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भ्रष्टाचार की गाड़ी ने कुचल दिए नियम
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भ्रष्टाचार की गाड़ी ने कुचल दिए नियम
बिजनौर। स्वास्थ्य विभाग में जांच शुरू हुई तो भ्रष्टाचार की परतें उखड़नी शुरू हो गई हैं। लखनऊ से आई टीम ने जिलेभर में पीएचसी और जिला मुख्यालय पर लगी गाड़ियों का रिकॉर्ड खंगाला तो बड़ी गड़बड़ी सामने आई। शासन से टेंडर और भुगतान के लिए बनाए गए नियमों का एक या दो साल से नहीं, बल्कि पांच सालों से उल्लंघन किया जा रहा है। पहले गलत तरह से टेंडर किए गए, उसके बाद बिना जीपीएस लगाए और लॉग बुक तैयार किए ही उनका भुगतान भी कर दिया गया। हर माह करीब 28 हजार रुपये प्रति गाड़ी के हिसाब से 35 गाड़ियों का भुगतान किया जा रहा है। पिछले पांच सालों पर नजर डालें तो पांच करोड़ से ज्यादा का भुगतान इन गाड़ियों के नाम पर किया जा चुका है।
यूं तो स्वास्थ्य विभाग में एनएचएम अब से नहीं, पिछले दस सालों से घोटालों और भ्रष्टाचार को लेकर चर्चाओं में रहा है, लेकिन गड़बड़ी की यह बीमारी अभी तक ठीक नहीं हुई है। जीएसटी चोरी के मामले के बाद अब एनएचएम में गाड़ियों के नाम पर बड़ा खेल सामने आ रहा है। जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह ने बताया कि वर्ष 2016 में जिलेभर में पीएचसी के लिए गाड़ियों का टेंडर किया गया। नियम तो हर साल टेंडर करने का था, लेकिन इस टेंडर में जिन फर्मों को काम दिया गया, उनसे ही वर्ष 2019 तक काम लिया गया। वर्ष 2019 में एक बार फिर टेंडर हुआ। इसके बाद अभी तक उन्हीं फर्मों की गाड़ियां विभाग में चल रही हैं। कमाल यह है कि टेंडर होने से पहले शासन ने कुछ नियम भी बनाए थे, जिसमें जीपीएस लगाना और भुगतान जीपीएस लॉग बुक के आधार पर करना अनिवार्य था। इसके अलावा टेंडर केवल उन्हीं फर्म को देना था जो ट्रेवल एजेंसी, फर्म, सोसायटी, कंपनी, ट्रस्ट के रूप में रजिस्टर्ड हो। जो गाड़ियां लगनी थीं, उन्हें आरटीओ से टैक्सी परमिट मिला हो। इसके अलावा भी कई नियम थे, जिनका मनमाने तरीके से उल्लंघन किया गया।
यहां पकड़ी गई गड़बड़ी
जांच टीम ने जब गाड़ियों के भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड तलब किए तो उन्हें लॉग बुक भी दी गई। लॉग बुक पर ऊपर जीपीएस लिखा गया था, लेकिन टीम ने इस लॉग बुक के फर्जी होने की आशंका व्यक्त की। इसके बाद टीम ने जीपीएस लॉब बुक की आईडी और पासबर्ड मांगा, ताकि भुगतान के रिकॉर्ड मेें लगी लॉगबुक का मिलान किया जा सके। इसके बाद पूरा मामला खुल गया। जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह ने बताया कि इसके बाद पता चला कि गाड़ियों में जीपीएस लगा ही नहीं है। केवल लॉगबुक पर जीपीएस लिख गया है। यह लॉगबुक गलत तरीके से बनी है और नियमों को तोड़ते हुए भुगतान हुआ है।
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35 गाड़ी, हर माह नौ लाख से ज्यादा का भुगतान
