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मानव निर्मित घोसलों में कछुओं ने खोली आंखें,414 गंगा में छोड़े
ब्यूरो/अमर उजाला, बिजनौर
Updated Sat, 21 Apr 2018 12:00 AM IST
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हस्तिनापुर सेंक्चुरी में इंसानी घोसलों से निकले कछुए के बच्चे।
- फोटो : अमर उजाला
बिजनौर। सेंक्चुरी एरिया में कछुओं ने इंसानों द्वारा बनाए गए घोसलों में आंख खोलने वाले बच्चों का गंगा में जीवन प्रारंभ हो गया है। डब्यूडब्ल्यूएफ ने गंगा की धारा में कछुओं के 414 बच्चों को छोड़ दिया है। खेतों में दबे कछुओं के अंडों को बचाने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने यह कवायद शुरू की थी।
गंगा की धारा में कछुओं की 12 प्रजाति पाई जाती है। इनमें से छह प्रजाति खतरे में हैं। कछुए गंगा के तट पर रेत में घोंसला बनाकर अंडे देते हैं। गंगा नदी के बहाव का क्षेत्र हर साल बदल जाता है। जहां गंगा का पानी नहीं होता, वहां पर किसान खेती करने लगते हैं। इस जमीन की जुताई करने, खेतों में फसल को पानी देने व पेस्टीसाइट का प्रयोग करने से अंडे नष्ट होते हैं। किसान भी अंडों को फेंक देते हैं। ऐसे ही हर साल हजारों अंडे बर्बाद हो जाते हैं और कछुओं संख्या अपेक्षाकृत नहीं बढ़ती है। कछुओं के अंडों को सहेजकर उनकी संख्या बढ़ाने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइल्ड फंड) ने अभियान चलाया था। अभियान के अंतर्गत गंगा किनारे हैचरी (प्रजनन केंद्र) बनाई गई थी। जहां भी किसान के खेत में अंडे निकले, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी व कर्मचारी खेत पर जाकर किसान से अंडे लेते। इन अंडों को हैचरी में मानव निर्मित घोंसलों में रखा गया था। गंगा किनारे बने इन इंसानी घोंसलों में आंखें खोलने के बाद बच्चों को एक तालाब में रखा गया। करीब नौ महीने का होने के बाद इन बच्चों को गंगा में छोड़ दिया गया है। गंगा में इन 414 बच्चों का जीवन प्रारंभ हो गया है। अगर इन बच्चों ने जीवटता दिखाई तो इनकी उम्र 100 साल से भी अधिक होगी।
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गंगा की धारा में कछुओं की 12 प्रजाति पाई जाती है। इनमें से छह प्रजाति खतरे में हैं। कछुए गंगा के तट पर रेत में घोंसला बनाकर अंडे देते हैं। गंगा नदी के बहाव का क्षेत्र हर साल बदल जाता है। जहां गंगा का पानी नहीं होता, वहां पर किसान खेती करने लगते हैं। इस जमीन की जुताई करने, खेतों में फसल को पानी देने व पेस्टीसाइट का प्रयोग करने से अंडे नष्ट होते हैं। किसान भी अंडों को फेंक देते हैं। ऐसे ही हर साल हजारों अंडे बर्बाद हो जाते हैं और कछुओं संख्या अपेक्षाकृत नहीं बढ़ती है। कछुओं के अंडों को सहेजकर उनकी संख्या बढ़ाने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (वर्ल्ड वाइल्ड फंड) ने अभियान चलाया था। अभियान के अंतर्गत गंगा किनारे हैचरी (प्रजनन केंद्र) बनाई गई थी। जहां भी किसान के खेत में अंडे निकले, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अधिकारी व कर्मचारी खेत पर जाकर किसान से अंडे लेते। इन अंडों को हैचरी में मानव निर्मित घोंसलों में रखा गया था। गंगा किनारे बने इन इंसानी घोंसलों में आंखें खोलने के बाद बच्चों को एक तालाब में रखा गया। करीब नौ महीने का होने के बाद इन बच्चों को गंगा में छोड़ दिया गया है। गंगा में इन 414 बच्चों का जीवन प्रारंभ हो गया है। अगर इन बच्चों ने जीवटता दिखाई तो इनकी उम्र 100 साल से भी अधिक होगी।
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