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Bijnor News: बारिश का मौसम, उफनाती गंगा और नाव का सहारा
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जान जोखिम में। मंडावर के खादर क्षेत्र में जान जोखिम में डालकर नाव से जाते ग्रामीण। संवाद
जान जोखिम के डालकर नाव से नदी पार कर चारा ला रहे ग्रामीण
छोटे बच्चे भी पशुओं को चराने तैरकर गंगा पार करने को मजबूर
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडावर /चंदक। बारिश का मौसम, उफनाती हुई गंगा और ऐसे में केवल नाव का सहारा...गंगा तट पर बसे राजारमपुर, डैबलगढ़, चाहड़वाला समेत दर्जनभर गांवों के हजारों किसानों और मजदूरों को लगभग हर रोज इस परिस्थिति से दो-चार होना पड़ता है। ये लोग जान जोखिम में डाल कर अपने मवेशियों के चारे की व्यवस्था करते हैं। सुबह नाव से गंगा की उफनती लहरों का सामना करते हुए दूसरी तरफ जाते हैं और शाम को चारा लेकर लौट कर घर आते हैं। जब तक लौट नहीं आते, तब तक घर पर मौजूद इनके परिवारों के सदस्यों की सांसें अटकी रहती हैं।
इस बार जलस्तर अत्यधिक बढ़ने से खादर क्षेत्र के किसानों पर एक बार फिर आपदा का साया मंडरा रहा है। ग्राम राजारमपुर समेत आस-पास के इलाकों के किसानों की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। सबसे बड़ी समस्या पशुओं के चारे की हो गई है। पैंटून पुल खोल दिए जाने के कारण चारा लाने के लिए किसानों को नाव और बोट का सहारा लेना पड़ रहा है, जबकि बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर मवेशियों को चराने के लिए गंगा पार करा रहे हैं।
स्थानीय किसानों का कहना है कि गंगा में पानी बढ़ने के साथ ही प्रशासन पैंटून पुल हटा देता है। इससे खादर क्षेत्र का सीधा संपर्क टूट गया है, लेकिन अब नाव और बोट ही एकमात्र विकल्प बच गए हैं। चारा लाने में न सिर्फ समय ज्यादा लग रहा है, बल्कि खर्च भी बढ़ गया है। कई किसान बताते हैं कि हरा चारा जुटाना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। खेतों में पानी भरने से चारागाह भी प्रभावित हुए हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि छोटे बच्चे और किशोर मवेशियों को चराने के लिए गंगा पार कर रहे हैं।
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तेज धारा और बढ़ते जलस्तर के बीच वे नाव या तैरकर दूसरी तरफ जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जान का खतरा साफ है, लेकिन पशुओं को भूखा रखना भी संभव नहीं। एक किसान ने कहा कि पुल खुला है तो चारा लाने के लिए नाव ही सहारा है। बच्चे भी मजबूरन गंगा पार कर मवेशी चरा रहे हैं और पहाड़ी क्षेत्रों से पानी आने के कारण गंगा का रुख अभी भी खतरनाक बना हुआ है।
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छोटे बच्चे भी पशुओं को चराने तैरकर गंगा पार करने को मजबूर
संवाद न्यूज एजेंसी
मंडावर /चंदक। बारिश का मौसम, उफनाती हुई गंगा और ऐसे में केवल नाव का सहारा...गंगा तट पर बसे राजारमपुर, डैबलगढ़, चाहड़वाला समेत दर्जनभर गांवों के हजारों किसानों और मजदूरों को लगभग हर रोज इस परिस्थिति से दो-चार होना पड़ता है। ये लोग जान जोखिम में डाल कर अपने मवेशियों के चारे की व्यवस्था करते हैं। सुबह नाव से गंगा की उफनती लहरों का सामना करते हुए दूसरी तरफ जाते हैं और शाम को चारा लेकर लौट कर घर आते हैं। जब तक लौट नहीं आते, तब तक घर पर मौजूद इनके परिवारों के सदस्यों की सांसें अटकी रहती हैं।
इस बार जलस्तर अत्यधिक बढ़ने से खादर क्षेत्र के किसानों पर एक बार फिर आपदा का साया मंडरा रहा है। ग्राम राजारमपुर समेत आस-पास के इलाकों के किसानों की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। सबसे बड़ी समस्या पशुओं के चारे की हो गई है। पैंटून पुल खोल दिए जाने के कारण चारा लाने के लिए किसानों को नाव और बोट का सहारा लेना पड़ रहा है, जबकि बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर मवेशियों को चराने के लिए गंगा पार करा रहे हैं।
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स्थानीय किसानों का कहना है कि गंगा में पानी बढ़ने के साथ ही प्रशासन पैंटून पुल हटा देता है। इससे खादर क्षेत्र का सीधा संपर्क टूट गया है, लेकिन अब नाव और बोट ही एकमात्र विकल्प बच गए हैं। चारा लाने में न सिर्फ समय ज्यादा लग रहा है, बल्कि खर्च भी बढ़ गया है। कई किसान बताते हैं कि हरा चारा जुटाना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है। खेतों में पानी भरने से चारागाह भी प्रभावित हुए हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि छोटे बच्चे और किशोर मवेशियों को चराने के लिए गंगा पार कर रहे हैं।
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तेज धारा और बढ़ते जलस्तर के बीच वे नाव या तैरकर दूसरी तरफ जाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जान का खतरा साफ है, लेकिन पशुओं को भूखा रखना भी संभव नहीं। एक किसान ने कहा कि पुल खुला है तो चारा लाने के लिए नाव ही सहारा है। बच्चे भी मजबूरन गंगा पार कर मवेशी चरा रहे हैं और पहाड़ी क्षेत्रों से पानी आने के कारण गंगा का रुख अभी भी खतरनाक बना हुआ है।