नियम तो यह भी था कि गाड़ी को निर्धारित करीब 28 हजार का भुगतान पाने के लिए 25 दिन करीब 1500 किलोमीटर चलाना था। अब लॉगबुक पर ही जांच अधिकारियों ने सवाल खड़े कर दिए हैं, तो गाड़ी कितनी चली किसी को नहीं पता। इतना जरूर है कि लगभग सभी गाड़ियों को 28 हजार प्रति माह की दर से भुगतान हुआ है। हर माह का औसत लगाए तो यह भुगतान नौ लाख और वर्ष में एक करोड़ से ज्यादा है। इस लिहाज से पिछले पांच सालों में करीब पांच करोड़ का भुगतान किया गया है।
दोबारा आएगी जांच टीम, जल्द हो सकती है कार्रवाई
स्वास्थ्य विभाग में गड़बड़ी पकड़ में आने के बाद शासन भी सख्त नजर आ रहा है। शासन स्तर से जुलाई के पहले सप्ताह में ही दोबारा लखनऊ से जांच टीम बिजनौर आने की संभावना जताई जा रही है। जुलाई में आने वाली टीम अन्य कई गड़बड़ी से भी पर्दा उठा सकती है।
प्रथम दृष्ट्या टूटते दिख रहे नियम, जांच रिपोर्ट भेजेंगे : जांच अधिकारी
जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह ने बताया कि गाड़ियों के भुगतान में गड़बड़ी हुई है। जीपीएस न होना पाया गया। साथ ही टेंडर देने में नियमों का पालन नहीं हुआ। इसकी पूरी रिपोर्ट तैयार की जा रही है। विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर दोषियों पर कार्रवाई के लिए रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को शीघ्र दी जाएगी।
नियमों का पालन किया, लगे हैं जीपीएस : सीएमओ
सीएमओ विजय कुमार गोयल ने बताया कि गाड़ियों को भुगतान करने में नियमों का पालन हुआ है। जीपीएस लॉगबुक के आधार पर ही भुगतान हुआ है। कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई।
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बिजनौर। स्वास्थ्य विभाग में जांच शुरू हुई तो भ्रष्टाचार की परतें उखड़नी शुरू हो गई हैं। लखनऊ से आई टीम ने जिलेभर में पीएचसी और जिला मुख्यालय पर लगी गाड़ियों का रिकॉर्ड खंगाला तो बड़ी गड़बड़ी सामने आई। शासन से टेंडर और भुगतान के लिए बनाए गए नियमों का एक या दो साल से नहीं, बल्कि पांच सालों से उल्लंघन किया जा रहा है। पहले गलत तरह से टेंडर किए गए, उसके बाद बिना जीपीएस लगाए और लॉग बुक तैयार किए ही उनका भुगतान भी कर दिया गया। हर माह करीब 28 हजार रुपये प्रति गाड़ी के हिसाब से 35 गाड़ियों का भुगतान किया जा रहा है। पिछले पांच सालों पर नजर डालें तो पांच करोड़ से ज्यादा का भुगतान इन गाड़ियों के नाम पर किया जा चुका है।
यूं तो स्वास्थ्य विभाग में एनएचएम अब से नहीं, पिछले दस सालों से घोटालों और भ्रष्टाचार को लेकर चर्चाओं में रहा है, लेकिन गड़बड़ी की यह बीमारी अभी तक ठीक नहीं हुई है। जीएसटी चोरी के मामले के बाद अब एनएचएम में गाड़ियों के नाम पर बड़ा खेल सामने आ रहा है। जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह ने बताया कि वर्ष 2016 में जिलेभर में पीएचसी के लिए गाड़ियों का टेंडर किया गया। नियम तो हर साल टेंडर करने का था, लेकिन इस टेंडर में जिन फर्मों को काम दिया गया, उनसे ही वर्ष 2019 तक काम लिया गया। वर्ष 2019 में एक बार फिर टेंडर हुआ। इसके बाद अभी तक