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ये कैसा पुण्य! अपने ही छोड गए ‘सिसकता’ गंगाघाट
बदायूं
Updated Sun, 08 Oct 2017 07:47 PM IST
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गंगा
- फोटो : अमर उजाला
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उझानी (बदायूं)। मानो तो गंगा मां हूं न मानो तो बहता पानी। गंगा की सौगंध फिल्म के गीत के यह बोल खुद में उन अनगिनत लोगों के लिए किसी सवाल से कम नहीं जो घाट पर पहुंचते तो पुण्य अर्जित करने को हैं लेकिन हवन-पूजन की सामग्री से लेकर आस्था के नाम पर कचरा घाट पर ही छोड़ जाते हैं। ऐसा ही नजारा रविवार सुबह गंगाघाट पर देखने को मिला। शरद पूर्णिमा वाले दिन लाखों की संख्या में पहुंचे श्रद्घालु कचरे का ढेर घाट पर लगाकर गंगा मइया को सिसकता छोड़ गए।
करीब दो किलोमीटर के दायरे को अपने आगोश में समेट कछला गंगाघाट पर शरद पूर्णिमा वाली शाम के बाद से लगे कूड़ा-करकट के ढेरों ने सवाल तो सबसे पहले उन श्रद्घालुओं की भूमिका पर उठा दिया है जो आते तो पुण्य अर्जित करने के लिए हैं लेकिन घरों में होने वाले हवन-पूजन के बाद निष्प्रयोज्य कचरे को भू-विसर्जन करने की बजाय घाट पर फेंक जाते हैं। ऐसे में कुछेक श्रद्घालु घाट को साफ नहीं रख सकते। गंगा को निर्मल और अविरल बनाए रखने के लिए शासन और प्रशासन से लेकर स्वयंसेवियों की ओर से भी लोगों को जागरूक करने के लिए बार-बार अभियान चलाए जाते हैं लेकिन श्रद्धालु हैं कि आस्था के नाम पर गंगा को ही प्रदूषित करने से बाज नहीं आते। बेजुबान गंगा को कचरे के ढेरों को देख सिसकना नहीं पड़ेगा। हद तो पिछले सप्ताह उस वक्त हो गई जब घाट पर एक दुकानदार ने कासगंज के नेताजी को गंगा में कार धोने से टोका तब वह खुद की गलती मानने की बजाय दुकानदार से ही उलझ पड़े थे।
करीब दो किलोमीटर के दायरे को अपने आगोश में समेट कछला गंगाघाट पर शरद पूर्णिमा वाली शाम के बाद से लगे कूड़ा-करकट के ढेरों ने सवाल तो सबसे पहले उन श्रद्घालुओं की भूमिका पर उठा दिया है जो आते तो पुण्य अर्जित करने के लिए हैं लेकिन घरों में होने वाले हवन-पूजन के बाद निष्प्रयोज्य कचरे को भू-विसर्जन करने की बजाय घाट पर फेंक जाते हैं। ऐसे में कुछेक श्रद्घालु घाट को साफ नहीं रख सकते। गंगा को निर्मल और अविरल बनाए रखने के लिए शासन और प्रशासन से लेकर स्वयंसेवियों की ओर से भी लोगों को जागरूक करने के लिए बार-बार अभियान चलाए जाते हैं लेकिन श्रद्धालु हैं कि आस्था के नाम पर गंगा को ही प्रदूषित करने से बाज नहीं आते। बेजुबान गंगा को कचरे के ढेरों को देख सिसकना नहीं पड़ेगा। हद तो पिछले सप्ताह उस वक्त हो गई जब घाट पर एक दुकानदार ने कासगंज के नेताजी को गंगा में कार धोने से टोका तब वह खुद की गलती मानने की बजाय दुकानदार से ही उलझ पड़े थे।
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