{"_id":"69a7200ec666a470ac0a728d","slug":"the-stove-has-not-been-lit-on-holi-for-five-generations-bijnor-news-c-27-1-bij1007-173769-2026-03-03","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bijnor News: पांच पीढि़यों से होली पर नहीं जलता चूल्हा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bijnor News: पांच पीढि़यों से होली पर नहीं जलता चूल्हा
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नहटौर। जहां एक ओर होली पर घर-घर गुझिया और पकवानों की खुशबू फैलती है, वहीं क्षेत्र के गांव ढकौली में सलकलान तोमर गोत्र से जुड़े परिवारों में पांच पीढ़ियों से होली का पूजन नहीं होता। इन घरों में होली पर चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाना भी वर्जित रहता है।
रंग एकादशी से इन परिवारों का माहौल बदल जाता है। अन्य घरों में जहां त्योहार की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, वहीं यहां पकवान बनना बंद हो जाता है। होली के दिन दोपहर करीब 12 बजे के बाद होलिका दहन तक चूल्हा नहीं जलाया जाता। परिवार के सदस्य पहले से बना भोजन ग्रहण करते हैं या अन्य परिजनों के यहां से आया भोजन करते हैं। इसके अलावा एकादशी से होली तक कच्चे आंगन में गोबर और पक्के फर्श पर पोछा भी नहीं लगता। होलिका दहन के बाद दुल्हैंडी से सामान्य दिनचर्या शुरू होती है। परिवार का कहना है कि आस्था से जुड़ी यह परंपरा आगे भी जारी रहेगी।
संत के वचन से शुरू हुई परंपरा
परिवार के 67 वर्षीय धर्मवीर सिंह बताते हैं कि पांच पीढ़ी पूर्व चांदपुर क्षेत्र के गांव ढाकी निवासी महताब सिंह का विवाह ढकौली की जमींदार रूप्पो देवी से हुआ था। संतान न होने पर उन्होंने एक सिद्ध संत की शरण ली। संत के निर्देश पर होली पूजन न करने और कुछ नियमों का पालन शुरू किया गया। इसके बाद संतान प्राप्ति हुई और तभी से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही है।
विज्ञापन
महिलाएं मायके में भी निभाती हैं परंपरा
80 वर्षीय जसवंत सिंह के अनुसार परिवार की महिलाएं भी इस परंपरा का सख्ती से पालन करती हैं। यदि कोई महिला होली पर मायके जाती है तो वहां भी कढ़ाई से दूरी बनाए रखती हैं। पकवान बनने के दौरान वह स्वयं को अलग रखती हैं।
विज्ञापन
रंग एकादशी से इन परिवारों का माहौल बदल जाता है। अन्य घरों में जहां त्योहार की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, वहीं यहां पकवान बनना बंद हो जाता है। होली के दिन दोपहर करीब 12 बजे के बाद होलिका दहन तक चूल्हा नहीं जलाया जाता। परिवार के सदस्य पहले से बना भोजन ग्रहण करते हैं या अन्य परिजनों के यहां से आया भोजन करते हैं। इसके अलावा एकादशी से होली तक कच्चे आंगन में गोबर और पक्के फर्श पर पोछा भी नहीं लगता। होलिका दहन के बाद दुल्हैंडी से सामान्य दिनचर्या शुरू होती है। परिवार का कहना है कि आस्था से जुड़ी यह परंपरा आगे भी जारी रहेगी।
विज्ञापन
संत के वचन से शुरू हुई परंपरा
परिवार के 67 वर्षीय धर्मवीर सिंह बताते हैं कि पांच पीढ़ी पूर्व चांदपुर क्षेत्र के गांव ढाकी निवासी महताब सिंह का विवाह ढकौली की जमींदार रूप्पो देवी से हुआ था। संतान न होने पर उन्होंने एक सिद्ध संत की शरण ली। संत के निर्देश पर होली पूजन न करने और कुछ नियमों का पालन शुरू किया गया। इसके बाद संतान प्राप्ति हुई और तभी से यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी निभाई जा रही है।
विज्ञापन
महिलाएं मायके में भी निभाती हैं परंपरा
80 वर्षीय जसवंत सिंह के अनुसार परिवार की महिलाएं भी इस परंपरा का सख्ती से पालन करती हैं। यदि कोई महिला होली पर मायके जाती है तो वहां भी कढ़ाई से दूरी बनाए रखती हैं। पकवान बनने के दौरान वह स्वयं को अलग रखती हैं।