{"_id":"632dfbecfa80ef5cb74f729b","slug":"training-of-crop-residue-management-given-to-farmers-bijnor-news-mrt606585275","type":"story","status":"publish","title_hn":"किसानों को दिया फसल अवशेष प्रबंधन का प्रशिक्षण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
किसानों को दिया फसल अवशेष प्रबंधन का प्रशिक्षण
विज्ञापन
नगीना में कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करते एसडीएम रितू चौधरी।
- फोटो : BIJNOR
बिजनौर। कृषि विज्ञान केंद्र नगीना की ओर से किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया। जिसमें वर्तमान परिस्थिति के अनुसार खेती करने की सलाह दी गई। सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि विश्वविद्यालय मेरठ के निदेशक प्रसार डॉ पीके सिंह ने उद्घाटन किया।
डा. पीके सिंह ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति और समय के अनुसार किसानों को अपनी आमदनी को सुरक्षित बनाए रखने के लिए कृषि विविधीकरण अपनाना जरूरी है। गांव में मधुमक्खी पालन, गोपालन, बीज उत्पादन, केला की खेती, ड्रैगन फूड आदि नवीनतम तकनीकों का प्रयोग करें। केंद्र के वैज्ञानिक डॉ केके सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में बायोफोर्टीफाइड प्रजातियों की खेती अधिक लाभप्रद होगी। उन्होंने यह भी बताया कि फसलों के अवशेषों को जलाने से होने वाले दुष्परिणामों का मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है एवं कैसे बचा जा सके।
डॉ शकुंतला गुप्ता ने कहा कि फसल के अवशेषों का प्रयोग अपने आर्थिक समृद्धि के लिए कर सकते हैं। वैज्ञानिक डॉ. शिवांगी ने कहा कि फसलों के अवशेषों का गन्ने की खेती मे मल्चिंग के रूप में अच्छी तरह से उपयोग कर सकते है। डॉ. प्रतिमा गुप्ता ने बागवानी पर जोर दिया। डॉ. पिंटू कुमार ने धान में भी कीट बीमारी का प्रबंधन करने बात कही। डॉ पीके सिंह ने कहा कि जुताई से अपनी फसल अवशेष जैसे पराली गन्ने की पत्ती को कैसे खेत में समाहित कर सकते हैं।
विज्ञापन
जिला कृषि अधिकारी डॉ अवधेश मिश्र ने कृषक उत्पादक संगठन के माध्यम से क्लस्टर खेती को बढ़ावा दिए जाने व इसके महत्व और लाभ के बारे में बताया। एसडीएम रीतू रानी चौधरी ने प्रशिक्षण के अंतिम दिवस पर किसानों को प्रमाण पत्र देकर के सम्मानित किया। कहा कि भविष्य में होने वाले जलवायु परिवर्तन के साथ अपनी खेती में भी परिवर्तन करें।
विज्ञापन
डा. पीके सिंह ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति और समय के अनुसार किसानों को अपनी आमदनी को सुरक्षित बनाए रखने के लिए कृषि विविधीकरण अपनाना जरूरी है। गांव में मधुमक्खी पालन, गोपालन, बीज उत्पादन, केला की खेती, ड्रैगन फूड आदि नवीनतम तकनीकों का प्रयोग करें। केंद्र के वैज्ञानिक डॉ केके सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में बायोफोर्टीफाइड प्रजातियों की खेती अधिक लाभप्रद होगी। उन्होंने यह भी बताया कि फसलों के अवशेषों को जलाने से होने वाले दुष्परिणामों का मानव स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है एवं कैसे बचा जा सके।
विज्ञापन
डॉ शकुंतला गुप्ता ने कहा कि फसल के अवशेषों का प्रयोग अपने आर्थिक समृद्धि के लिए कर सकते हैं। वैज्ञानिक डॉ. शिवांगी ने कहा कि फसलों के अवशेषों का गन्ने की खेती मे मल्चिंग के रूप में अच्छी तरह से उपयोग कर सकते है। डॉ. प्रतिमा गुप्ता ने बागवानी पर जोर दिया। डॉ. पिंटू कुमार ने धान में भी कीट बीमारी का प्रबंधन करने बात कही। डॉ पीके सिंह ने कहा कि जुताई से अपनी फसल अवशेष जैसे पराली गन्ने की पत्ती को कैसे खेत में समाहित कर सकते हैं।
विज्ञापन
जिला कृषि अधिकारी डॉ अवधेश मिश्र ने कृषक उत्पादक संगठन के माध्यम से क्लस्टर खेती को बढ़ावा दिए जाने व इसके महत्व और लाभ के बारे में बताया। एसडीएम रीतू रानी चौधरी ने प्रशिक्षण के अंतिम दिवस पर किसानों को प्रमाण पत्र देकर के सम्मानित किया। कहा कि भविष्य में होने वाले जलवायु परिवर्तन के साथ अपनी खेती में भी परिवर्तन करें।