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भटौली का न सूखने वाला ‘खुदय्या तालाब’ भी सूखा
Updated Sat, 23 Dec 2017 01:13 AM IST
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प्राचीन शिवालय।
- फोटो : अमर उजाला
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दातागंज। प्रकृति से छेड़छाड़ के परिणाम अच्छे नहीं आ रहे हैं। थोड़े से लाभ के लिए पेड़ों को काट दिया जाता है। जिसकी वजह से आज पर्यावरण के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है। इसी का परिणाम यह है कि साल दर साल बरसात में कमी आ रही है। जिसके चलते जलस्तर नीचे चला जा रहा है। औसत बरसात नहीं होने की वजह से ही तालाब-पोखर सूख रहे हैं। तहसील क्षेत्र के गांव भटौली का एतिहासिक न सूखने वाला खुदय्या तालाब भी इस बार सूख गया है,जबकि धूप और गर्मी का मौसम अभी नहीं आया है। यहां बाकायदा खेती भी हो रही है।
18 वीं सदी में अकाल पड़ने पर तत्कालीन जमींदार ने लोगों को रोजगार मुहय्या कराने के लिए यह तालाब खुदवाया था। जमींदारी काल में भटौली गांव तोमर वंशीय ठाकुर की रियासत थी। गांव के बुजुर्ग सेवानिवृत्त अध्यापक डालचंद्र और हरीशंकर आर्य के मुताबिक 18 वीं सदी में भयंकर सूखा पड़ा था। लोगों की भूख से मरने की नौबत आ गई थी। उस समय ठाकुर दलथमन सिंह इस रियासत के जमींदार थे। जनता की परेशानी को देखते हुए उन्होंने रोजगार देने के लिए गांव से पूरब में करीब एक किमी की दूरी पर 20 हजार वर्ग गज में तालाब खुदवाना शुरू कर दिया। मजदूरों की अधिक संख्या को देखकर रोजगार से कोई वंचित न रह जाए इसलिए जमींदार ने निर्देश दिया कि एक दिन तालाब खोदों और दूसरे दिन उसी की मिट्टी से उसे पाट दो। मजदूरों को परिवार की संख्या के अनुरूप मजदूरी में अनाज दिया करते थे। बताते हैं कि जब तक सूखे के हालात रहे तब तक इस तालाब को खुदवाने और बंद कराने का क्रम चलता रहा।
खुदवाने और बंद कराने की वजह से ही इसका नाम खुदय्या तालाब पड़ा। गांव वालों के मुताबिक इस तालाब में हर समय अथाह पानी रहता था,लेकिन इस बार अकस्मात यह तालाब सूख गया है। वर्तमान में इस ऐतिहासिक तालाब का स्वरूप खेत का हो गया है। बाकायदा इस जगह पर खेती हो रही है।
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भटौली का ऐतिहासिक शिवालय भी हुआ जर्जर
दातागंज। तहसील क्षेत्र के गांव भटौली स्थित शिवालय जमींदारी काल की भव्यता का प्रतीक है। लगभग दस हजार वर्ग गज में बना यह मंदिर और उसका प्रांगण का क्षेत्र में अलग ही महत्व है। दक्षिण भारत के शिल्पियों से इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। कलात्मक स्वरूप में बने इस मंदिर के अंदरूनी भाग की रंगाई और नक्काशी आज भी दर्शनीय है। यहां काले पत्थर का भव्य शिवलिंग है। जो अमूमन अन्य मंदिरों में नजर नहीं आएगा। वर्तमान में देखरेख के अभाव में यह मंदिर भी अपनी भव्यता खोता जा रहा है।
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18 वीं सदी में अकाल पड़ने पर तत्कालीन जमींदार ने लोगों को रोजगार मुहय्या कराने के लिए यह तालाब खुदवाया था। जमींदारी काल में भटौली गांव तोमर वंशीय ठाकुर की रियासत थी। गांव के बुजुर्ग सेवानिवृत्त अध्यापक डालचंद्र और हरीशंकर आर्य के मुताबिक 18 वीं सदी में भयंकर सूखा पड़ा था। लोगों की भूख से मरने की नौबत आ गई थी। उस समय ठाकुर दलथमन सिंह इस रियासत के जमींदार थे। जनता की परेशानी को देखते हुए उन्होंने रोजगार देने के लिए गांव से पूरब में करीब एक किमी की दूरी पर 20 हजार वर्ग गज में तालाब खुदवाना शुरू कर दिया। मजदूरों की अधिक संख्या को देखकर रोजगार से कोई वंचित न रह जाए इसलिए जमींदार ने निर्देश दिया कि एक दिन तालाब खोदों और दूसरे दिन उसी की मिट्टी से उसे पाट दो। मजदूरों को परिवार की संख्या के अनुरूप मजदूरी में अनाज दिया करते थे। बताते हैं कि जब तक सूखे के हालात रहे तब तक इस तालाब को खुदवाने और बंद कराने का क्रम चलता रहा।
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खुदवाने और बंद कराने की वजह से ही इसका नाम खुदय्या तालाब पड़ा। गांव वालों के मुताबिक इस तालाब में हर समय अथाह पानी रहता था,लेकिन इस बार अकस्मात यह तालाब सूख गया है। वर्तमान में इस ऐतिहासिक तालाब का स्वरूप खेत का हो गया है। बाकायदा इस जगह पर खेती हो रही है।
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भटौली का ऐतिहासिक शिवालय भी हुआ जर्जर
दातागंज। तहसील क्षेत्र के गांव भटौली स्थित शिवालय जमींदारी काल की भव्यता का प्रतीक है। लगभग दस हजार वर्ग गज में बना यह मंदिर और उसका प्रांगण का क्षेत्र में अलग ही महत्व है। दक्षिण भारत के शिल्पियों से इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। कलात्मक स्वरूप में बने इस मंदिर के अंदरूनी भाग की रंगाई और नक्काशी आज भी दर्शनीय है। यहां काले पत्थर का भव्य शिवलिंग है। जो अमूमन अन्य मंदिरों में नजर नहीं आएगा। वर्तमान में देखरेख के अभाव में यह मंदिर भी अपनी भव्यता खोता जा रहा है।