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काका हाथरसी का बिजनौर से रहा गहरा नाता

Fri, 17 Sep 2021 11:47 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 17 Sep 2021 11:47 PM IST
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Uncle Hathrasi has a deep connection with Bijnor
बिजनौर प्रवास के दौरान गिरिराज शरण अग्रवाल तथा मीना अग्रवाल के साथ काका हाथरसी। - फोटो : BIJNOR
काका हाथरसी का बिजनौर से रहा गहरा नाता
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विवेक गुप्ता
बिजनौर। विश्व विख्यात हास्य कवि काका हाथरसी का बिजनौर से गहरा नाता रहा। काका हाथरसी ने अपने जीवन के अंतिम दो वर्ष बिजनौर में ही बिताए। उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी बिजनौर और बिजनौर के निवासियों का कई जगह उल्लेख किया। उनका जन्म दिवस तथा पुण्यतिथि 18 सितंबर को ही है।
काका हाथरसी का जन्म हाथरस में 18 सितंबर 1906 को हुआ था, लेकिन उनकी ख्याति पूरे विश्व में रही। वह जीवन भर लोगों को हंसाते रहे। काका हाथरसी की भतीजी मीना अग्रवाल जिन्हें वह अपनी पुत्री मानते थे, उनका विवाह बिजनौर में वर्धमान कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल के साथ हुआ था। डॉ. मीना अग्रवाल को यदि कोई उनकी भतीजी कह देता था तब वह नाराज हो जाते थे। वह उन्हें अपनी पुत्री ही मानते थे। काका हाथरसी ने अपने जीवन के अंतिम दो वर्ष बिजनौर में ही बिताए। काका हाथरसी को बिजनौर की जलवायु इतनी पसंद आई कि उन्होंने अपने अंदाज में एक छक्का बिजनौर पर लिख दिया। ‘सोचा परिवर्तन करें, जीवन में कुछ और, छोड़ हाथरस आ गए काका कवि बिजनौर, काका कवि बिजनौर बुढ़ापे कि यह नैया, कर दे भव से पार निकट है गंगा मैया, शुद्ध यहां जलवायु मित्र संबंधी प्यारे, दूर करे सब संकट प्रभु गिरिराज हमारे’।
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छक्का उनकी काव्य शैली की एक अलग विधा रही, जब वह बिजनौर में रहे तब डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल के आवास पर लोगों का जमावड़ा लगा रहता था। बिजनौर के साहित्यकार निश्तर खानकाही, अनमोल शुक्ला, अजय जनमेजय, मनोज अबोध, अशोक मधुप, सूर्यमणि रघुवंशी, डॉ. शशि प्रभा खूब आते थे और काका हाथरसी भी उन पर अपना स्नेह रखते थे। डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल बताते हैं कि साहित्यकारों के अतिरिक्त काका हाथरसी के पास चिकित्सक भी खूब आते थे। डॉ. पीयूष वर्मा, डॉ. अशोक चौधरी, डॉ. अनिल अग्रवाल, डॉ. नीरज गुप्ता, डॉ. पीके शुक्ला काका हाथरसी के पास आते थे और उनसे कविताएं सुनते थे। काका हाथरसी ने अपनी आत्मकथा मेरा जीवन एवन में बिजनौर का कई स्थानों पर जिक्र किया। साथ ही उन्होंने बिजनौर के कई लोगों को भी अपनी आत्मकथा में स्थान दिया। काका हाथरसी बेहद मजाकिया थे और उनके पास जितना समय लोग बैठते थे, वह सबके चेहरों पर मुस्कान बिखेरते रहते थे।
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प्रधानमंत्री भी पढ़ चुके हैं उनकी कविताएं
काका हाथरसी की मृत्यु 18 सितंबर 1995 को हुई। मृत्यु से एक माह पूर्व काका हाथरसी बिजनौर से हाथरस चले गए थे। जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अशोक शर्मा बताते हैं कि जब काका हाथरसी बिजनौर में रहते थे, उस समय वह वर्धमान कॉलेज से स्नातकोत्तर कर रहे थे। वह काका हाथरसी से आशीर्वाद लेने के लिए आ जाते थे। एक बार काका हाथरसी ने उनसे सेब लाने के लिए कहा, वह तीन किलोमीटर दूर सब्जी मंडी से सेब लेकर आए। उन्होंने बचे हुए पैसे दिए तो काका ने लेने से इनकार कर दिया। डॉ. अशोक ने जब बचे पैसे नहीं रखे तब काका ने उन्हें अपने हाथों से सेब खिलाया। इसके बाद यह क्रम बन गया जब भी डॉ. अशोक काका से मिलने जाते काका उन्हें सेब जरूर खिलाते थे। काका हाथरसी की कविताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार संसद में पढ़ा है। इसके अतिरिक्त फिल्म पीके में भी उनकी कविता का प्रयोग किया गया है।

बिजनौर में कराया था ऐतिहासिक कवि सम्मेलन
डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल बताते हैं कि काका हाथरसी ने सिविल लाइन स्थित महावीर विद्यालय बिजनौर में एक ऐतिहासिक कवि सम्मेलन भी कराया था। उस कवि सम्मेलन में अशोक चक्रधर, सूर्य कुमार पांडेय, कुंवर बेचैन तथा हुल्लड़ मुरादाबादी जैसे बड़े कवियों ने भाग लिया था।
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