उन्हीं फर्मों की गाड़ियां विभाग में चल रही हैं। कमाल यह है कि टेंडर होने से पहले शासन ने कुछ नियम भी बनाए थे, जिसमें जीपीएस लगाना और भुगतान जीपीएस लॉग बुक के आधार पर करना अनिवार्य था। इसके अलावा टेंडर केवल उन्हीं फर्म को देना था जो ट्रेवल एजेंसी, फर्म, सोसायटी, कंपनी, ट्रस्ट के रूप में रजिस्टर्ड हो। जो गाड़ियां लगनी थीं, उन्हें आरटीओ से टैक्सी परमिट मिला हो। इसके अलावा भी कई नियम थे, जिनका मनमाने तरीके से उल्लंघन किया गया।
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यहां पकड़ी गई गड़बड़ी
जांच टीम ने जब गाड़ियों के भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड तलब किए तो उन्हें लॉग बुक भी दी गई। लॉग बुक पर ऊपर जीपीएस लिखा गया था, लेकिन टीम ने इस लॉग बुक के फर्जी होने की आशंका व्यक्त की। इसके बाद टीम ने जीपीएस लॉब बुक की आईडी और पासबर्ड मांगा, ताकि भुगतान के रिकॉर्ड मेें लगी लॉगबुक का मिलान किया जा सके। इसके बाद पूरा मामला खुल गया। जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह ने बताया कि इसके बाद पता चला कि गाड़ियों में जीपीएस लगा ही नहीं है। केवल लॉगबुक पर जीपीएस लिख गया है। यह लॉगबुक गलत तरीके से बनी है और नियमों को तोड़ते हुए भुगतान हुआ है।
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35 गाड़ी, हर माह नौ लाख से ज्यादा का भुगतान
नियम तो यह भी था कि गाड़ी को निर्धारित करीब 28 हजार का भुगतान पाने के लिए 25 दिन करीब 1500 किलोमीटर चलाना था। अब लॉगबुक पर ही जांच अधिकारियों ने सवाल खड़े कर दिए हैं, तो गाड़ी कितनी चली किसी को नहीं पता। इतना जरूर है कि लगभग सभी गाड़ियों को 28 हजार प्रति माह की दर से भुगतान हुआ है। हर माह का औसत लगाए तो यह भुगतान नौ लाख और वर्ष में एक करोड़ से ज्यादा है। इस लिहाज से पिछले पांच सालों में करीब पांच करोड़ का भुगतान किया गया है।
दोबारा आएगी जांच टीम, जल्द हो सकती है कार्रवाई
स्वास्थ्य विभाग में गड़बड़ी पकड़ में आने के बाद शासन भी सख्त नजर आ रहा है। शासन स्तर से जुलाई के पहले सप्ताह में ही दोबारा लखनऊ से जांच टीम बिजनौर आने की संभावना जताई जा रही है। जुलाई में आने वाली टीम अन्य कई गड़बड़ी से भी पर्दा उठा सकती है।
प्रथम दृष्ट्या टूटते दिख रहे नियम, जांच रिपोर्ट भेजेंगे : जांच अधिकारी
जांच अधिकारी सुरेंद्र सिंह ने बताया कि गाड़ियों के भुगतान में गड़बड़ी हुई है। जीपीएस न होना पाया गया। साथ ही टेंडर देने में नियमों का पालन नहीं हुआ। इसकी पूरी रिपोर्ट तैयार की जा रही है। विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर दोषियों पर कार्रवाई के लिए रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को शीघ्र दी जाएगी।
नियमों का पालन किया, लगे हैं जीपीएस : सीएमओ
सीएमओ विजय कुमार गोयल ने बताया कि गाड़ियों को भुगतान करने में नियमों का पालन हुआ है। जीपीएस लॉगबुक के आधार पर ही भुगतान हुआ है। कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई।