जो जाम का मुख्य कारण रहा। कासगंज की ओर से आने वाले भारी वाहनों को भी नहीं रोका गया। इसके कारण गंगपुर मोड़ पर पत्थर भरा ट्रक सड़क में धंस गया और पूरे दिन जाम लगा रहा।
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अंग्रेजों के जमाने का चल रहा नक्शा
कादरचौक। मेला ककोड़ा का मानचित्र अंग्रेजों के जमाने वाला ही है। इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। मेले में आधा भाग राजनेता और वीआईपी के लिए आरक्षित कर दिया जाता है। आम जनता को बाईपास बनाकर मेले के बाहर ही रखा जाता है।
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