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मासूम को इलाज के लिए करना पड़ा दो घंटे इंतजार
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उझानी (बदायूं)। चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर मरीजों को कहां-कहां नहीं भटकना पड़ता, इसका नमूना शनिवार को देखने को मिला। बीमार मासूम बेटे को दवा दिलाने के लिए एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचे दंपती को इमरजेंसी में जब कोई डॉक्टर नहीं मिला तो उसे परिसर में ही करीब दो घंटों तक चक्कर काटने पड़े। वह तो गनीमत रही जो सूचना के बाद दूसरे चिकित्साधिकारी इमरजेंसी में पहुंच गए और उन्होंने मासूम का इलाज किया।
मामला दोपहर में करीब एक बजे का है। मुजरिया क्षेत्र के गांव वितरोई निवासी अंशू तोमर का मासूम बेटा बीमार पड़ गया। उसकी हालत बिगड़ने लगी तो उसने एंबुलेंस बुला ली। पत्नी और मासूम बेटे के साथ अंशू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर पहुंचा तो इमरजेंसी में नर्सिंग स्टॉफ के अलावा डॉक्टर मौजूद नहीं थे। अंशू अस्पताल परिसर में काफी देर तक चक्कर काटता रहा लेकिन किसी भी डॉक्टर ने मासूम की सुध नहीं ली। स्वास्थ्य कर्मियों से उसकी नोकझोंक भी हुई। करीब दो घंटे बाद इसकी भनक चिकित्साधिकारी महेश प्रताप सिंह को लगी तो वह फार्मासिस्ट अमित त्रिपाठी के साथ इमरजेंसी में पहुंचे और मासूम का इलाज शुरू कर दिया। एंबुलेंस चालक रामपाल ने बताया कि इमरजेंसी में पहुंचते ही उसने कॉल भी की लेकिन कोई गौर नहीं किया गया। चिकित्साधिकारी महेश प्रताप सिंह ने बताया कि डॉ. शोयस दीक्षित इमरजेंसी ड्यूटी पर तैनात थे लेकिन विभागीय कार्य से उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कछला जाना पड़ गया था।
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रेफर करने का फंडा अपनाते हैं डॉक्टर
उझानी। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर सुविधाएं तो बहुत होनी चाहिए लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी की वजह से मरीजों को उनका फायदा नहीं मिल पा रहा है। यहां न तो बाल रोग विशेषज्ञ है और न हीं हड्डी रोग का कोई चिकित्सक है। दो महीना पहले हड्डी रोग विशेषज्ञ मतबूल रहमान गैरहाजिर हो गए। स्त्री रोग विशेषज्ञ ने चार्ज लेने के बाद ड्यूटी पर आना ही मुनासिब नहीं समझा। हालत यह है कि एक्सीडेंटल या फिर कोई गंभीर बीमारी से ग्रस्त मरीज आ जाए तो उसे रेफर करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं बचता।
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मामला दोपहर में करीब एक बजे का है। मुजरिया क्षेत्र के गांव वितरोई निवासी अंशू तोमर का मासूम बेटा बीमार पड़ गया। उसकी हालत बिगड़ने लगी तो उसने एंबुलेंस बुला ली। पत्नी और मासूम बेटे के साथ अंशू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर पहुंचा तो इमरजेंसी में नर्सिंग स्टॉफ के अलावा डॉक्टर मौजूद नहीं थे। अंशू अस्पताल परिसर में काफी देर तक चक्कर काटता रहा लेकिन किसी भी डॉक्टर ने मासूम की सुध नहीं ली। स्वास्थ्य कर्मियों से उसकी नोकझोंक भी हुई। करीब दो घंटे बाद इसकी भनक चिकित्साधिकारी महेश प्रताप सिंह को लगी तो वह फार्मासिस्ट अमित त्रिपाठी के साथ इमरजेंसी में पहुंचे और मासूम का इलाज शुरू कर दिया। एंबुलेंस चालक रामपाल ने बताया कि इमरजेंसी में पहुंचते ही उसने कॉल भी की लेकिन कोई गौर नहीं किया गया। चिकित्साधिकारी महेश प्रताप सिंह ने बताया कि डॉ. शोयस दीक्षित इमरजेंसी ड्यूटी पर तैनात थे लेकिन विभागीय कार्य से उन्हें प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कछला जाना पड़ गया था।
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रेफर करने का फंडा अपनाते हैं डॉक्टर
उझानी। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर सुविधाएं तो बहुत होनी चाहिए लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी की वजह से मरीजों को उनका फायदा नहीं मिल पा रहा है। यहां न तो बाल रोग विशेषज्ञ है और न हीं हड्डी रोग का कोई चिकित्सक है। दो महीना पहले हड्डी रोग विशेषज्ञ मतबूल रहमान गैरहाजिर हो गए। स्त्री रोग विशेषज्ञ ने चार्ज लेने के बाद ड्यूटी पर आना ही मुनासिब नहीं समझा। हालत यह है कि एक्सीडेंटल या फिर कोई गंभीर बीमारी से ग्रस्त मरीज आ जाए तो उसे रेफर करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं बचता।
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